कविता
इससे तो अच्छा है
करना सियासत, तिजारत की ख़ातिर ।[1]इससे तो अच्छा है नाक़ारा रहते ।।[2]चूल्हे बुझाकर, अलावों का मजमा ।इससे तो अच्छा है कुहरे में रहते ।।गर है लियाक़त का आग़ाज़ सजदा ।[3]इससे तो अच्छा है आवारा रहते ।।महलों की खिड़की से रिश्तों को तकना ।इससे तो अच्छा है गलियों में रहते ।।ग़ैरों की महफ़िल में बेवजहा हँसना ।इससे तो अच्छा है तन्हा ही रहते ।।बेमानी वादों से जनता को ठगना ।इससे तो अच्छा है तुम चुप ही रहते ।।