कविता
कि तुम कुछ इस तरह आना
कि तुम कुछ इस तरह आनामेरे दिल की दुछत्ती मेंलगे ऐसा कि जैसे रौशनी हैदिल के आंगन मेंबरसना फूल बन गेंदा केमेरे भव्य स्वागत कोऔर बन हार डल जानामेरी झुकती सी गरदन मेंसुबह की चाय की चुस्की कीतुम आवाज़ हो जानासुगंधित तेल बन बिखरोफिसलना मेरे बालों मेंरसोई के मसालों सी रोज़महकाओ घर भर कोकढ़ी चावल सा लिस जानामेरे हाथों में होठों मेंमचलना, सीऽ-सीऽ होकरचाट की चटख़ारियों में तुमकभी खट्टा, कभी मीठा लगोतुम स्वाद चटनी मेंमेरी आँखों के गुलशन मेंरहो राहत भरी झपकनसहमना और सिकुड़ जानाछुईमुई बन के सपनों मेंकहूँ क्या मैं तोइक सीधा और सादा सा बंदा हूँग़रज़ ये है कि मिलता हैतुम्हीं से सार जीवन में