आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

और जाने क्या हुआ उस दिन

खिसकते निक्कर कोथामने की उम्र थी मेरीजब वोपड़ोस में रहने आई थीऔर पहले ही दिनहमने छुप-छुप करख़ूब आइसक्रीम खाई थीवो पैसे चुरातीऔर मैं ख़र्च करताअब क्या कहूँइसी तरह की आशनाई थीमैं तो मुँह फाड़ेभागता थापीछे कटी पतंगों केन जाने कबवो मेरे लिएनई चर्ख़ी, पंतग और डोरले आई थीउस दिन भीअहसास नहीं हुआ मुझकोकि उसकी आँखों मेंकितनी गहराई थीमैं तो सपने बुना करता थानई साइकिल केकि वो ऊन चुराकरमेरे लिएस्वेटर बुन लाई थीकुछ इस तरहाआहिस्ता-आहिस्तावो मेरी ज़िन्दगी में आई थीजिस दिन उसको'देखने' वाले आएउस दिन वो मुझसेन जाने क्याकहने आई थीऔर जाने क्या हुआउस दिनकि उसकीमंद-मंद मुस्कानमुझे ज़िन्दगी भरयाद आई थीक्योंकिवो फिर नहीं आई थीवो फिर नहीं आई थी...