आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

एक बार तो पूछा होता

एक बार तो पूछा होताकहो निराला !कैसे की शादी बेटी कीक्या दहेज़ थाक्या-क्या थे उपहारदिए लाडो कोकैसे मरेगजानन माधव मुक्तिबोध थेप्रेमचंद केजूते क्योंकर फटे हुए थेपाथेर पांचाली की शूटिंगरुकी रही क्योंनागार्जुन दो कुर्तों पर हीटिके रहे क्योंभुवनेश्वर केउपन्यास रह गए अधूरेतुम्हें याद हैंआधे गाँवों के वो घूरेपूछोगे क्यागए सीकरी क्यों कुंभन थेकैसे बने असद थे ग़ालिबपहुँचे थे कलकत्ताचार साल तक चलते-चलतेरस्ता इतना था क्याकौन गाँव की धरतीपरती बनी परिकथाकैसे हुआ उरिन होरी थाक्या खाते थे माधो घीसूभगतसिंह कीमाँ के आँसू सूखे कैसेकैसे बीती रातें उसकीदिन थे कैसे बीतेबिस्मिल और अशफ़ाक़जेल में जागे थे क्यासोए कैसेकौन-कौन था मिलने आयाकैसे करी मिलाईनहीं सोचोगे तुम येधनाभाव मेंकिस-किस ने मॅडल जा बेचेध्यानचंद नेहिटलर से कब आँख मिलाईकिसने लाकर दिएरत्न भारत कोबना रत्न भारत काकौन यहाँ पर कैसेकभी जान लेते तुमथोड़ा समय बिताकररेणु और हज़ारी केजीवन की बातेंतुम्हें चाहिएताली पीटेंआके सब दरबार मेंतलवे चाटेंउसके जाकरजो भी हो सरकार में