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		<title>AdityaChaudhary - सदस्य योगदान [hi]</title>
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		<updated>2026-05-27T00:03:41Z</updated>
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		<title>भूली-बिसरी कड़ियों का भारत -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-06-20T07:20:12Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;भूली-बिसरी कड़ियों का भारत&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Aryabhata.jpg|border|right|300px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
भारत की संस्कृति, विज्ञान और इतिहास की, कब कहाँ और कौन सी कड़ी खोई हुई है, इसकी चर्चा इस लेख में कर रहा हूँ।&lt;br /&gt;
          आइये फ़ारस (ईरान) चलते हैं। आज से हज़ार साल पहले का ईरान। रुस्तम-सुहराब के चर्चे हैं यहाँ, उनकी बहादुरी के क़िस्से बयान करते दास्तान गो अपनी रोज़ी रोटी चला रहे हैं तमाम इनाम इक़राम पा रहे हैं। जब फ़ारस (ईरान) के महान कवि फ़िरदौसी अपने विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य, जिसमें 60 हज़ार शेर हैं, की रचना करते हैं तो उसमें भारत के समृद्ध लौह-शोधन और निर्माण का प्रमाण भी मिलता है। दसवीं शताब्दी के इस महाकाव्य ‘शाहनामा’ की तुलना व्यासों और सूतों के महाभारत और होमर के इलियड से की जाती है।&lt;br /&gt;
          इस रचना में अनेक दास्तान हैं, जिनमें दास्तान-ए-सोहराब मेरी पसंदीदा है। एक ज़माने में दास्तानगोई याने कथावाचन एक प्रसिद्ध विधा थी जो आज के टेलीविज़न से ज़्यादा लोकप्रिय थी। यह विधा दोबारा से अपने खोए गौरव की तलाश में है और कुछ सुधी जनों ने इसे फिर से शुरू किया है। &lt;br /&gt;
          ख़ैर…&lt;br /&gt;
          रुस्तम सुहराब के क़िस्से में रुस्तम के पास भी भारतीय तलवार होने का ज़िक्र किया गया है और सुहराब के पास भी।&lt;br /&gt;
          सुहराब की वीरता के लिए फ़ारसी में लिखा है-&lt;br /&gt;
चू शमशीर हिन्दी बे चंग आयदश ।&lt;br /&gt;
जे दरिया व अज़ कूह नंग आयदश ॥    &lt;br /&gt;
अर्थ: जब वह अपनी हिन्दुस्तानी तलवार चलाता है तो समुन्दर और पहाड़ शर्म से गड़ जाते हैं।&lt;br /&gt;
रुस्तम-सुहराब के युद्ध का दृश्य कुछ इस तरह कहा गया है-&lt;br /&gt;
बेशमशीरे हिन्दी बर आविख़्तन्द ।&lt;br /&gt;
हमी ज़े अहन आतश रीख़्तन्द ॥&lt;br /&gt;
अर्थ: और अपनी म्यान से हिन्दुस्तानी तलवारें खींची और उनकी टकराहट से फ़िज़ा गुंजा दी। फिर ऐसा लगा कि तलवारों से चिंगारियाँ निकलने लगी हैं।&lt;br /&gt;
          आज वह लौह शोधन और इस्पात निर्माण के विज्ञान की कड़ी, कहाँ टूट गई? इतिहास में और पीछे जाएं तो क़ुतुब मीनार दिल्ली के पास खड़ी अशोक की लाट (अशोक स्तंभ) भारत के वैज्ञानिकों की गौरव गाथा कह रही है। इसमें आज तक ज़ंग न लगना, हमें इतिहास में दो हज़ार साल से भी पहले के अद्भुत और विकसित धातु-शास्त्र का प्रशंसक होने को मजबूर कर देता है। &lt;br /&gt;
          आइये थोड़ा दिल्ली में ही घूमें। मुग़लिया सल्तनत के बादशाह औरंगज़ेब के शाही हरम में झांकें। ये वही औरंगज़ेब है जो अपने समय का विश्व में सबसे धनाढ्य शासक माना जाता था, जिसका राजस्व अर्जन उस समय तीन अरब पैंतीस करोड़ तक पहुँच गया था। जिसने संगीत को इतना गहरा दफ़्न करने की ताक़ीद की थी कि कभी सर न उठा सके। ख़ैर…औरंगज़ेब की बेटी ज़ेबुन्निसा ने ढाका की मलमल का शरारा बनवाया है जिसे पहन कर वह जब औरंगज़ेब के सामने आई तो औरंगज़ेब ने यह कहकर मुँह फेर लिया कि इतने पारदर्शी कपड़े पहनने का क्या अर्थ है ? ज़ेबुन्निसा के बताने पर औरंगज़ेब का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। कहते हैं कि सात पर्तों को मिलाकर शरारा बना था। ये थी ढाका की विश्व प्रसिद्ध मलमल जिसका थान आज भी अंगूठी से निकाल कर दिखाया जाता है, लेकिन अब वह बात नहीं रही जो कि पूरे शॉल को ही अखरोट के छिलके में आ जाने पर हुआ करती थी। कभी ढाका हमारे देश का ही अंग था। जो आज बांग्ला देश की राजधानी है। ढाका की मलमल के संबंध में अनेक संस्मरण और क़िस्से मशहूर हैं।&lt;br /&gt;
          वैदिक साहित्य के लिए तो 3-4 हज़ार साल पहले जाना होगा। देखें क्या चल रहा है! आश्रमों में बैठे छात्र हाथों की विभिन्न मुद्राओं के साथ वैदिक ऋचाओं का सस्वर पाठ कर रहे हैं। गायन और कंप्यूटर की प्रोग्रामिंग के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली भाषा संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन व्याकरण समृद्ध भाषा है। इसमें कहे गए वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक रचना हैं। भारतीय साहित्य के वेदों, महाभारत और गीता का विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय महत्व है। ऋग्वेद के दसवें मंडल के 129वें सूक्त को, नासदीय सूक्त के रूप में ख्याति मिली। इसने पूरे विश्व को चमत्कृत कर दिया। इसमें ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्यात्मक तथ्य की व्याख्या है। वेदों की प्राचीनता आज भी अतुलनीय है। जिस समय वेदों की रचना हुई, उस समय यूरोप की स्थिति इतनी पिछड़ी हुई थी कि जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक मॅक्समूलर ने कहा है कि ‘जब ऋग्वेद की रचना हो रही थी तो यूरोप में लोग वस्त्र पहनना और घरों में रहना भी नहीं जानते थे’। &lt;br /&gt;
          वेदों के बाद उपनिषद और उसके बाद आया विश्व का विशालतम महाकाव्य महाभारत। महाभारत ने सदैव ही विश्व भर के विद्वानों को सम्मोहित किया है। जब महाभारत का ज़िक्र आता है तो होमर का इलियड और फ़िरदौसी का शाहनामा बहुत पीछे छूट जाते हैं। हमारे अद्भुत ग्रंथों की श्रृंखला में गीता का अनुवाद विश्व की सभी भाषाओं में हो चुका है। गीता हमें जीवन में सफल होने से लेकर गंभीर दर्शन और सन्न्यास तक की शिक्षा देती है। हम सन्न्यस्त होकर सामान्य रूप से सांसारिक जीवन कैसे जी सकते हैं अथवा सांसारिक होकर कैसे सन्न्यस्त रहें, यही गीता का मूल ज्ञान है जो सारी दुनिया को आकर्षित करता है। महात्मा गाँधी कहा करते थे कि मेरे पास कोई ऐसा प्रश्न नहीं है जिसका कि उत्तर मुझे गीता से मिल न जाए, हो सकता है पढ़ने के कुछ समय बाद मिले लेकिन मिलता अवश्य है।  &lt;br /&gt;
          आइए अशोक के काल याने तीसरी चौथी शताब्दी ईसा पूर्व चलते हैं, देखें क्या चल रहा है! महर्षि पाणिनि विश्व प्रसिद्ध संस्कृत व्याकरण के ग्रंथ अष्टाध्यायी को पूरा करने में निमग्न हैं। ये उस तरफ़ कौन बैठा है ? ये तो महर्षि पिंगल हैं पाणिनि के छोटे भाई, इनकी गणित में रुचि है, संख्याओं से खेलते रहते हैं और शून्य की खोज करके ग्रंथों की रचना कर रहे हैं। साथ ही कंप्यूटर में प्रयुक्त होने वाले बाइनरी सिस्टम को भी खोज कर अपने भुर्जपत्रों में सहेज रहे हैं।&lt;br /&gt;
          कौन थे ये लोग ? क्या ये सब झूठ है ? आज के हालात देखकर तो ऐसा ही लगता है, सब कुछ जैसे विदेश से आ रहा है। दुनिया में न्यूटन और आइंसटाइन को विज्ञान का भगवान माना जाता है तो फिर ये कणाद ऋषि कौन थे जिन्होंने परमाणु की खोज की, आर्यभट्ट कौन थे, जिन्होंने ‘पाई’ के मान को पहचाना और दुनिया को बताया, वाराहमिहिर आदि क्या काल्पनिक थे ?    &lt;br /&gt;
          यूरोप चलते हैं, पाँचवीं शताब्दी के रोम साम्राज्य में क्या हो रहा है। कभी हूण तो कभी गोथ वहाँ तबाही मचाए हुए हैं। इन गोथों ने तो पूरे रोम को बंधक बना लिया है। ज़बर्दस्त मांग है इनकी, आप जानते हैं वो क्या है? भारत के केरल राज्य की काली मिर्च। इन रोमनों की रिहाई 3000 पाउंड काली मिर्च देकर हुई है। यदि इंग्लैन्ड में चलें तो यहाँ राजकीय वस्त्रों को भारतीय नील से सजाया जा रहा है।&lt;br /&gt;
          ईराक़ में, जो प्राचीन मेसोपोटामिया था, भारतीय पार्सलों का ढेर लगा है। ईसा पूर्व की 1500 साल पहले समाप्त हुई सिंधु सभ्यता में मुहर लगा कर बनाए गए पार्सल ईराक़ में ? हो क्या रहा है यह ? असल में मोअन-जो-दाड़ो और हड़प्पा के व्यापारिक संबंध न केवल मेसोपोटामिया से हैं बल्कि मिस्र (ईजिप्ट) से भी हैं।&lt;br /&gt;
          थोड़ा पहले आएँ वापस भारत चलें। अंग्रेज़ों के या उससे पहले मुग़लों के शासन को देखें। भारत में शिक्षा के संबंध में कुछ भ्रांतियां अवश्य हो जाती हैं। इस संबंध में रूसी विशेषज्ञ विक्तर पेत्रोव के आंकड़ों को अवश्य देखना चाहिए। &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! शिक्षा&lt;br /&gt;
! पुरुष&lt;br /&gt;
! महिला  &lt;br /&gt;
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| सम्राट अशोक के समय &lt;br /&gt;
| 27%&lt;br /&gt;
| 7% &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मध्यकाल में  &lt;br /&gt;
| 15%&lt;br /&gt;
| 3%&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अंग्रेज़ी शासन में&lt;br /&gt;
| 11%&lt;br /&gt;
|  0.6%&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
भारत में पुत्री के विवाह की उम्र का शिक्षा पर सीधा असर रहा है। &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! कन्या विवाह &lt;br /&gt;
! उम्र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| वैदिक युग में&lt;br /&gt;
| 16-18 वर्ष &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मध्यकाल में &lt;br /&gt;
| 12-14 वर्ष&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उत्तर मध्यकाल में&lt;br /&gt;
| 7-9  वर्ष&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
मध्यकाल में विदेशी मुस्लिम शासन में लड़कियों की सुरक्षा को लेकर उनका विवाह अत्यधिक कम उम्र में होने लगा और शिक्षा ख़त्म होती चली गई। मध्यकाल ने ही नहीं बल्कि अंग्रेज़ी शासन ने भी भारत में शिक्षा को समाप्त करने के पूरे उपाय किए। अंग्रेज़ों द्वारा, यूरोपीय शिक्षा प्रणाली तो लागू कर दी गई लेकिन बजट मात्र 1.7% ही रखा गया। याने विश्व भर में सबसे कम। &lt;br /&gt;
          आइए भारत के खेतों में घूम कर पुरवाई का आनंद लें, लेकिन ये क्या हो रहा है ? नील की खेती को अंग्रेज़ों ने हथिया लिया, बुनकर मज़दूरों के अंगूठे कटवा दिए। क्लाइव ने ऐसा क्यों करवाया, सिर्फ़ अंग्रेज़ी कपड़े को भारत में बेचने के लिए ? भारत ने तो कभी किसी के साथ ऐसा नहीं किया। ये सब तो हुआ ही लेकिन ये लगान ? 50 प्रतिशत लगान ? कौन दे पाएगा इतना लगान ? इस जानकारी के लिए शायद आश्चर्य बहुत छोटा शब्द है। इसका नतीजा क्या हुआ और यह लगान कैसे वसूल हुआ होगा इसके लिए, हिन्दी ग्रंथमाला में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का लिखा हुआ पढ़ना चाहिए, वे लिखते हैं “कुल दुनिया की लड़ाइयों में सौ वर्षों के अन्दर (सन् 1793 से सन् 1900 तक) सिर्फ़ पचास लाख आदमी मारे गए थे, पर हमारे हिन्दुस्तान के केवल दस वर्ष में (1891 से 1901 तक), भूख, अकाल, के मारे एक करोड़ नब्बे लाख मनुष्यों ने प्राण त्याग दिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
