कविता
उल्लू की पंचायत
न नई है न पुरानी हैसच तो नहींज़ाहिर है, कहानी हैएक जोड़ा हंस हंसिनी कातैरता आसमान मेंतभी हंसिनी को दिखाएक उल्लू कहीं वीरान मेंहंसिनी, हंस से बोली-"कैसा अभागा मनहूस जन्म है उल्लू काजहाँ बैठावहीं वीरान कर देता हैक्या उल्लू भी किसी को खुशी देता है?"तेज़ कान थे उल्लू के भीसुन लिया और बोला-"अरे सुनो! उड़ने वालो !शाम घिर आईऐसी भी क्या जल्दी !यहीं रुक लो भाई"ऐसी आवाज़ सुन उल्लू कीउतर गए हंस हंसिनीख़ातिर की उल्लू नेदोनों सो गए वहींसूरज निकला सुबहचलने लगे दोनों तो...उल्लू ने हंसिनी को पकड़ लिया"पागल है क्या ?मेरी हंसिनी को कहाँ लिए जाता है ?रात का मेहमान क्या बना ?बीवी को ही भगाता है ?"हंस को काटो तो ख़ून नहींझगड़ा बढ़ातो फिर पास के गाँव से नेता आएअब उल्लू से झगड़ा करकेकौन अपना घर उजड़वाए !उल्लू का क्या भरोसा ?किसी नेता की छत पर ही बैठ जाएतो फ़ैसला ये हुआकि हंसिनी पत्नी उल्लू की हैऔर हंस तो बस उल्लू ही हैनेता चले गएबेचारा हंस भी चलने को हुआमगर उल्लू ने उसे रोका"हंस ! अपनी हंसिनी को तो ले जामगर इतना तो बताकि उजाड़ कौन करवाता है ?उल्लू या नेता ?"