आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

जश्न मनाया जाय

उनकी ख़्वाहिश, कि इक जश्न मनाया जायछोड़कर मुझको हर इक दोस्त बुलाया जायरौनक़-ए-बज़्म के लायक़ मेरी हस्ती ही नहीं[1]यही हर बार मुझे याद दिलाया जायकभी जो शाम से बेचैन उनकी तबीयत होकिसी मेरे ही ख़त को पढ़ के सुनाया जायकहीं जो भूल से भी ज़िक्र मेरा आता होयही ताकीद कि मक़्ता ही न गाया जाय[2][3]मेरे वो ख़ाब में ना आएँ बस इसी के लिएताउम्र मुझको अब न सुलाया जायकभी सुकून से गुज़रा था जहाँ वक़्त मेराउसी जगह मुझे हर रोज़ रुलाया जायक़ब्र मेरी हो, जिस पे उनका लिखा पत्थर होमेरा वजूद ही दुनिया से मिटाया जायउनकी ख़्वाहिश, कि इक जश्न मनाया जायछोड़कर मुझको हर इक दोस्त बुलाया जाय

संदर्भ

  1. ↑ बज़्म= सभा, महफ़िल
  2. ↑ ताकीद = कोई बात ज़ोर देकर कहना
  3. ↑ ग़ज़ल के आखरी शेर को जिसमें शायर का नाम अथवा उपनाम हो उसे ‘मक़्ता’ कहते हैं।