          अंग्रेज़ों ने लगान 10, 15, 25 आदि से बढ़ा कर 50 प्रतिशत कर दिया। साथ ही दस वर्षों की फ़सल के मूल्य का औसत लगा कर लगान को फ़सल में हिस्से की बजाय रुपयों में निश्चित कर दिया। अब हालत यह हो गई कि फ़सल के सस्ते होने पर भी किसान को पूर्व निश्चित लगान ही देना होता था, जो भुखमरी और अकाल मृत्यु का कारण बना। इन विषयों पर और अधिक जानने के लिए श्री धर्मपाल जी की पुस्तक ‘भारत की पहचान’ पढ़ें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के बारे में कितना भी लिखा जाए कम है इसलिए आगे की कड़ी फिर कभी…&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9C_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%85%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E2%80%8C%E0%A4%AD%E0%A5%81%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1593</id>
		<title>ब्रज एक अद्‌भुत संस्कृति -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-25T10:20:13Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;‘ब्रज’ एक अद्‌भुत संस्कृति&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Mathura-Yamuna.jpg|यमुना|798px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          ब्रज का ज़िक्र आते ही जो सबसे पहली आवाज़ हमारी स्मृति में आती है, वह है घाटों से टकराती हुई यमुना की लहरों की आवाज़… कृष्ण के साथ-साथ खेलकर यमुना ने बुद्ध और महावीर के प्रवचनों को साक्षात उन्हीं के मुख से अपनी लहरों को थाम कर सुना… फ़ाह्यान की चीनी भाषा में कहे गये मो-तो-लो (मोरों का नृत्य स्थल ‘मथुरा’) को भी समझ लिया और प्लिनी के ‘जोमनेस’ उच्चारण को भी… यमुना की ये लहरें रसख़ान और रहीम के दोहों पर झूमी हैं… सूर और मीरा के पदों पर नाची हैं… लेकिन महमूद ग़ज़नवी के नरसंहार से रक्ताभ हुई ये यमुना की सहमी हुई लहरों को मियां तानसेन की तोड़ी से कितनी राहत मिली थी यह तो यमुना ही जाने… बादशाह अकबर के बनवाये हुए घाटों को अभी अच्छी तरह पखार भी न पायी थी यमुना… कि अहमद शाह अब्दाली ने इन लहरों को ब्रजवासियों के रक्त से सने उसके सिपाहियों के हाथों को धोने पर मजबूर किया… यह सब तो चलता ही रहा साथ ही साथ यमुना ने ही जन्म दिया ब्रज-संस्कृति को…[[चित्र:Krishn-title.jpg|right|250px]]&lt;br /&gt;
          ब्रज की संस्कृति के साथ ही 'ब्रज' शब्द का चलन भक्ति आन्दोलन के दौरान पूरे चरम पर पहुँच गया। चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्दी की कृष्ण भक्ति की व्यापक लहर ने ब्रज शब्द की पवित्रता को जन-जन में पूर्ण रूप से प्रचारित कर दिया। सूर, मीरां (मीरा) और रसख़ान के भजन तो जैसे आज भी ब्रज के वातावरण में गूंजते रहते हैं। कृष्ण भक्ति में ऐसा क्या है जिसने मीरां से राजसी रहन-सहन छुड़वा दिया और सूर की रचनाओं की गहराई को जानकर विश्व भर में इस विषय पर ही शोध होता रहा कि सूर वास्तव में दृष्टिहीन थे भी या नहीं। संगीत विशेषज्ञों की एक धारणा यह भी है कि ब्रज में सोलह हज़ार राग रागनियों का निर्माण हुआ था। जिन्हें कृष्ण की रानियाँ भी कहा जाता है।[[चित्र:Buddha-3.jpg|150px|left|border|बुद्ध प्रतिमा]]&lt;br /&gt;
          ...कहते हैं कि आस्था के प्रश्नों के उत्तर इतिहास में नहीं खोजे जाते लेकिन आस्था जन्म देती है संस्कृति को और संस्कृति के स्थायित्व से ही जन्म लेती है कोई महान सभ्यता। दुनिया भर में नदियों ने हमें अनेक महान सभ्यताएँ दी हैं। सिन्धु नदी ने दी ‘सिन्धु-घाटी सभ्यता’ (हड़प्पा और मुअन-जो-दाड़ो)। सिन्धु सभ्यता की प्राचीन लिपि पढ़ी तो नहीं जा सकी लेकिन उस लिपि के अपने आप में पूर्ण और उन्नत होने पर सभी विद्वान सहमत हैं। मैसोपोटामियां और हड़प्पा में व्यापारिक संबंध कितने व्यवस्थित थे इसकी कहानी अनेक मुहरबंद पार्सलों पर लगी मुहरें कहती हैं। नील नदी (मिस्री भाषा में ‘इतेरू’) ने दी ‘मिस्र की सभ्यता’ जहाँ फ़राऊनों के बनवाये अद्‌भुत पिरॅमिडों को देखकर जो सवाल मस्तिष्क में आते हैं उनका उत्तर इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है। &lt;br /&gt;
          गंगा और यमुना ने भी हमें सभ्यता और संस्कृति दी हैं। मागध सभ्यता में जन्मे सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और देवानाम्प्रियं अशोक (असोक) गंगा से उपजी सभ्यता की देन हैं। यमुना की देन है महाभारत कालीन सभ्यता और ब्रज का ‘प्राचीनतम प्रजातंत्र’ जिसके लिए बुद्ध ने मथुरा प्रवास के समय अपने प्रिय शिष्य (उनके भाई और वैद्य भी) ‘आनन्द’ से कहा था कि 'यह (मथुरा) आदि राज्य है, जिसने अपने लिये  महासम्मत (राजा) चुना था।'  यदि इतिहास की बात करें तो अशोक महान के ही समतुल्य राजा कनिष्क ने पुरुषपुर (पेशावर) और मथुरा में अपनी राजधानी बनाई। कुषाण वंशीय कनिष्क ने कला, साहित्य, दर्शन आदि को पर्याप्त संरक्षण दिया। यही संरक्षण एक सामान्य शासक को ‘महान शासक’ के रूप में पहचान दिलाता है। &lt;br /&gt;
          यमुना की देन यह संस्कृति अब ‘ब्रज संस्कृति’ कहलाती है। ‘ब्रज’ शब्द से अभिप्राय सामान्यत: मथुरा ज़िला और उसके आस-पास का क्षेत्र समझा जाता है। वैदिक साहित्य में ब्रज शब्द का प्रयोग प्राय: पशुओं के समूह, उनके चारागाह (चरने के स्थान) या उनके बाडे़ के अर्थ में है। रामायण, महाभारत और समकालीन संस्कृत साहित्य में सामान्यत: यही अर्थ 'ब्रज' का संदर्भ है। 'स्थान' के अर्थ में ब्रज शब्द का उपयोग पुराणों में गाहे-बगाहे आया है, विद्वान मानते हैं कि यह गोकुल के लिये प्रयुक्त है। कोशकारों ने ब्रज के तीन अर्थ लिखे हैं - (गायों का खिरक), मार्ग और वृंद (झुंड) - गोष्ठाध्वनिवहा व्रज:। इससे भी गायों से संबंधित स्थान का ही बोध होता है। सायण ने सामान्यत: 'व्रज' का अर्थ गोष्ठ किया है। गोष्ठ के दो प्रकार हैं :- 'खिरक’- वह स्थान जहाँ गायें, बैल, बछड़े आदि को बाँधा जाता है और दूसरा है ‘गोचर भूमि’- जहाँ गायें चरती हैं। इन सब से भी गायों के स्थान का ही बोध होता है। इस संस्कृत शब्द ‘व्रज’ से ब्रज भाषा का शब्द ‘ब्रज’ बना है। गायों का पालन ब्रज में प्राचीन काल से होता है। संकर्षण (कृष्ण के भाई बलराम) ने कहा भी है कि ब्रज की भूमि गायों के अत्यधिक विचरण से उपजाऊ नहीं रही है। गो-पाल, गो-वर्धन आदि सभी शब्द गाय से ही संबंधित हैं। महाभारत के आदिपर्व में आया है कि मथुरा अति सुन्दर गायों के लिए उन दिनों प्रसिद्ध थी।&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत आदिपर्व 221 | 46 &amp;lt;/ref&amp;gt;[[चित्र:Holi-braj.png|बल्देव में होली|border|right|300px]]&lt;br /&gt;
          ब्रज में ही स्वामी हरिदास का जीवन, 'एक ही वस्त्र और एक मिट्टी का करवा' नियम पालन में बीता और इनका गायन सुनने के लिए राजा महाराजा भी कुटिया के द्वार पर आसन जमाए घन्टों बैठे रहते थे। बैजूबावरा, तानसेन, नायक बख़्शू (ध्रुपद-धमार प्रसिद्धि) जैसे अमर संगीतकारों ने संगीत की सेवा ब्रज में रहकर ही की थी। अष्टछाप कवियों के अलावा बिहारी, अमीर ख़ुसरो, भूषण, घनानन्द आदि ब्रज-भाषा के कवि, साहित्य में अमर हैं। ब्रज भाषा के साहित्यिक प्रयोग के उदाहरण महाराष्ट्र में तेरहवीं शताब्दी में ‘महानुभाव संप्रदाय’ द्वारा मिलते हैं। बाद में उन्नीसवीं शती तक गुजरात, असम, मणिपुर, केरल तक भी साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ। ब्रज भाषा के प्रयोग के बिना शास्त्रीय गायन की कल्पना करना भी असंभव है। आज भी फ़िल्मों के गीतों में मधुरता लाने के लिए ब्रज भाषा का ही प्रयोग होता है।  ब्रज भाषा में जिन शब्दों का प्रयोग होता है वे या तो ब्रजभाषा में मिलते हैं या फिर संस्कृत में। हिन्दी में इन शब्दों का प्रयोग नहीं है जैसे पोखर, बीजना, कण्डिया आदि।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! ब्रजभाषा	&lt;br /&gt;
! संस्कृत	&lt;br /&gt;
! हिन्दी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पोखर 	&lt;br /&gt;
| पुष्कर 	&lt;br /&gt;
| तालाब&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बीजना	&lt;br /&gt;
| व्यजनम्‌ 	&lt;br /&gt;
| हाथ का पंखा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कण्डिया	&lt;br /&gt;
| कण्डोल: &lt;br /&gt;
| टोकरी&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          पौराणिक ग्रंथों में मथुरा के अनेक उल्लेख हैं। वराह पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वराह पुराण 152 | 8 एवं 11 &amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- विष्णु कहते हैं कि इस पृथिवी या अन्तरिक्ष या पाताल लोक में कोई ऐसा स्थान नहीं है जो मथुरा के समान मुझे प्यारा हो- मथुरा मेरा प्रसिद्ध क्षेत्र है और मुक्तिदायक है, इससे बढ़कर मुझे कोई अन्य स्थल नहीं लगता। पद्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;पद्म पुराण 4 | 69 | 12  &amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- 'माथुरक नाम विष्णु को अत्यन्त प्रिय है'। हरिवंश पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व, 57 | 2-3&amp;lt;/ref&amp;gt; में मथुरा का सुन्दर वर्णन किया है: 'मथुरा मध्य-देश का ककुद (अर्थात् अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थल) है, यह लक्ष्मी का निवास-स्थल है, या पृथिवी का श्रृंग है। इसके समान कोई अन्य नहीं है और यह प्रभूत धन-धान्य से पूर्ण है।'&amp;lt;ref&amp;gt;तस्मान्माथुरक नाम विष्णोरेकान्तवल्लभम्। पद्म पुराण 4 | 69 | 12&lt;br /&gt;
मध्यदेशस्य ककुदं धाम लक्ष्म्याश्च केवलम्। &lt;br /&gt;
श्रृंगं पृथिव्या: स्वालक्ष्यं प्रभूतधनधान्यवत्॥ हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व, 57 | 2-3 &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
          ब्रज की मान्यताएँ और कहावतें ख़ासी दिलचस्प हैं “मथुरा की बेटी गोकुल की गाय। करम फूटै तौ अनत जाय”। इससे सीधा अर्थ यही निकलता है कि ब्रज-क्षेत्र की बेटियों का विवाह ब्रज में ही होने की परम्परा थी और गोकुल की गायों को भी गोकुल से बाहर भेजने की परम्परा नहीं थी। चूँकि पुत्री को 'दुहिता' कहा गया है अर्थात गाय दुहने और गऊ सेवा करने वाली। इसलिए बेटी गऊ की सेवा से वंचित हो जाती है और गायों की सेवा ब्रज जैसी होना बाहर कठिन है। वृद्ध होने पर गायों को कटवा भी दिया जाता था, जो ब्रज में संभव नहीं था। ब्रज के संत अक्सर कहा करते थे कि ‘ब्रजहिं छोड़ बैकुंठउ न जइहों’। (ब्रज को छोड़ कर स्वर्ग के आनंद भोगने का मन भी नहीं होता।) ‘मानुस हों तो वही रसखान, बसों ब्रज गोकुल गाँव की ग्वारन’। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं जो ब्रज को अद्भुत बनाते हैं। ब्रज के संतों ने और ब्रजवासियों ने तो कभी मोक्ष की कामना भी नहीं की क्योंकि ब्रज में इह लीला के समाप्त होने पर ब्रजवासी, ब्रज में ही वृक्ष का रूप धारण करता है अर्थात ब्रजवासी मृत्यु के पश्चात स्वर्गवासी न होकर ब्रजवासी ही रहता है और यह क्रम अनन्त काल से चल रहा है। ऐसी अनोखी मान्यता है ब्रज की।[[चित्र:Kambojika.jpg|कम्बोजिका|200px|left]]&lt;br /&gt;
