आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

जो भी मैंने तुम्हें बताया

जो भी मैंने तुम्हें बतायाजो कुछ सारा ज्ञान दिया हैवो मेरे असफल जीवन काऔर मिरे अपराधी मन काकुंठाओं से भरा-भरायाकुछ अनुभव थाजितनी भूलें मैंने की थींजितने मुझको शूल चुभे थेउतने ही अब फूल चुनूँ औरसेज बना दूँ, ऐसा है मनऔर एक सपना भी हैमेरा ही अपनामेरे भय ने मुझे सतायाजीवन के अंधियारे पल थेजितने भी वो सारे कल थेदूर तुम्हें उनसे ले जाऊँकहना यही चाहता हूँ मैंये कम है क्या?मन से भाग सकूँगा कैसेकोई भाग सका भी है क्याकोई नहीं बता सकता हैकोई नहीं जता सकता हैये तो बस, सब ऐसा ही हैसमझ सको तो समझ ही लेनाप्रेम किया है जैसा भी हैऔर नहीं मालूम मुझे कुछयही प्रेम पाती है मेरीनहीं जानता लिखना कुछ भीजैसे-तैसे यही लिखा है...