कविता
निशाचर निरा मैं
निशाचर निरा मैंछायाहीनप्रतिबिम्बित मानसयुक्त,अचेतन मन का स्वामीउत्कंठा लिएमैं सार्वकालिक, सार्वभौमिक सत्यखोजता लगातारहताश फिर भी,नियत भविष्य के लिएस्वागत द्वारों को नकारमैं हिचकता हुआलगातारसोच वही...और क्यों नहीं बदल पाताहर बारज्योंही हिला पत्ता पीपल का,चौंका निशाचर मैंअनिवारलिए भूत अपना,भेंट करने, भविष्य कोसाकारफूलों की झाड़ीमें काँटों की आड़ लिएभौंका किया लगातारलिप्त आडम्बरों सेसकुचाता हुआव्यवस्थित अव्यवस्था के लिएभाड़ झोंका कियालगातारचौंका मैं पीपल के पत्ते सेबार बार