          शूरसेन देश (महाजनपद) की मुख्य नगरी ‘मथुरा’ के विषय में कोई वैदिक संकेत नहीं प्राप्त हुआ है किन्तु ई.पू. पाँचवीं शताब्दी से इसका अस्तित्व सिद्ध हो चुका है। अंगुत्तरनिकाय&amp;lt;ref&amp;gt;अंगुत्तरनिकाय 1 | 167, एकं समयं आयस्मा महाकच्छानो मधुरायं विहरति गुन्दावने [&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं मज्झिम&amp;lt;ref&amp;gt;मज्झिम 2 | 84 &amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि बुद्ध के एक महान शिष्य महाकाच्यायन ने मथुरा में अपने गुरु के सिद्धान्तों की शिक्षा दी। मैगस्थनीज़ सम्भवत: मथुरा को जानता था और इसके साथ हरेक्लीज के सम्बन्ध से भी परिचित था। 'माथुर'&amp;lt;ref&amp;gt;मथुरा का निवासी, या वहाँ उत्पन्न हुआ या मथुरा से आया हुआ &amp;lt;/ref&amp;gt; शब्द जैमिनि के पूर्व मीमांसासूत्र में भी आया है। यद्यपि पाणिनि के सूत्रों में स्पष्ट रूप से 'मथुरा' शब्द नहीं आया है, किन्तु वरणादि-गण&amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि, 4 | 2 | 82   &amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका प्रयोग मिलता है। किन्तु पाणिनि को वासुदेव, अर्जुन&amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि 4 | 3 | 98  &amp;lt;/ref&amp;gt;, यादवों के अन्धक-वृष्णि लोग, सम्भवत: गोविन्द भी&amp;lt;ref&amp;gt;3 | 1 | 138 एवं वार्तिक 'गविच विन्दे: संज्ञायाम्'  &amp;lt;/ref&amp;gt; ज्ञात थे। ब्रज क्षेत्र जो कभी शूरसेन जनपद था उसके नामकरण के संबंध में विद्वानों के अनेक मत हैं किन्तु कोई भी सर्वमान्य नहीं है। शत्रुघ्न के पुत्र शूरसेन के नाम पर नामकरण संभव नहीं लगता क्योंकि वाल्मीकि रामायण में सीताहरण के बाद सुग्रीव ने वानरों को सीता की खोज में उत्तर दिशा में भेजा तो शतबलि और वानरों से कहा- 'उत्तर में म्लेच्छ' पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल , भरत (इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर के आसपास के प्रान्त), कुरु (कुरुदेश) (दक्षिण कुरु- कुरुक्षेत्र के आसपास की भूमि), मद्र, कम्बोज, यवन, शकों के देशों एवं नगरों में भली भाँति अनुसन्धान करके दरद देश में और हिमालय पर्वत पर ढूँढ़ो।&amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायाण,किष्किन्धाकाण्ड़,त्रिचत्वारिंशः सर्गः। &lt;br /&gt;
तत्र म्लेच्छान् पुलिन्दांश्र्च शूरसेनां स्तथैव च।&lt;br /&gt;
प्रस्थलान् भरतांश्र्चैव कुरुंश्र्च सह मद्रकैः॥ &lt;br /&gt;
काम्बोजयवनांश्र्चैव शकानां पत्तनानि च। &amp;lt;/ref&amp;gt; इससे स्पष्ट है कि शत्रुघ्न के पुत्र से पहले ही 'शूरसेन' जनपद नाम अस्तित्व में था। हैहयवंशी कार्तवीर्य अर्जुन के सौ पुत्रों में से एक का नाम शूरसेन था और उसके नाम पर यह शूरसेन राज्य का नामकरण होने की संभावना भी है, किन्तु हैहयवंशी कार्तवीर्य अर्जुन का मथुरा से कोई सीधा संबंध होना स्पष्ट नहीं है। महाभारत के समय में मथुरा शूरसेन देश की प्रख्यात नगरी थी। लवणासुर (मधु के पुत्र) के वधोपरांत शत्रुघ्न ने इस नगरी को पुन: बसाया था। &lt;br /&gt;
          ब्रज की कला के अनेक आयाम हैं। जिनमें मूर्तिकला तो निश्चय ही बेजोड़ है। बौद्ध भिक्षु यशदिन्न जैसे मूर्तिकारों की बेमिसाल कृतियाँ राष्ट्रपति भवन, फ़्रांस के संग्रहालय मुसी ग्युमित और राजकीय संग्रहालय मथुरा में सुरक्षित हैं। अद्‌भुत बात यह है कि यशदिन्न ने केवल तीन मूर्तियाँ ही बनाईं और तीनों एक ही जैसी। इन आदमक़द आकार से भी बड़ी मूर्तियों में बुद्ध को पारदर्शी चीवर पहने दिखाया गया है। माथुरी मूर्तिकला, जो गांधार मूर्तिकला का भी रूप है, ब्रज क्षेत्र में अपने पूरे उत्कर्ष पर रहने के बावजूद भी न जाने कब और कहाँ गुम हो गयी? वे मूर्तिकार कहाँ चले गये और कोई भी ऐसा निशान नहीं छोड़ गये कि जिससे उनके लुप्त होने का कारण पता चलता ? &lt;br /&gt;
          मथुरा में पुरा-उत्खनन का कार्य मुख्य रूप से एक अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने 1871 और 1882-83 में कराया। अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने भारत के पुरातत्त्व विभाग के निदेशक के रूप में 1870 से 1885 ई. तक काम किया। इस उत्खनन ने अनेक रहस्य खोल दिए जिनके बारे में 1874 के दौर में मथुरा के कलॅक्टर एफ़ एस ग्राउज़ ने ‘मथुरा अ डिस्ट्रिक्ट मॅमोइर’ में बहुत ख़ूबसूरत ढंग से उल्लेख किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह पुस्तक, लेखक की वेबसाइट, www.brajdiscovery.org पर उपलब्ध है।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[चित्र:Govindev-temple-1.jpg|गोविन्ददेव जी, वृन्दावन|border|right|300px]]&lt;br /&gt;
          मथुरा में मिली राज्वुल की राज महिषी ‘कम्बोजिका’ की ख़ूबसूरत मूर्ति माथुरी, गांधार और यवन कला के मेल का अद्‌भुत नमूना है। कम्बोजिका की शान में ही राज्वुल ([[राजबुल]] या बाद में राजुल भी) ने ऐतिहासिक सिंह शीर्ष (Lion Capitol) लगवाया था जो अब लंदन के संग्रहालय में सुरक्षित है। &lt;br /&gt;
          ब्रज में वास्तुकला के भी विलक्षण प्रयोग हुए हैं। जिनमें उत्तर-भारत में वास्तुशैली का उत्कृष्टतम सृजन वृंदावन का गोविन्ददेव जी मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण में उत्तर और दक्षिण भारत की हिन्दू मंदिर निर्माण शैली, जयपुर-राजस्थानी शैली, मुग़ल शैली, यूनानी शैली और गोथिक&amp;lt;ref&amp;gt;गोथिक शैली से अभिप्राय तिकोने मेहराबों वाली यूरोपीय शैली से है जिससे इमारत के विशाल होने का आभास होता है &amp;lt;/ref&amp;gt; शैली का प्रयोग हुआ है। बादशाह अकबर ने भी इस मंदिर के निर्माण के लिए लाल पत्थर भिजवाया था। कहते हैं कि यह सात मंज़िल का था किन्तु अब चार ही बची हैं। गोवर्धन में हरदेव मंदिर, वृन्दावन में जुगल किशोर, राधा वल्लभ, गोपीनाथ और मदनमोहन मंदिर की गणना प्राचीन मंदिरों में होती है किन्तु अब इन मंदिरों में धार्मिक पर्यटक नहीं आते केवल इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले पर्यटक ही आते हैं। चैतन्य महाप्रभु के शिष्यों-जीव गोस्वामी, रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी ने वृंदावन में इन मंदिरों का निर्माण कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये सभी मंदिर औरंगज़ेब के शासन में उजाड़े और तोड़े गये, साथ ही वृंदावन का नाम ‘मोमिना बाद’ और मथुरा का नाम ‘इस्लामाबाद’ कर दिया गया। &lt;br /&gt;
          मथुरा में सबसे प्राचीन और विशालतम मंदिर केशवदेव जी का था। इस मंदिर के अवशेष भी अब मौजूद नहीं हैं। यह स्थान लगभग वही है जहाँ आज कृष्ण जन्मभूमि है। ईसा पूर्व सन् 80-57 के महाक्षत्रप सौदास (शोडास अथवा षोडास) के समय के एक ब्राह्मी लिपि शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक मंदिर तोरण द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था। दोबारा यह मंदिर गुप्तकाल में बना जो महमूद ग़ज़नवी का कोपभाजन बना। तीसरी बार ग्यारहवीं शताब्दी में बना जिसे इब्राहिम लोदी ने तुड़वाया। चौथी बार मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शासनकाल में ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जू देव ने इसे बनवाया जिसे औरंगज़ेब ने तुड़वाया। इसकी भव्यता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इसके संबंध में फ़्रांसीसी यात्री तॅवरनियर (Jean-Baptiste Tavernier) ने लिखा है कि “यह मंदिर भारत की सबसे भव्य और सुन्दर इमारतों में से एक है… जो 5 से 6 कोस की दूरी से भी दिखाई देती है”।&amp;lt;ref&amp;gt;ट्रॅवल्स इन इंडिया लेखक: ज़्यां-बॅपतिस्ते तॅवरनियर अध्याय 12 पृष्ठ 272&amp;lt;/ref&amp;gt; एक कोस (क्रोश) में लगभग 3 किलोमीटर होते हैं तो यह दूरी लगभग 16 किलोमीटर होती है। &lt;br /&gt;
          ब्रज की पहचान कृष्ण, मोर, गाय, गोधूलि, करील, कदम्ब, यमुना आदि से होती रही है तो ब्रजसंस्कृति की पहचान के चिह्न हैं होली, सावन के झूले और गीत, नौटंकी (सांगीत), मंदिर, यमुना के घाट, भांग-ठंडाई, मथुरा के चौबे, कंस मेला, मुड़िया पूनों का मेला और हाँ निश्चित रूप से आपकी प्रिय मिठाई ‘पेड़ा’।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9C_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%85%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E2%80%8C%E0%A4%AD%E0%A5%81%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1592</id>
		<title>ब्रज एक अद्‌भुत संस्कृति -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-25T10:18:50Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;‘ब्रज’ एक अद्‌भुत संस्कृति&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Mathura-Yamuna.jpg|यमुना|798px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          ब्रज का ज़िक्र आते ही जो सबसे पहली आवाज़ हमारी स्मृति में आती है, वह है घाटों से टकराती हुई यमुना की लहरों की आवाज़… कृष्ण के साथ-साथ खेलकर यमुना ने बुद्ध और महावीर के प्रवचनों को साक्षात उन्हीं के मुख से अपनी लहरों को थाम कर सुना… फ़ाह्यान की चीनी भाषा में कहे गये मो-तो-लो (मोरों का नृत्य स्थल ‘मथुरा’) को भी समझ लिया और प्लिनी के ‘जोमनेस’ उच्चारण को भी… यमुना की ये लहरें रसख़ान और रहीम के दोहों पर झूमी हैं… सूर और मीरा के पदों पर नाची हैं… लेकिन महमूद ग़ज़नवी के नरसंहार से रक्ताभ हुई ये यमुना की सहमी हुई लहरों को मियां तानसेन की तोड़ी से कितनी राहत मिली थी यह तो यमुना ही जाने… बादशाह अकबर के बनवाये हुए घाटों को अभी अच्छी तरह पखार भी न पायी थी यमुना… कि अहमद शाह अब्दाली ने इन लहरों को ब्रजवासियों के रक्त से सने उसके सिपाहियों के हाथों को धोने पर मजबूर किया… यह सब तो चलता ही रहा साथ ही साथ यमुना ने ही जन्म दिया ब्रज-संस्कृति को…[[चित्र:Krishn-title.jpg|right|250px]]&lt;br /&gt;
          ब्रज की संस्कृति के साथ ही 'ब्रज' शब्द का चलन भक्ति आन्दोलन के दौरान पूरे चरम पर पहुँच गया। चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्दी की कृष्ण भक्ति की व्यापक लहर ने ब्रज शब्द की पवित्रता को जन-जन में पूर्ण रूप से प्रचारित कर दिया। सूर, मीरां (मीरा) और रसख़ान के भजन तो जैसे आज भी ब्रज के वातावरण में गूंजते रहते हैं। कृष्ण भक्ति में ऐसा क्या है जिसने मीरां से राजसी रहन-सहन छुड़वा दिया और सूर की रचनाओं की गहराई को जानकर विश्व भर में इस विषय पर ही शोध होता रहा कि सूर वास्तव में दृष्टिहीन थे भी या नहीं। संगीत विशेषज्ञों की एक धारणा यह भी है कि ब्रज में सोलह हज़ार राग रागनियों का निर्माण हुआ था। जिन्हें कृष्ण की रानियाँ भी कहा जाता है।[[चित्र:Buddha-3.jpg|150px|left|border|बुद्ध प्रतिमा]]&lt;br /&gt;
          ...कहते हैं कि आस्था के प्रश्नों के उत्तर इतिहास में नहीं खोजे जाते लेकिन आस्था जन्म देती है संस्कृति को और संस्कृति के स्थायित्व से ही जन्म लेती है कोई महान सभ्यता। दुनिया भर में नदियों ने हमें अनेक महान सभ्यताएँ दी हैं। सिन्धु नदी ने दी ‘सिन्धु-घाटी सभ्यता’ (हड़प्पा और मुअन-जो-दाड़ो)। सिन्धु सभ्यता की प्राचीन लिपि पढ़ी तो नहीं जा सकी लेकिन उस लिपि के अपने आप में पूर्ण और उन्नत होने पर सभी विद्वान सहमत हैं। मैसोपोटामियां और हड़प्पा में व्यापारिक संबंध कितने व्यवस्थित थे इसकी कहानी अनेक मुहरबंद पार्सलों पर लगी मुहरें कहती हैं। नील नदी (मिस्री भाषा में ‘इतेरू’) ने दी ‘मिस्र की सभ्यता’ जहाँ फ़राऊनों के बनवाये अद्‌भुत पिरॅमिडों को देखकर जो सवाल मस्तिष्क में आते हैं उनका उत्तर इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है। &lt;br /&gt;
          गंगा और यमुना ने भी हमें सभ्यता और संस्कृति दी हैं। मागध सभ्यता में जन्मे सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और देवानाम्प्रियं अशोक (असोक) गंगा से उपजी सभ्यता की देन हैं। यमुना की देन है महाभारत कालीन सभ्यता और ब्रज का ‘प्राचीनतम प्रजातंत्र’ जिसके लिए बुद्ध ने मथुरा प्रवास के समय अपने प्रिय शिष्य (उनके भाई और वैद्य भी) ‘आनन्द’ से कहा था कि 'यह (मथुरा) आदि राज्य है, जिसने अपने लिये  महासम्मत (राजा) चुना था।'  यदि इतिहास की बात करें तो अशोक महान के ही समतुल्य राजा [[कनिष्क]] ने पुरुषपुर ([[पेशावर]]) और [[मथुरा]] में अपनी राजधानी बनाई। कुषाण वंशीय कनिष्क ने कला, साहित्य, दर्शन आदि को पर्याप्त संरक्षण दिया। यही संरक्षण एक सामान्य शासक को ‘महान शासक’ के रूप में पहचान दिलाता है। &lt;br /&gt;
