कविता
यूँ तो कुछ भी नया नहीं
यूँ तो कुछ भी नया नहीं मेरे फ़साने में !लुत्फ़ आता है, तुझे बारहा सुनाने में !!वो जो इक दूर से आवाज़ आ रही थी कोई !उसे तो वक़्त है, मेरे क़रीब आने में !!तुझे भुला न सकूँगा ये मेरी फ़ितरत है !चैन मिलता है मुझे, ख़ुद को भूल जाने में !!सुन के आवाज़ अपने दिल के टूट जाने की !मैं भी हैरान हूँ इस, क़िस्म के वीराने में !!ग़मे दौराँ की भी क़ीमत लगाई जाती है !तन्हा जीने की भी इक, शर्त है ज़माने में !!कोई मक़्सद ही नहीं मुझको मिला जीने का !एक लम्हा ही जीऊँ, जब हो मौत आने में !!