आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

यहाँ बेकार में

कल उसे मुर्ग़ा बनाया था, भरे दरबार मेंआज बत्तीसी दिखाता चित्र है, अख़बार मेंज़ोर से दुम को हिलाना सीख लें, काम आएगीये कला बेजोड़ है, हर एक कारोबार मेंनाक को भी काटकर रख लें, छुपाकर जेब मेंज़िन्दगी का फ़लसफा है, नाक के आकार मेंरुक गया ट्रॅफ़िक, संभल के सांस को भी रोक लोउनका कुत्ता सो रहा, लम्बी सी काली कार मेंअब झुका लो गर्दनें वरना कटेंगी खच्च सेबहुत सारे जोखिमों का रिस्क है दीदार मेंकौन से सपने सुनहरे देखते रहते हो तुमअनगिनत हैं, जिनको चुनवाया गया दीवार मेंजाने कब होगा सवेरा ? मौन क़ब्रस्तान काइस तरह की बात मत करना यहाँ बेकार में