          यमुना की देन यह संस्कृति अब ‘ब्रज संस्कृति’ कहलाती है। ‘ब्रज’ शब्द से अभिप्राय सामान्यत: मथुरा ज़िला और उसके आस-पास का क्षेत्र समझा जाता है। वैदिक साहित्य में ब्रज शब्द का प्रयोग प्राय: पशुओं के समूह, उनके चारागाह (चरने के स्थान) या उनके बाडे़ के अर्थ में है। रामायण, महाभारत और समकालीन संस्कृत साहित्य में सामान्यत: यही अर्थ 'ब्रज' का संदर्भ है। 'स्थान' के अर्थ में ब्रज शब्द का उपयोग पुराणों में गाहे-बगाहे आया है, विद्वान मानते हैं कि यह गोकुल के लिये प्रयुक्त है। कोशकारों ने ब्रज के तीन अर्थ लिखे हैं - (गायों का खिरक), मार्ग और वृंद (झुंड) - गोष्ठाध्वनिवहा व्रज:। इससे भी गायों से संबंधित स्थान का ही बोध होता है। सायण ने सामान्यत: 'व्रज' का अर्थ गोष्ठ किया है। गोष्ठ के दो प्रकार हैं :- 'खिरक’- वह स्थान जहाँ गायें, बैल, बछड़े आदि को बाँधा जाता है और दूसरा है ‘गोचर भूमि’- जहाँ गायें चरती हैं। इन सब से भी गायों के स्थान का ही बोध होता है। इस संस्कृत शब्द ‘व्रज’ से ब्रज भाषा का शब्द ‘ब्रज’ बना है। गायों का पालन ब्रज में प्राचीन काल से होता है। संकर्षण (कृष्ण के भाई बलराम) ने कहा भी है कि ब्रज की भूमि गायों के अत्यधिक विचरण से उपजाऊ नहीं रही है। गो-पाल, गो-वर्धन आदि सभी शब्द गाय से ही संबंधित हैं। महाभारत के आदिपर्व में आया है कि मथुरा अति सुन्दर गायों के लिए उन दिनों प्रसिद्ध थी।&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत आदिपर्व 221 | 46 &amp;lt;/ref&amp;gt;[[चित्र:Holi-braj.png|बल्देव में होली|border|right|300px]]&lt;br /&gt;
          ब्रज में ही स्वामी हरिदास का जीवन, 'एक ही वस्त्र और एक मिट्टी का करवा' नियम पालन में बीता और इनका गायन सुनने के लिए राजा महाराजा भी कुटिया के द्वार पर आसन जमाए घन्टों बैठे रहते थे। बैजूबावरा, तानसेन, नायक बख़्शू (ध्रुपद-धमार प्रसिद्धि) जैसे अमर संगीतकारों ने संगीत की सेवा ब्रज में रहकर ही की थी। अष्टछाप कवियों के अलावा बिहारी, अमीर ख़ुसरो, भूषण, घनानन्द आदि ब्रज-भाषा के कवि, साहित्य में अमर हैं। ब्रज भाषा के साहित्यिक प्रयोग के उदाहरण महाराष्ट्र में तेरहवीं शताब्दी में ‘महानुभाव संप्रदाय’ द्वारा मिलते हैं। बाद में उन्नीसवीं शती तक गुजरात, असम, मणिपुर, केरल तक भी साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ। ब्रज भाषा के प्रयोग के बिना शास्त्रीय गायन की कल्पना करना भी असंभव है। आज भी फ़िल्मों के गीतों में मधुरता लाने के लिए ब्रज भाषा का ही प्रयोग होता है।  ब्रज भाषा में जिन शब्दों का प्रयोग होता है वे या तो ब्रजभाषा में मिलते हैं या फिर संस्कृत में। हिन्दी में इन शब्दों का प्रयोग नहीं है जैसे पोखर, बीजना, कण्डिया आदि।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! ब्रजभाषा	&lt;br /&gt;
! संस्कृत	&lt;br /&gt;
! हिन्दी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पोखर 	&lt;br /&gt;
| पुष्कर 	&lt;br /&gt;
| तालाब&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बीजना	&lt;br /&gt;
| व्यजनम्‌ 	&lt;br /&gt;
| हाथ का पंखा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कण्डिया	&lt;br /&gt;
| कण्डोल: &lt;br /&gt;
| टोकरी&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          पौराणिक ग्रंथों में मथुरा के अनेक उल्लेख हैं। वराह पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वराह पुराण 152 | 8 एवं 11 &amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- विष्णु कहते हैं कि इस पृथिवी या अन्तरिक्ष या पाताल लोक में कोई ऐसा स्थान नहीं है जो मथुरा के समान मुझे प्यारा हो- मथुरा मेरा प्रसिद्ध क्षेत्र है और मुक्तिदायक है, इससे बढ़कर मुझे कोई अन्य स्थल नहीं लगता। पद्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;पद्म पुराण 4 | 69 | 12  &amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- 'माथुरक नाम विष्णु को अत्यन्त प्रिय है'। हरिवंश पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व, 57 | 2-3&amp;lt;/ref&amp;gt; में मथुरा का सुन्दर वर्णन किया है: 'मथुरा मध्य-देश का ककुद (अर्थात् अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थल) है, यह लक्ष्मी का निवास-स्थल है, या पृथिवी का श्रृंग है। इसके समान कोई अन्य नहीं है और यह प्रभूत धन-धान्य से पूर्ण है।'&amp;lt;ref&amp;gt;तस्मान्माथुरक नाम विष्णोरेकान्तवल्लभम्। पद्म पुराण 4 | 69 | 12&lt;br /&gt;
मध्यदेशस्य ककुदं धाम लक्ष्म्याश्च केवलम्। &lt;br /&gt;
श्रृंगं पृथिव्या: स्वालक्ष्यं प्रभूतधनधान्यवत्॥ हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व, 57 | 2-3 &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
          ब्रज की मान्यताएँ और कहावतें ख़ासी दिलचस्प हैं “मथुरा की बेटी गोकुल की गाय। करम फूटै तौ अनत जाय”। इससे सीधा अर्थ यही निकलता है कि ब्रज-क्षेत्र की बेटियों का विवाह ब्रज में ही होने की परम्परा थी और गोकुल की गायों को भी गोकुल से बाहर भेजने की परम्परा नहीं थी। चूँकि पुत्री को 'दुहिता' कहा गया है अर्थात गाय दुहने और गऊ सेवा करने वाली। इसलिए बेटी गऊ की सेवा से वंचित हो जाती है और गायों की सेवा ब्रज जैसी होना बाहर कठिन है। वृद्ध होने पर गायों को कटवा भी दिया जाता था, जो ब्रज में संभव नहीं था। ब्रज के संत अक्सर कहा करते थे कि ‘ब्रजहिं छोड़ बैकुंठउ न जइहों’। (ब्रज को छोड़ कर स्वर्ग के आनंद भोगने का मन भी नहीं होता।) ‘मानुस हों तो वही रसखान, बसों ब्रज गोकुल गाँव की ग्वारन’। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं जो ब्रज को अद्भुत बनाते हैं। ब्रज के संतों ने और ब्रजवासियों ने तो कभी मोक्ष की कामना भी नहीं की क्योंकि ब्रज में इह लीला के समाप्त होने पर ब्रजवासी, ब्रज में ही वृक्ष का रूप धारण करता है अर्थात ब्रजवासी मृत्यु के पश्चात स्वर्गवासी न होकर ब्रजवासी ही रहता है और यह क्रम अनन्त काल से चल रहा है। ऐसी अनोखी मान्यता है ब्रज की।[[चित्र:Kambojika.jpg|कम्बोजिका|200px|left]]&lt;br /&gt;
          शूरसेन देश (महाजनपद) की मुख्य नगरी ‘मथुरा’ के विषय में कोई वैदिक संकेत नहीं प्राप्त हुआ है किन्तु ई.पू. पाँचवीं शताब्दी से इसका अस्तित्व सिद्ध हो चुका है। अंगुत्तरनिकाय&amp;lt;ref&amp;gt;अंगुत्तरनिकाय 1 | 167, एकं समयं आयस्मा महाकच्छानो मधुरायं विहरति गुन्दावने [&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं मज्झिम&amp;lt;ref&amp;gt;मज्झिम 2 | 84 &amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि बुद्ध के एक महान शिष्य महाकाच्यायन ने मथुरा में अपने गुरु के सिद्धान्तों की शिक्षा दी। मैगस्थनीज़ सम्भवत: मथुरा को जानता था और इसके साथ हरेक्लीज के सम्बन्ध से भी परिचित था। 'माथुर'&amp;lt;ref&amp;gt;मथुरा का निवासी, या वहाँ उत्पन्न हुआ या मथुरा से आया हुआ &amp;lt;/ref&amp;gt; शब्द जैमिनि के पूर्व मीमांसासूत्र में भी आया है। यद्यपि पाणिनि के सूत्रों में स्पष्ट रूप से 'मथुरा' शब्द नहीं आया है, किन्तु वरणादि-गण&amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि, 4 | 2 | 82   &amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका प्रयोग मिलता है। किन्तु पाणिनि को वासुदेव, अर्जुन&amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि 4 | 3 | 98  &amp;lt;/ref&amp;gt;, यादवों के अन्धक-वृष्णि लोग, सम्भवत: गोविन्द भी&amp;lt;ref&amp;gt;3 | 1 | 138 एवं वार्तिक 'गविच विन्दे: संज्ञायाम्'  &amp;lt;/ref&amp;gt; ज्ञात थे। ब्रज क्षेत्र जो कभी शूरसेन जनपद था उसके नामकरण के संबंध में विद्वानों के अनेक मत हैं किन्तु कोई भी सर्वमान्य नहीं है। शत्रुघ्न के पुत्र शूरसेन के नाम पर नामकरण संभव नहीं लगता क्योंकि वाल्मीकि रामायण में सीताहरण के बाद सुग्रीव ने वानरों को सीता की खोज में उत्तर दिशा में भेजा तो शतबलि और वानरों से कहा- 'उत्तर में म्लेच्छ' पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल , भरत (इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर के आसपास के प्रान्त), कुरु (कुरुदेश) (दक्षिण कुरु- कुरुक्षेत्र के आसपास की भूमि), मद्र, कम्बोज, यवन, शकों के देशों एवं नगरों में भली भाँति अनुसन्धान करके दरद देश में और हिमालय पर्वत पर ढूँढ़ो।&amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायाण,किष्किन्धाकाण्ड़,त्रिचत्वारिंशः सर्गः। &lt;br /&gt;
तत्र म्लेच्छान् पुलिन्दांश्र्च शूरसेनां स्तथैव च।&lt;br /&gt;
प्रस्थलान् भरतांश्र्चैव कुरुंश्र्च सह मद्रकैः॥ &lt;br /&gt;
काम्बोजयवनांश्र्चैव शकानां पत्तनानि च। &amp;lt;/ref&amp;gt; इससे स्पष्ट है कि शत्रुघ्न के पुत्र से पहले ही 'शूरसेन' जनपद नाम अस्तित्व में था। हैहयवंशी कार्तवीर्य अर्जुन के सौ पुत्रों में से एक का नाम शूरसेन था और उसके नाम पर यह शूरसेन राज्य का नामकरण होने की संभावना भी है, किन्तु हैहयवंशी कार्तवीर्य अर्जुन का मथुरा से कोई सीधा संबंध होना स्पष्ट नहीं है। महाभारत के समय में मथुरा शूरसेन देश की प्रख्यात नगरी थी। लवणासुर (मधु के पुत्र) के वधोपरांत शत्रुघ्न ने इस नगरी को पुन: बसाया था। &lt;br /&gt;
          ब्रज की कला के अनेक आयाम हैं। जिनमें मूर्तिकला तो निश्चय ही बेजोड़ है। बौद्ध भिक्षु यशदिन्न जैसे मूर्तिकारों की बेमिसाल कृतियाँ राष्ट्रपति भवन, फ़्रांस के संग्रहालय मुसी ग्युमित और राजकीय संग्रहालय मथुरा में सुरक्षित हैं। अद्‌भुत बात यह है कि यशदिन्न ने केवल तीन मूर्तियाँ ही बनाईं और तीनों एक ही जैसी। इन आदमक़द आकार से भी बड़ी मूर्तियों में बुद्ध को पारदर्शी चीवर पहने दिखाया गया है। माथुरी मूर्तिकला, जो गांधार मूर्तिकला का भी रूप है, ब्रज क्षेत्र में अपने पूरे उत्कर्ष पर रहने के बावजूद भी न जाने कब और कहाँ गुम हो गयी? वे मूर्तिकार कहाँ चले गये और कोई भी ऐसा निशान नहीं छोड़ गये कि जिससे उनके लुप्त होने का कारण पता चलता ? &lt;br /&gt;
          मथुरा में पुरा-उत्खनन का कार्य मुख्य रूप से एक अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने 1871 और 1882-83 में कराया। अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने भारत के पुरातत्त्व विभाग के निदेशक के रूप में 1870 से 1885 ई. तक काम किया। इस उत्खनन ने अनेक रहस्य खोल दिए जिनके बारे में 1874 के दौर में मथुरा के कलॅक्टर एफ़ एस ग्राउज़ ने ‘मथुरा अ डिस्ट्रिक्ट मॅमोइर’ में बहुत ख़ूबसूरत ढंग से उल्लेख किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह पुस्तक, लेखक की वेबसाइट, www.brajdiscovery.org पर उपलब्ध है।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[चित्र:Govindev-temple-1.jpg|गोविन्ददेव जी, वृन्दावन|border|right|300px]]&lt;br /&gt;
          मथुरा में मिली राज्वुल की राज महिषी ‘कम्बोजिका’ की ख़ूबसूरत मूर्ति माथुरी, गांधार और यवन कला के मेल का अद्‌भुत नमूना है। कम्बोजिका की शान में ही राज्वुल ([[राजबुल]] या बाद में राजुल भी) ने ऐतिहासिक सिंह शीर्ष (Lion Capitol) लगवाया था जो अब लंदन के संग्रहालय में सुरक्षित है। &lt;br /&gt;
          ब्रज में वास्तुकला के भी विलक्षण प्रयोग हुए हैं। जिनमें उत्तर-भारत में वास्तुशैली का उत्कृष्टतम सृजन वृंदावन का गोविन्ददेव जी मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण में उत्तर और दक्षिण भारत की हिन्दू मंदिर निर्माण शैली, जयपुर-राजस्थानी शैली, मुग़ल शैली, यूनानी शैली और गोथिक&amp;lt;ref&amp;gt;गोथिक शैली से अभिप्राय तिकोने मेहराबों वाली यूरोपीय शैली से है जिससे इमारत के विशाल होने का आभास होता है &amp;lt;/ref&amp;gt; शैली का प्रयोग हुआ है। बादशाह अकबर ने भी इस मंदिर के निर्माण के लिए लाल पत्थर भिजवाया था। कहते हैं कि यह सात मंज़िल का था किन्तु अब चार ही बची हैं। गोवर्धन में हरदेव मंदिर, वृन्दावन में जुगल किशोर, राधा वल्लभ, गोपीनाथ और मदनमोहन मंदिर की गणना प्राचीन मंदिरों में होती है किन्तु अब इन मंदिरों में धार्मिक पर्यटक नहीं आते केवल इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले पर्यटक ही आते हैं। चैतन्य महाप्रभु के शिष्यों-जीव गोस्वामी, रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी ने वृंदावन में इन मंदिरों का निर्माण कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये सभी मंदिर औरंगज़ेब के शासन में उजाड़े और तोड़े गये, साथ ही वृंदावन का नाम ‘मोमिना बाद’ और मथुरा का नाम ‘इस्लामाबाद’ कर दिया गया। &lt;br /&gt;
          मथुरा में सबसे प्राचीन और विशालतम मंदिर केशवदेव जी का था। इस मंदिर के अवशेष भी अब मौजूद नहीं हैं। यह स्थान लगभग वही है जहाँ आज कृष्ण जन्मभूमि है। ईसा पूर्व सन् 80-57 के महाक्षत्रप सौदास (शोडास अथवा षोडास) के समय के एक ब्राह्मी लिपि शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक मंदिर तोरण द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था। दोबारा यह मंदिर गुप्तकाल में बना जो महमूद ग़ज़नवी का कोपभाजन बना। तीसरी बार ग्यारहवीं शताब्दी में बना जिसे इब्राहिम लोदी ने तुड़वाया। चौथी बार मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शासनकाल में ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जू देव ने इसे बनवाया जिसे औरंगज़ेब ने तुड़वाया। इसकी भव्यता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इसके संबंध में फ़्रांसीसी यात्री तॅवरनियर (Jean-Baptiste Tavernier) ने लिखा है कि “यह मंदिर भारत की सबसे भव्य और सुन्दर इमारतों में से एक है… जो 5 से 6 कोस की दूरी से भी दिखाई देती है”।&amp;lt;ref&amp;gt;ट्रॅवल्स इन इंडिया लेखक: ज़्यां-बॅपतिस्ते तॅवरनियर अध्याय 12 पृष्ठ 272&amp;lt;/ref&amp;gt; एक कोस (क्रोश) में लगभग 3 किलोमीटर होते हैं तो यह दूरी लगभग 16 किलोमीटर होती है। &lt;br /&gt;
          ब्रज की पहचान कृष्ण, मोर, गाय, गोधूलि, करील, कदम्ब, यमुना आदि से होती रही है तो ब्रजसंस्कृति की पहचान के चिह्न हैं होली, सावन के झूले और गीत, नौटंकी (सांगीत), मंदिर, यमुना के घाट, भांग-ठंडाई, मथुरा के चौबे, कंस मेला, मुड़िया पूनों का मेला और हाँ निश्चित रूप से आपकी प्रिय मिठाई ‘पेड़ा’।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BF_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1591</id>
		<title>जनतंत्र की जाति -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-25T09:52:50Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;जनतंत्र की जाति&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Jantantra-ki-jaati.JPG|300px|border|right]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          खेल भावना से राजनीति करना एक स्वस्थ मस्तिष्क के विवेक पूर्ण होने की पहचान है लेकिन राजनीति को खेल समझना मस्तिष्क की अपरिपक्वता और विवेक हीनता का द्योतक है। राजनीति को खेल समझने वाला नेता मतदाता को खिलौना और लोकतंत्र को जुआ खेलने की मेज़ समझता है। &lt;br /&gt;
          भारत में या विश्व में कहीं भी लोकतंत्र के ढांचे में जब चुनाव होता है तो जनता अपने मत का प्रयोग करके न सिर्फ़ सरकार चुनती है बल्कि हर एक राजनैतिक दल और उम्मीदवार को एक संदेश भी देती है। यह संदेश भले ही गूढ़ होता हो लेकिन समझने वाले के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस तरह के संदेश जनता चुनाव से इतर भी देती है जो कभी आंदोलन के रूप में होता है या कभी धरना-प्रदर्शन आदि के रूप में होता है। सत्ता के मद में इस प्रकार के संदेश अनदेखे किए जाना चुनाव में भारी पड़ता है।&lt;br /&gt;
          सत्ता किसी की निजी सम्पत्ति नहीं होती, न तो स्थायी रूप से और न ही अस्थाई रूप से। शक्ति राजनैतिक हो या धन की, काफ़ी हद तक समान रूप से ही व्यवहार करती है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी व्यक्ति की जवाबदेही समाज और देश के प्रति है या नहीं, इसी से व्यक्ति का मूल्यांकन होता है।&lt;br /&gt;
          दुम शेर की भी होती है और कुत्ते की भी लेकिन शेर अपनी दुम लहराता है और कुत्ता अपनी दुम हिलाता है। दुम तो दोनों हिलती हैं लेकिन मतलब अलग होता है। ये एक ऐसा फ़र्क़ है जिसको हम समझ लें तो ज़िन्दगी के बहुत से फ़न्डे क्लीयर हो जाते हैं।&lt;br /&gt;
जैसे कि-&lt;br /&gt;
          आज़ादी के वक़्त साढ़े तीन सौ से अधिक छोटी-बड़ी रियासतों में भारत बंटा हुआ था। इन रियासतों के रहनुमा अंग्रेज़ों के आगे जिस द्रुत गति से अपनी दुम हिलाते थे उससे उत्सर्जित होने वाली ऊर्जा से भारत की विद्युत आपूर्ति हो सकती थी। इन रियासतों के सरमायेदारों के नाम, आज जनता में कोई नहीं जानता। इसी समय ही अनेक व्यापारी-व्यवसायी भी थे, उन्हें भी कोई नहीं जानता। हाँ टाटा अवश्य अपवाद हैं लेकिन मैं टाटा को व्यापारी नहीं बल्कि उद्योगपति मानता हूँ जिसकी जवाबदेही जनता और देश के प्रति अवश्य होती है।&lt;br /&gt;
ख़ैर...&lt;br /&gt;
          ऐसा क्यों है कि जनता- गांधी, पटेल, सुभाष, नेहरू, भगतसिंह, सावरकर, अशफ़ाक़ आदि जैसे नाम तो जानती है लेकिन उन राजा-नवाबों के नहीं जो इन्हीं के समय में सत्ता में थे और जिनके कुत्ते भी तंदूरी मुर्ग़ का मज़ा लेते थे।&lt;br /&gt;
जवाब सीधा सा है जिसे सब जानते हैं-&lt;br /&gt;
          शक्ति का प्रयोग अय्याशी और अहंकार के लिए करने वाले शासकों से जनता का सरोकार क्षणिक होता है और शक्ति को जनता का कर्ज़ समझने वाले शासकों को जनता याद रखती है।&lt;br /&gt;
          2014 का चुनाव पिछले चुनावों से कुछ भिन्न रहा। इस चुनाव में सेक्यूलरिज़्म याने धर्म निरपेक्षता शायद अब सामयिक मुद्दा नहीं रहा। नई पीढ़ी 'धर्म सापेक्ष' है और काफ़ी हद तक 'सर्व धर्म सम्मान' या कहें कि 'सर्व धर्म सापेक्ष' है। निश्चय ही 'नीरस धर्म निरपेक्षता' से धर्म के सांस्कृतिक स्वरूप का अनुसरण सुखदायी है। मुझे कभी नहीं लगा कि धर्म निरपेक्षता, संकीर्णता से भरे दिमाग़ से मुक्त होने की कोई गारंटी है। संकीर्णता को एक बार फिर से परिभाषित किए जाने की आवश्यकता है। सिर्फ़ चुनाव में ही नहीं बल्कि आज के ज़माने की शादियों में भी देखने में आ रहा है कि अन्तर-धर्म शादी में नई पीढ़ी के लोग अपने जीवन साथी का धर्म बदलने पर कोई ज़ोर नहीं देते और एक दूसरे के धर्म का सम्मान करते हैं।&lt;br /&gt;
          चुनाव जब भी आते हैं तो जाति और धर्म की बहस मीडिया में शोर मचाने लगती है। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी जाति और धर्म बड़े ज़ोर-शोर से याद दिलाया जाता है। चुनावों में जाति और धर्म के आधार पर ही अधिकतर चुनाव क्षेत्रों की उम्मीदवारी निश्चित की जाती है। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उस राजनैतिक पार्टी का नारा जाति और धर्म का भेदभाव के ख़िलाफ़ है। किसी राजनैतिक दल का श्वेत पत्र या देश का राज पत्र भले ही जाति या धर्म के आधार पर चुनाव न होने की बात करता हो लेकिन मतदाता तो इसी को आधार बना कर मतदान करता है।&lt;br /&gt;
एक संस्मरण- &lt;br /&gt;
          बचपन में मेरी वर्षगाँठ पर हवन करने पंडित जी आया करते थे, वह हमारे शहर के वरिष्ठ और विद्वान माने जाते थे। उस दिन खीर, पूड़ी, हलवा आदि बना करता था। पंडित जी खीर खाने के लिए हँसकर मना कर दिया करते थे। मेरे पूछने पर पिताजी ने बताया कि पंडित जाटों के यहाँ खीर नहीं खाते क्योंकि खीर पक्का खाना नहीं माना जाता, खीर तो कच्चे खाने में आती है। बात-चीत में पंडित जी यह भी कह देते थे कि चौधरी साहब मैं तो ये नियम-धर्म निबाह रहा हूँ पर लगता नहीं कि मेरा बेटा भी यह निबाहेगा। उनको अफ़सोस होता था कि जितनी छुआ-छूत वे मानते हैं, शायद उनका बेटा उतनी नहीं मानेगा और यह सोचकर उदास हो जाते थे। यह सब कुछ सामान्य था और आज भी है। दलित जातियों के भी जो हिंदू धार्मिक कर्मकाण्ड होते हैं उनमें भी ब्राह्मण ही बुलाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
          धुर राजस्थान में जाटों को अछूत की श्रेणी में माना जाता था। जे.पी. दत्ता ने अपनी फ़िल्म 'ग़ुलामी' में यह सब कुछ दिखाया भी है। मेरे ही परिवार के एक सदस्य ने एक बार यह त्रास स्वयं भी झेला। जब उनको एक गाँव के घर में पीने को पानी मांगने पर &amp;quot;दूर हट के पीओ तुम जाट हो&amp;quot; वाक्य सुनना पड़ा। &lt;br /&gt;
          सामाजिक स्तर पर जातिवाद विरोधी प्रयास काफ़ी हद तक व्यावहारिक रहे हैं। समाज सुधार के प्रयास, समाज सुधारकों द्वारा किए जाने पर ही जनता के मन को छू पाते हैं। राजनैतिक स्तर पर जो समाज सुधार या जातिवाद विरोधी प्रयास होते हैं वे सामान्यत: निष्फल ही रहते हैं कभी-कभी वे हास्यास्पद भी होते हैं। कारण यह है कि जनता अपनी सरकार या किसी राजनैतिक दल को देश के विकास से जोड़कर चलती है न कि समाज सुधार से। &lt;br /&gt;
एक उदाहरण देखिए-&lt;br /&gt;
          कुछ वर्ष पहले की बात है कि एक राजनैतिक दल ने कुछ दलितों का धर्म परिवर्तन कराने का अभियान चलाया। इन दलितों ने हिंदू धर्म को त्याग कर एक अन्य धर्म अपना लिया था। यह तय किया गया कि दलितों के पैर धोए जाएंगे और उन्हें यह भरोसा दिलाया जाएगा कि ज़ात-पात का पक्षपात अब हिन्दू धर्म में नहीं होता। सोचा यह गया कि दलित तो संकोच के कारण उच्च जाति के लोगों से पैर नहीं धुलवाएंगे इसलिए सचमुच पैर धोने की नौबत नहीं आएगी। हुआ कुछ अलग ही- सभी दलितों ने अपने पैर धुलवाने के लिए आगे कर दिए और जनेऊ पहने हुए लोगों ने जब यह कार्यक्रम संपन्न किया तो उसके बाद वहाँ से लगभग भागकर स्नान करने गए और तीन दिन बाद गंगा स्नान करके स्वयं को शुद्ध करने के लिए हरिद्वार चले गए। जिन्होंने अपना धर्म बदला था उनमें से बहुत से साल भर के भीतर ही वापस उसी धर्म में चले गए। सीधा-साधा सा सवाल है कि कौन सा धर्म हमें अधिक सुविधा दे रहा है और कौन से धर्म को निबाहने में हमें परेशानी हो रही है। निश्चित रूप से ही आर्थिक और सामाजिक रूप से अति पिछड़ों की यह समस्या शाश्वत है।&lt;br /&gt;
एक और संस्मरण-&lt;br /&gt;
          एक प्रथम श्रेणी के उच्च पद पर आसीन सरकारी अधिकारी को सपरिवार मेरे यहाँ खाने पर आना था। जब वह नहीं आये तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। सामान्यत: मैं किसी अधिकारी को इस प्रकार निमंत्रित नहीं करता लेकिन वह मुझे बड़ा भाई मानते थे तो मैंने उन्हें बुलाया। पूछने पर उन्होंने न आने का जो कारण मुझे बताया तो मुझे बहुत हैरानी और दुख: हुआ। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी ने कहा कि शायद भाई साब को इस बात का पता नहीं है कि हम वाल्मीकि हैं, उन्हें हमारी जाति का पता नहीं है, इसीलिए खाने पर बुलाया है, हमें नहीं जाना चाहिए। ज़रा सोचिए कि पति उच्च अधिकारी और वह स्वयं डॉक्टर इसके बाद भी उसका ऐसा संकोच... मुझे लगा कि हे ईश्वर यह धरती फट जाए और मैं इसमें समा जाऊँ। इसके बाद मेरी ज़िद पर हमने एक थाली में ही खाना खाया।&lt;br /&gt;
          राजतंत्र में वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ है और जनतंत्र में इसका अंतिम संस्कार होना चाहिए था पर हुआ नहीं...&lt;br /&gt;
          मेरी समझ में नहीं आता कि जिस सवर्ण जाति के कर्मचारी को दलित अधिकारी के जूठे बर्तन उठाने में संकोच नहीं होता उसी कर्मचारी को किसी दलित मज़दूर को एक गिलास पानी देने में क्यों संकोच होने लगता है।&lt;br /&gt;
          मैं यह नहीं कह रहा कि सभी ऐसा करते हैं बल्कि यह कहना चाहता हूँ कि हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था के दुरुपयोग को रोका जाना चाहिए और नई पीढ़ी को नए सिरे से यह पढ़ाया जाना चाहिए कि वर्णव्यवस्था एक बहुत पुराने अतीत की व्यवस्था थी जो कि अब कोई मायने नहीं रखती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%91%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1590</id>
		<title>समाज का ऑपरेटिंग सिस्टम -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%91%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1590"/>
				<updated>2017-05-25T09:49:49Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;समाज का ऑपरेटिंग सिस्टम&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Phansi.jpg|right|300px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;quot;यार! ये बंडा काका का तो लास्ट शो चल रहा है... ये तो टेंऽऽऽ बोलने वाला है... पक्का मरेगा अब तो पक्का... सीधी सी बात है कि इलाज का पैसा तो है नईं...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ऐसे क्यों बोलता है बे! हमारा गुरु है... उस्ताद है उस्ताद... तू ठहर मैं पूछ के आता हूँ...&amp;quot;&lt;br /&gt;
बुज़ुर्ग और मासूम सा दिखने वाला बंडा शहर से लौटा है और बहुत उदास और अनमने मन से एक पेड़ के नीचे बैठा है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या हुआ बंडा काका ? बड़े उदास हो ? बहुत दिनों से ख़िज़ाब भी नहीं लगाया... दाढ़ी और बाल सब लाल हो रहे हैं... ख़िज़ाब का रंग उड़ गया है नया लगा लो ना... अच्छा छोड़ो... ये बताओ कि तुम तो शहर गये थे ना... क्या बताया डॉक्टरों ने?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;बताना क्या था... वही बताया है... लाखों का ख़र्चा... चार लाख का पेसमेकर लगेगा... गुर्दे भी दोनों ख़राब हैं... वो ख़र्चा भी बीस लाख से ऊपर का है... और तुझको ख़िज़ाब की पड़ रही है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तो फिर क्या सोचा है?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सोचना क्या है बेटा बहुत ख़र्चा है... बहोऽऽऽत ख़र्चा...&amp;quot;&lt;br /&gt;
इसके बाद वो नौजवान जो बंडा का हाल-चाल पूछ रहा था, वापस अपने और साथियों के पास जाकर बैठ गया और बतियाने लगा। &lt;br /&gt;
&amp;quot;सचमुच यार! ... बंडा काका तो गया काम से... बेचारे ने हमको कितना कुछ सिखाया... कि ए.के. फ़ॉट्टी सेवन में और ए.के. फ़िफ़्टी सिक्स में क्या फ़र्क है... नहीं तो हमको कौन बताता...एकदम सॉलिड कोच है बॉस...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अबे! तुझे तो ये भी पता नहीं था कि हॅन्ड ग्रेनेड का पिन खींचने के बाद सात तक गिनती गिननी होती है या बारह तक... और बंडे ने तुझे रॉकेट लॉन्चर चलाना भी सिखा दिया... सच में यार बंडा सचमुच ग्रेट है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;उस दिन की याद है तुझे? जब हमने तीन बॉर्डर सिक्योरिटी वाले तीन बंदे मारे थे... उनकी लाशों को ज़मीन में दबाने से पहले बंडा काका ने ही तो बताया था कि उनका पेट फाड़ कर ज़मीन में दबाओ, नहीं तो लाश फूलकर ज़मीन को भी फुला देगी और पता चल जाएगा कि कुछ नीचे दबाया गया है... ग्रेट मॅन यार... कितना तजुर्बा है बंडा को...।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन अब होगा क्या... अब ये पहाड़ों और जंगलों में घूमना बंडे के बस का तो है नहीं... किसी दिन अपनी ही बिछाई हुई लैन्ड माइन से ही फट जाए तो अच्छा है... इतना मंहगा इलाज होगा कैसे... हमारा बीमा भी तो नहीं करता कोई...&amp;quot;ये बातें चल ही रही थीं कि वहाँ बंडा आ गया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;चिन्ता क्यों करते हो, मैंने सब कुछ सोच लिया है... मेरे इलाज का इन्तज़ाम हो गया...&amp;quot; अचानक बंडा वहाँ आ के बोला-&lt;br /&gt;
&amp;quot;देखो मेरे सर पर चार करोड़ का इनाम है। मेरी बात पार्टनरशिप में पक्की हो गई है, आधा इनाम मेरा और आधा उसका...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;किसका?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे जो मुझे पकड़वाएगा आधा उसका... मैं कोई छोटा-मोटा आतंकवादी नहीं हूँ... बहुत नाम है मेरा। अब तो मेरी उमर भी इतनी हो गई है कि जब तक अदालत मुझे फांसी देगी तब तक मैं वैसे ही मर लूँगा... और इलाज तो बेटाऽऽऽ! मेरा होना ही होना है। सीधे अस्पताल जाऊँगा फिर जिस डॉक्टर को भी मैं धमकी दूँगा, वो मेरे मन माफ़िक ही इलाज करेगा।... इससे बढ़िया स्कीम कौन सी होगी? जब तक इस देश में भ्रष्टाचार है तब तक हमारा राज है और अपना बेड़ा पार है&amp;quot;&lt;br /&gt;
          अपने 'प्लान' के मुताबिक़ बंडा पकड़ा गया। आधा इनाम उसके घरवालों को पहुँच गया। उसकी किडनी बदलवाई गई। दिल की बीमारी की वजह से पेसमेकर लगवाया गया। केस चल रहा है। लाखों इलाज में गए और करोड़ों उसे पालने में जा रहे हैं...फांसी की सज़ा भी होगी लेकिन बंडा बुड्ढा है, फांसी से पहले ही मर जाएगा, ये सब जानते हैं लेकिन कोई कुछ कहता नहीं, कोई कुछ करता नहीं...।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{बाँयाबक्सा|पाठ=जब भ्रष्टाचार होना ही है और रोका नहीं जा सकता तो फिर सरकार को इससे निपटने के लिए विचित्र उपाय ही करने चाहिए।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
आइए भारतकोश पर वापस चलें-&lt;br /&gt;
          एक ऐसे देश में, जहाँ की कार्यपालिका और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार एक अपरिहार्य तत्त्व बन चुका हो, मृत्युदण्ड पाने योग्य अपराध करने वाला अपराधी भी अन्य साधारण स्तर के अपराध करने वाले अपराधियों की तरह ही स्वयं को समझ सकता है... यदि वह बहुत अधिक पैसे वाला है तो।&lt;br /&gt;
          कभी हिसाब-किताब लगाएँ और फाँसी लगने वालों के आँकड़े देखें तो पता चलेगा कि इस सूची में कोई भी अरबपति नहीं है। ये कैसा संयोग है कि कोई भी अमीर व्यक्ति अपराध नहीं करता? यदि यह माना भी जाय कि सीधे-सीधे अपराध में शामिल होने की संभावना किसी बड़े पूँजीपति की नहीं बनती तो भी षड़यंत्रकारी की सज़ा भी तो वही है जो अपराध कारित करने वाले की है।&lt;br /&gt;
          वैसे भी फाँसी तो ग़रीब का जन्मसिद्ध अधिकार है। संभवत: यही एक क्षेत्र ऐसा है जहाँ जाति के आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर आरक्षण है। फाँसी का तख़्ता बनाने के साथ ही उसे जल्लाद के साथ ये शपथ दिला दी जाती है कि हम भगवान को हाज़िर नाज़िर जानकर ये शपथ लेते हैं कि अमीर आदमी को कभी भी फांसी नहीं देंगे।&lt;br /&gt;
          पिछले दिनों एक फ़िल्म आयी 'जॉली एल.एल.बी.'। इस फ़िल्म में जज (सौरभ शुक्ला) के एक संवाद पर बहुत तालियां बजती हैं। जो कुछ इस तरह है- &amp;quot;क़ानून अंधा होता है... जज अंधा नहीं होता।&amp;quot; इसके बाद जज बहुत मजबूरी के साथ बताता है कि ये जानते हुए भी सच क्या है, गवाह-सबूत के अभाव में वही फ़ैसला सुनाना पड़ता है, जिससे कि जज स्वयं संतुष्ट नहीं होता। इसका अर्थ तो ये है कि जज के पास भी गवाह-सबूत इकट्ठा करवाने के लिए कोई स्वतंत्र तंत्र होना चाहिए। जजों की मजबूरियों को मद्दे नज़र रखते हुए प्रत्येक अदालत में तीन जजों की बैंच होनी चाहिए (चाहे वह सत्र न्यायालय ही क्यों न हो)। एक बात और है जिसे पुनरीक्षण की आवश्यकता है- सत्र न्यायालय के फ़ैसले उच्च न्यायालय में और उच्च न्यायालय के फै़सले उच्चतम न्यायालय में बदलने के बहुत से उदाहरण भी सामने आते हैं।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=कभी हिसाब-किताब लगाएँ और फाँसी लगने वालों के आँकड़े देखें तो पता चलेगा कि इस सूची में कोई भी अरबपति नहीं है। ये कैसा संयोग है कि कोई भी अमीर व्यक्ति अपराध नहीं करता? यदि यह माना भी जाय कि सीधे-सीधे अपराध में शामिल होने की संभावना किसी बड़े पूँजीपति की नहीं बनती तो भी षड़यंत्रकारी की सज़ा भी तो वही है जो अपराध कारित करने वाले की है।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          ज़रा सोचिए किसी मृत्यु कारित करने वाले संगेय अपराध के अपराधी को दिया जाने वाला दण्ड बार-बार बीसियों वर्षों तक परिभाषित किया जाता रहता है। कभी उसे फांसी सुनाई जाती है तो कभी आजीवन कारावास। कभी वह ज़मानत पर जेल से बाहर रहता है तो कभी जेल के अंदर...। किसी भी निचली अदालत के फ़ैसले का पुनर्मूल्यांकन ऊँची अदालतों द्वारा बिना अपील किए ही हो तो बार-बार फ़ैसला बदले जाने की संभावना नहीं होगी। &lt;br /&gt;
          अदालतों में लाखों केस लंबित हैं। क्या कारण है? एक कारण तो मुख्य है ही कि न्यायपालिका के पास अदालत, जज, अधिकारी और कर्मचारियों की कमी है। यह कमी जायदाद की ख़रीद-बिक्री के पंजीयन कार्यालय में नहीं है। ना ही रजिस्ट्री ऑफ़िस में लोगों को अधिक इंतज़ार करना पड़ता है। देर रात तक ये कार्यालय खुले रहते हैं, क्योंकि वहाँ से सरकार को अरबों का राजस्व मिलता है, जो कि अदालतों से मिलना संभव नहीं है। दीवानी अदालत में तो ऐसी व्यवस्था है लेकिन फ़ौजदारी में सरकार को मिलने वाला राजस्व नगण्य ही है।&lt;br /&gt;
          एक और अहम् कारण है- वकीलों की फ़ीस की प्रक्रिया। जिस तरह गब्बर सिंह कहता है कि बसंती! जब तक तेरे पैर चलेंगे वीरू की सांस चलेगी, उसी तरह जब तक केस की तारीख़ पड़ती रहेंगी, वकील साहब को प्रत्येक तारीख़ पर जाने का मेहनताना मिलता रहेगा। अब बताइये...क्या कोई वकील चाहेगा कि केस जल्दी ख़त्म हो? केस तो बस चलता रहे... चलता रहे। जिस तरह टॅलीविज़न-धारावाहिक के कलाकार, निर्माता, निर्देशक आदि यह चाहते हैं कि धारावाहिक चलता रहे... चलता रहे...। &lt;br /&gt;
          हाँ! कुछ केस ऐसे होते हैं जो ठेके पर लड़े जाते हैं जैसे कि सड़क दुर्घटना के मुआवज़े के केस। सामान्यत: इन मुक़दमों में वकील से एक निश्चित धनराशि निर्धारित हो जाती है जो कि मुक़दमा जीतने पर एक मुश्त दी जाती है। इन मुक़दमों के फ़ैसले अपेक्षाकृत कम समय में ही हो जाते हैं। ज़मानत के मामलों में भी ज़्यादातर यही ठेका प्रक्रिया चलती है।&lt;br /&gt;
          पुराने समय के निर्धारित जुर्माने और सज़ा भी एक मुख्य कारण है। इसके लिए भी हमें बिलगेट्स के माइक्रोसॉफ़्ट से सीख लेनी चाहिए। ऑपरेटिंग सिस्टम के नये से नये रूपांतरण (वर्ज़न) लाना और लगातार सॉफ़्टवेयर अपडेट का आना ही माइक्रोसॉफ़्ट की सफलता का राज़ है। ज़माना अपडेट्स का है। न्यायपालिका और कार्यपालिका भी समाज के ऑपरेटिंग सिस्टम हैं। जिनको समय-समय पर नये रूपान्तरण (वर्ज़न) और अद्यतन (अपडेट) की आवश्यकता होती है। किसी भी शिक्षा, तंत्र, तकनीक की तरह ही न्याय व्यवस्था को भी अद्यतन रहने की आवश्यकता है। यदि न्याय व्यवस्था को समय-समय पर अद्यतन न किया गया तो न्याय-व्यवस्था की भूमिका समाज के प्रगति और विकास के रास्ते में नकारात्मक ही रहेगी जो कि आज है भी। बहुत सारे जुर्माने और सज़ा पुराने समय से चले आ रहे हैं। जिन्हें पुनरीक्षण की अनिवार्य आवश्यकता है।&lt;br /&gt;
          ट्रॅफ़िक के क़ानून को ही उदाहरण के लिए लें तो जुर्मानों की रक़म सुनकर हँसी आती है। 100-500 या हज़ार दो हज़ार... जबकि ट्रॅफ़िक का नियम तोड़ने से मनुष्य की जान भी जा सकती है। ज़रा सोचिए कि शराब पीकर वाहन चलाने का जुर्माना यदि एक लाख रुपया कर दिया जाय और एक सप्ताह की सज़ा अनिवार्य हो, साथ ही जुर्माना न दे पाने की स्थिति में एक वर्ष की क़ैद बा-मशक़्क़त हो... तो क्या होगा... शराब तो दूर की बात है कोई ख़ाँसी की दवाई पीकर भी वाहन नहीं चलाएगा... यहाँ एक शाश्वत समस्या तो है कि पुलिस वालों की रिश्वत भी बड़ी हाइ-फ़ाइ हो जाएगी लेकिन फिर भी समस्या बहुत हद तक कम होगी और सरकार को राजस्व भी मिलेगा।&lt;br /&gt;
          न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की स्थापना का अर्थ है देश का संपूर्ण पतन... इसलिए यदि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं हो सकता तो इसको वैधानिक मान्यता देकर इसका &amp;quot;राष्ट्रीयकरण&amp;quot; ही कर देना चाहिए...&lt;br /&gt;
क्या अर्थ है इसका, आख़िर मैं कहना क्या चाहता हूँ...?&lt;br /&gt;
          ज़रा सोचिए कि लगभग प्रत्येक कार्य या प्रवेश के लिए यदि दो दो पंक्तियां (एक नि:शुल्क, एक शुल्क सहित) हों तो ? जैसे कि जेल की मिलाई, अदालत की तारीख़, मंत्रालय से लेकर सचिवालय में टिकिट से प्रवेश (सामान्यजन के लिए मुफ़्त) आदि। यह पासपोर्ट के लिए किया गया है कि तुरंत पासपोर्ट चाहिए तो ज़्यादा शुल्क देकर लिया जा सकता है।&lt;br /&gt;
          हर किसी को जल्दी है, तो फिर इस 'जल्दी' का लाभ सरकार को मिले तो समस्या क्या है? मान लीजिए रेलवे स्टेशन पर प्लॅटफ़ार्म टिकिट लेना है तो इसमें भी दो पंक्तियां की जा सकती हैं। टिकिट की क़ीमत तो एक ही है लेकिन टिकिट खिड़कियाँ दो हैं। एक खिड़की पर दोगुने दाम पर यदि टिकिट मिले तो जिन्हें जल्दी है वे अधिक दाम चुका कर ख़रीद लें...&lt;br /&gt;
शायद सभी यह न जानते हों कि जेलें भी श्रेणी गत होती हैं। अपराधी के सामाजिक स्तर को देखकर ए-क्लास, बी-क्लास और सी-क्लास श्रेणी बनाई गयीं हैं।&lt;br /&gt;
          दस-पंद्रह साल पहले मैं एक तत्कालीन सत्ता दल के विधायक से मिलने जेल गया था। विधायक जी बढ़िया पलंग के गुदगुदे गद्दे पर लेटकर कूलर की हवा और टेलिविज़न का आनंद ले रहे थे। उस समय मोबाइल फ़ोन ज़्यादा चलन में नहीं थे लेकिन उनके पास दो-दो मोबाइल थे। वे कोई राजनैतिक अपराधी नहीं थे बल्कि एक ऐसे अपराध में बंद थे जिसका पता चलने पर मुझे बाद में अपने आप से भी वितृष्णा हुई और मैंने अपने साथी (जिसके कहने और साथ में मेरा वहाँ जाना हुआ) को बहुत उल्टी-सीधी सुनाईं।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=ऑपरेटिंग सिस्टम के नये से नये रूपांतरण (वर्ज़न) लाना और लगातार सॉफ़्टवेयर अपडेट का आना ही माइक्रोसॉफ़्ट की सफलता का राज़ है। ज़माना अपडेट्स का है। न्यायपालिका और कार्यपालिका भी समाज के ऑपरेटिंग सिस्टम हैं। जिनको समय-समय पर नये रूपान्तरण (वर्ज़न) और अद्यतन (अपडेट) की आवश्यकता होती है।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          जेलों में विचाराधीन क़ैदियों की स्थिति में अक्सर होता है कि अमीरों, नेताओं और सॅलिब्रिटी ग़ुंडों को जेलों में फ़ाइव स्टार जैसी सुविधाएँ मुहैया कराई जाती हैं। क्या समस्या है यदि जेलों में कुछ हिस्सा इस तरह की सुविधाओं से भरपूर हो इसका किराया इन हाइ-फ़ाइ अपराधियों से वसूला जाय। साथ ही शारीरिक परिश्रम में कोई ढील न बरती जाय। ऐसी फ़ाइव स्टार जेलों में रहने पर सज़ा की अवधि भी साधारण जेल से कम से कम दो गुनी या तीन गुनी हो। &lt;br /&gt;
          लाखों लोग दलालों (परिष्कृत भाषा में लाइज़न) की मदद से ही अपना काम करवाते हैं। दलाली, रिश्वत, कमीशन, सुविधाशुल्क आदि न जाने कितने नाम दिए गए हैं दलाली को। दलाली को भी यदि सरकारी मान्यता प्राप्त व्यवसाय का दर्जा दिया जाय तो काफ़ी हद तक बात बन सकती है। यह ठीक वैसे ही होगा जैसे कोई मुवक्किल एक वकील चुनता है जो अदालत में उसका मुक़दमा लड़ सके। जब भ्रष्टाचार होना ही है और रोका नहीं जा सकता तो फिर सरकार को इससे निपटने के लिए विचित्र उपाय ही करने चाहिए। एक विचित्र उपाय का उदाहरण देखिए-&lt;br /&gt;
          प्रताप सिंह कैरों पचास के दशक में पंजाब के मुख्यमंत्री रहे। उनके शासन का उदाहरण आज भी दिया जाता है और महान नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल से उनकी तुलना की जाती है। उस दौर में भी अनाज की कालाबाज़ारी ज़ोरों पर थी। देश नया-नया आज़ाद हुआ था। राज्य सरकारों के पास संसाधन कम थे। जमाख़ोरों और दलालों ने अनाज गोदामों में बंद किया हुआ था, मंहगाई आसमान को छूने लगी थी, जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। किसी के समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाना चाहिए। कैरों ने एक गंभीर जनहितकारी चाल चली... केन्द्र सरकार और रेल मंत्रालय की सहायता से कई मालगाड़ियाँ रेलवे स्टेशनों पर जा पहुँची जिनके डब्बे सील बंद थे और उनपर विभिन्न अनाजों के नाम लिखे हुए थे। शहरों में आग की तरह से ये ख़बर फैल गयी कि सरकार ने 'बाहर' से अनाज मंगवा लिया है। इतना सुनना था कि जमाख़ोरो ने अपना अनाज बाज़ार में आनन-फानन में बेचना शुरू कर दिया। मंहगाई तुरंत क़ाबू में आ गई। एक सप्ताह बाद मालगाड़ियाँ ज्यों की त्यों वापस लौट गईं क्योंकि वे ख़ाली थीं।... यदि सरकार ठान ले तो देश की तरक्की के लिए हज़ार-लाख तरीक़े निकाल सकती है लेकिन... जब भी कोई नई योजना या परिवर्तन की बात आती है तो कहा जाता है कि हमारे देश की आबादी बहुत अधिक है और इतनी बड़ी आबादी को संभालना कोई आसान काम नही है।&lt;br /&gt;
          बहुत वर्षों पहले मैंने यह कहा था कि भारत की बढ़ती आबादी की समस्या को ही यदि हम अभिशाप के स्थान पर वरदान के रूप में लेते तो व्यावसायिक रूप से देश बहुत आगे जा सकता है। हमको अपनी विशाल आबादी को अपनी कमज़ोरी की बजाय ताक़त समझ उसे उत्पादन में झोंक देना चाहिए। लेकिन यह हुआ नहीं हमारी आबादी उत्पादक न होकर विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गयी... जो हमारी समझ में नहीं आया वह चीन ने समझ लिया। चीन ने अपनी आबादी को ही अपना हथियार बनाया और उसे उत्पादन में लगा दिया। इसलिए बाज़ार में भारत एक ख़रीददार बन गया और चीन विक्रेता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%B2_%E0%A4%86%E0%A4%9C_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A4%B2_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1589</id>
		<title>कल आज और कल -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%B2_%E0%A4%86%E0%A4%9C_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A4%B2_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1589"/>
				<updated>2017-05-21T17:18:09Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;कल आज और कल&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sundial.jpg|border|right|160px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        हमारी भाषा हिन्दी में गुज़रे हुए कल और आने वाले कल के लिए एक ही शब्द है 'कल'। ऐसा क्यों है और क्या यह सही है या फिर इसके पीछे हमारी कौन सी सोच या मानसिकता काम करती है, इस पर चर्चा करते हैं लेकिन पहले नारद जी क्या पूछ रहे हैं वह भी देखें- &lt;br /&gt;
अक्सर नारद जी ही अपने अनूठे प्रश्नों के लिए प्रसिद्ध हैं, तो नारद जी ने भगवान कृष्ण से पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;अब द्वापर के बाद कलियुग आएगा वह कैसा युग होगा प्रभु!&lt;br /&gt;
कृष्ण बोले &amp;quot;देवर्षि नारद! सतयुग, सत्य का युग था। त्रेता मर्यादा का युग था। द्वापर कर्म का युग है और कलियुग न्याय का युग होगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नारद: &amp;quot;सर्वश्रेष्ठ युग कौन सा होता है प्रभु?&amp;quot;&lt;br /&gt;
नारद जी के इस प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण ने दिया या नहीं, वह तो मुझे पता नहीं लेकिन यहाँ चर्चा करके हम इस प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश करेंगे...&lt;br /&gt;
        पौराणिक ग्रंथों के अनुसार सतयुग में राजा हरिश्चन्द्र सबसे प्रसिद्ध राजा हुए हैं। त्रेता में राम हुए और द्वापर में कृष्ण। राम और कृष्ण को तो अवतार या भगवान माना जाता है लेकिन राजा हरिश्चन्द्र को अवतार या भगवान नहीं माना जाता।&lt;br /&gt;
ऐसा क्यों है? इस पर चर्चा की जा सकती है... &lt;br /&gt;
        यदि हिन्दू धार्मिक ग्रंथों को देखें तो, भगवान राम ने बालि और रावण को छल से मारा था। बालि को वृक्ष के पीछे छिप कर मारने का कारण यह था कि बालि को वरदान था कि जो भी उसके सामने होगा उसका आधा बल बालि को मिल जायेगा इस प्रकार बालि अजेय ही रहा। जिससे भी लड़ा उसका आधा बल ले लिया और अपना बल भी उसमें सम्मिलित हो गया, तो फिर हारता कैसे ? इसलिए राम ने पेड़ के पीछे से छिप कर बालि को बाण मारा और बालि मारा गया। इसी प्रकार रावण को भी मारना असंभव ही था क्योंकि उसकी नाभि में अमृत था जो उसको मरने नहीं देता था। विभीषण ने यह रहस्य खोला और राम ने नाभि में तीर मारा, जिससे रावण मारा गया। &lt;br /&gt;
        कृष्ण की कूटनीति से महाभारत में कौरवों के सभी महारथी मारे गए। पहले भीष्म फिर द्रोणाचार्य फिर कर्ण और अंत में दुर्योधन। जयद्रथ और जरासंध वध भी भगवान कृष्ण की कूटनीति का ही फल था। कृष्ण ने भीष्म से ही पूछा कि वो कैसे मरेंगे क्योंकि भीष्म प्रतिदिन दस सहस्त्र रथियों को मार कर ही जल ग्रहण करते थे। दस दिनों में भीष्म ने पांडवों की सेना को गाजर मूली की तरह संहारित किया था। भीष्म ने बताया कि स्त्री और उभयलिङ्गी पर अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाने की प्रतिज्ञा कर चुके हैं। इसीलिए शिखंडी को अर्जुन ने अपने सामने खड़ा करके भीष्म पर तीर मारे और भीष्म शरशैय्या पर लेटे हुए मृत्यु की प्रतीक्षा तब तक करते रहे जब तक कि सूर्य उत्तरायण नहीं हो गए। &lt;br /&gt;
        द्रोणाचार्य के संबंध में सभी को मालूम था कि वे केवल अश्वत्थामा के लिए ही जीवन जी रहे हैं और अश्वत्थामा  के मरने से वे भी मर जाएँगे। सत्यवादी धर्मराज युधिष्ठिर से &amp;quot;अश्वत्थामा हतौहत: नरोवाकुंजरोवा&amp;quot; कहलवाया गया। जिससे द्रोणाचार्य ने समझा कि अश्वत्थामा मारा गया और वे समाधिस्त हो गए। समाधि अवस्था में ही धृष्टद्युम्न ने उनका वध किया। दुर्योधन की जंघा पर वार करवाना हो या जयद्रथ को मरवाने के लिए सूर्य को छिपा कर सूर्यास्त का भ्रम पैदा करना हो, कृष्ण सदा सफल ही रहे। &lt;br /&gt;
        राजा हरिश्चंद्र सतयुग में हुए और उन्हें अपना राज्य, रानी और पुत्र ऋषि विश्वामित्र के कारण त्यागने पड़े। हरिश्चंद्र अपने सत्य के मार्ग से नहीं हटे चाहे कितनी भी कठिनाइयां आईं। अपना राज्य भी वापस नहीं लिया और यह कहकर छोड़ दिया कि दान की हुई वस्तु को वापस कैसे लूँ ? राजा हरिश्चंद्र को भगवान का अवतार नहीं माना जाता इसलिए कहीं भी उनके मंदिर नहीं पाए जाते।&lt;br /&gt;
        ऐसा क्यों है ? हमारे अवतार और भगवान वे क्यों नहीं हैं जो सदा सत्य के नियमों पर चले, जिन्होंने कभी किसी भी परिस्थिति में छल-कपट का सहारा नहीं लिया ? इसका दूसरा पहलू भी है जो व्यावहारिक धरातल पर खरा उतरता है। राम ने अपने माता-पिता के प्रति पूरी श्रद्धा-भक्ति का परिचय दिया और अनेक मर्यादाओं का पालन भी किया लेकिन अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ छल का सहारा भी लिया। कृष्ण के संबंध में भी यही है। &lt;br /&gt;
        राजा हरिश्चंद्र के बारे में यदि हम विचार करें तो समझ में आता है कि उन्होंने अपना राज्य एक ऋषि को सौंप दिया जो कि राज्य की जनता के प्रति पूर्णत: अन्याय ही हुआ। ठीक इसी तरह हरिश्चंद्र ने अपने राज्य, पत्नी और पुत्र को एक वस्तु की तरह दान कर दिया जो कि जनता को अन्यायपूर्ण लगा और सतयुगीन राजा होने के बावजूद भी, राजा हरिश्चंद्र कभी भी अवतार या भगवान का स्थान नहीं पा सके।&lt;br /&gt;
अब कलियुग की चर्चा करते हैं-&lt;br /&gt;
        कलियुग न्याय का युग है। जो अपराध करेगा उसे उसके देश की सरकार या शासन द्वारा दण्डित किया जाता है न कि अगले जन्म तक प्रतीक्षा की जाती है कि कब वह अगला जन्म लेगा और अपने कर्मों का फल पाएगा। कलियुग में अधिकतर देशों में जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें हैं और गर्व की बात है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और भारत में जनता अपना शासक स्वयं चुनती है (वो एक अलग बात है कि हमारे देश की आधी आबादी वोट नहीं देती और वोट देने वाली आबादी में एक बड़ा प्रतिशत निरक्षरों का है।)&lt;br /&gt;
कलियुग के संबंध में निम्न पंक्तियाँ कही गई हैं ज़रा इन पक्तियों पर भी ग़ौर फ़रमाइए-&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;राम चंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
हंस चुगेगा दाना तिनका कौआ मोती खाएगा ।।&amp;quot;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इन पंक्तियों में छिपे हुए अर्थ बड़े ही अन्यायपूर्ण हैं। बिचारे कौओं की क्या ग़लती है जो उन्हें कलियुग से पहले के युगों में दाना-तिनका ही खाने को मिलता था और हंस में ऐसी क्या ख़ास बात थी कि वह बेशक़ीमती मोती ही खाता था। क्या इसका उत्तर है, गोरा रंग और सुंदरता, जो हंस में थी और कौओं में नहीं। इसे तो नस्ली पक्षपात की मानसिकता ही कहेंगे। ईश्वर ने तो सबको समान ही बनाया है। बाढ़ आती है तो गोरे को भी डुबोती है और काले को भी, सुंदर को भी और असुंदर को भी... तो फिर ये भेद-भाव भी ईश्वर ने तो नहीं किया होगा। ये तो मनुष्य के दिमाग़ की उपज है।&lt;br /&gt;
        कलियुग में ऐसा भेदभाव कम है। आजकल के युग (कलियुग) में किसी खेल स्पर्धा में किसी को सिर्फ़ इसलिए नहीं रोका जाता कि वह किसी सवर्ण जाति का नहीं है जबकि द्वापर में तो ऐसा था... हस्तिनापुर की सार्वजनिक रङ्गशाला में कर्ण को मात्र इसलिए अपमानित किया गया क्योंकि वह कुलीन नहीं था, सूतपुत्र था। आज के युग में तो किसी भी व्यक्ति का राज्य का मुख्यमंत्री या देश का प्रधानमंत्री बनना संभव है चाहे वह किसी भी जाति अथवा धर्म का हो।&lt;br /&gt;
        कलियुग, सामान्यत: प्रजातंत्र का युग है। राजा-महाराजाओं के युग में राज्य को किसी सुयोग्य राजा का शासन मिलने की संभावना बहुत कम ही होती थी। योग्य से योग्य राजा के उत्तराधिकारी भी निकम्मे और ऐय्याश निकल जाते थे। जिनके अव्यवस्थित शासन को जनता झेलती थी। तथाकथित कलियुग में धीरे-धीरे विश्व के अनेक देश प्रजातंत्र को अपना चुके हैं और आने वाले समय में संभवत: विश्व का प्रत्येक देश प्रजातांत्रिक होगा।   &lt;br /&gt;
जो कुछ भी मैंने ऊपर लिखा उस सब का उद्देश्य क्या है ? &lt;br /&gt;
        मेरा कहना सिर्फ़ इतना ही है कि हम वर्तमान में जीना सीख लें तो हमारा देश विश्व का महानतम और सफलतम देश हो सकता है। वर्तमान में जीने के लिए सबसे पहले तो हमें स्वयं को यह विश्वास दिलाना होगा कि हम जिस काल अवधि में जी रहे हैं वही सर्वश्रेष्ठ है। विश्व, विश्व की सभ्यता और समाज सदैव प्रगतिगामी हैं ना कि चक्रीय क्रम-बद्ध।&lt;br /&gt;
अब ज़रा 'कल' वाली बात पर वापस चलते हैं-&lt;br /&gt;
        हमारी भाषा ही हमारी सोच का आइना है। गुज़रे कल को भी कल कहना और आने वाले कल को भी कल कहना, चक्रीय-क्रम सिद्धांत से ही प्रभावित है। इस 'कल' को लेकर, दूसरी भारतीय और विदेशी भाषाओं की क्या स्थिति है, यह भी देखें-&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! &lt;br /&gt;
भाषाएँ 	&lt;br /&gt;
! बीता हुआ कल	&lt;br /&gt;
! आने वाला कल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिन्दी&lt;br /&gt;
| कल	&lt;br /&gt;
| कल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अंग्रेज़ी&lt;br /&gt;
| Yesterday &lt;br /&gt;
| Tomorrow&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लॅटिन&lt;br /&gt;
| Heri (हॅरी)	&lt;br /&gt;
| Crastinum (क्रस्तीनोम)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चीनी	&lt;br /&gt;
| 昨天 (ज़ोतियन)&lt;br /&gt;
| 明天 (मिंगतियन)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यूनानी (ग्रीक)&lt;br /&gt;
| χτες (क्षतेश)&lt;br /&gt;
| αύριο (आवरियो)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फ़्रांसीसी (फ़्रॅन्च)&lt;br /&gt;
| hier (हियॅ)	&lt;br /&gt;
| demain (डुमा)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जर्मन&lt;br /&gt;
| gestern (गॅस्टन)&lt;br /&gt;
| morgen (मॉगन)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बंगाली	&lt;br /&gt;
| গতকাল (घटकाल)	&lt;br /&gt;
| আগামীকাল (आगामी काल)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तमिल	&lt;br /&gt;
| நேற்று (नेत्रू)&lt;br /&gt;
| நாளை (नालाई)&lt;br /&gt;
|} &lt;br /&gt;
ऊपर की तालिका में हिन्दी के अलावा सभी भाषाओं के पास गुज़रे और आने वाले दोनों कल के लिए अलग-अलग शब्द हैं। जिसका अर्थ है कि जो कल बीत गया वह उस कल से भिन्न है जो कि अगले दिन आएगा। समय को सीधे रेखा की तरह मान लिया गया। जो कि विकास और प्रगतिवादी दृष्टिकोण हुआ। लेकिन हिन्दी की सोच भिन्न जा रही है और यह संदेश देती है कि समय सीधे रेखा में गतिमान नहीं है, यह वर्तुलाकार पथ पर गतिमान है। जो घट गया वही फिर घटेगा और जो घटेगा वह पहले भी घट चुका है। इसलिए आने वाला कल वही है जो बीता हुआ कल था। यह सोच हमें किस तरह प्रगति और विकास की ओर ले जाएगी ? कहना मुश्किल है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        खोज और रचना में क्या अंतर है? जो पहले से उपस्थित हो लेकिन उसकी जानकारी न हो और उसकी जानकारी हमें किसी साधन से हो जाय तो उसे 'खोज' कहते हैं। जो पहले से उपस्थित नहीं है लेकिन पहले से उपस्थित साधनों द्वारा जिसे बनाया जाय उसे 'रचना' कहते हैं। समय कोई मोटरकार या रेलगाड़ी नहीं है जो किसी रेखा में या वर्तुल में चलेगा। समय की कोई खोज नहीं की गई बल्कि इसे तो मनुष्य ने अपनी सुविधानुसार परिभाषित किया है जो आइंसटाइन के 'सापेक्षता के सिद्धांत' पर आधारित है। एक तरह से कह सकते हैं कि विज्ञान के बहुत से प्रश्नों के हल के लिए, समय को बनाया गया है रचा गया है। ब्रह्माण्ड में समय, आकार और गति की परिभाषा करने के लिए जो नियम और वैज्ञानिक-तथ्य इस्तेमाल किए गए हैं, वे निश्चित रूप से अपूर्ण ही हैं लेकिन फिर भी हम समय को परिभाषित तो करते ही हैं। साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि समय की परिभाषा विज्ञान के पास न होने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हम धर्म ग्रंथों को खंगालना प्रारम्भ कर दें और किसी अव्यावहारिक से नतीजे से संतुष्ट हो कर बैठ जाएँ। &lt;br /&gt;
        धर्म-ग्रंथों में युगों का चक्रीय सिद्धांत समय की वर्तुल चाल वाली सोच पर आधारित है। मनुष्य का बार-बार जन्म लेना और विभिन्न योनियों को भोगना भी इसी सिद्धांत को दर्शाता है। जो युग बीत गया वह फिर आएगा, अगले जन्म में कर्मों का फल मिलेगा, ईश्वर के अंश वाले अवतार फिर होंगे आदि। ये बातें किसी सन्न्यासी के लिए तो ठीक हैं लेकिन प्रगति और विकास के पथ पर जाने वाले नागरिकों और देश के लिए इनका कोई अर्थ नहीं है। &lt;br /&gt;
        अपने देश, संस्कृति, धर्म, जाति की सकारात्मक विकासवादी संरचना पर तो सभी को गर्व करना चाहिए लेकिन आने वाले कल को फलित-ज्योतिष के पन्नों में और गुज़रे हुए कल को धार्मिक ग्रंथों में तलाशने के बजाय गुज़रे हुए कल को इतिहास के पन्नों में और आने वाले कल को विज्ञान की पुस्तकों में तलाशना ही भारत को और भारतवासियों को प्रगति पथ पर ले जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
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&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1588</id>
		<title>कबीर का कमाल -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T17:06:01Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;कबीर का कमाल&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Sant-Kabirdas.jpg|right|180px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
महान संत कबीर दास के संबंध में अनेक क़िस्से और किंवदंतियाँ मशहूर हैं लेकिन मुझे जो बहुत प्रेरित करते हैं उनका ज़िक्र कर रहा हूँ।&lt;br /&gt;
        एक बार कबीर सत्संग में लीन थे। तभी वहाँ वाराणसी की एक मशहूर नर्तकी आई और सभी के सामने बोली-&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये कोई साधु नहीं है। ये आपको भी धोखा दे रहा है और इसने मुझे भी धोखा दिया है। मुझसे शादी का झूठा वादा किया और मुझे झूठे सपने दिखाए। मेहरबानी करके मुझे इंसाफ़ दिलाइये।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ये सब सुनने पर सभी उपस्थित जन कबीर साहब की ओर प्रश्नवाचक मुद्रा में देखने लगे। कबीर अपने स्थान से उठे और बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;भाइयों! इसके हिस्से का न्याय तो मुझे अभी देना होगा। अब आप सभी अपने घर जाइये और मैं अब सत्संग नहीं किया करूंगा क्योंकि मुझे समय नहीं मिलेगा। कृपया हम दोनों को अकेला छोड़ दें।&amp;quot;&lt;br /&gt;
इतना कहकर कबीर इस नर्तकी को अपनी कुटिया में भीतर ले गए और उसे चारपाई पर बिठाकर स्वयं नीचे बैठ गए और बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;देवी! तूने बहुत अच्छा किया जो तू मेरे पास रहने चली आई। मेरे साथ हमेशा भीड़-भाड़ लगी रहती थी, लेकिन अब कोई मेरे पास नहीं आएगा और मैं बड़े मनोयोग से अपना भजन-ध्यान कर लूंगा। तू मेरे पास से अब कहीं जाना मत, यहीं रहना।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नर्तकी ने यह सब सुना तो दंग रह गई। यह सब सुनने की तो उसने कल्पना भी नहीं की थी। वह तुरंत बाहर चली गई और बाहर खड़े लोगों से बोली-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं आप सभी की अपराधी हूँ, मुझे क्षमा कीजिए जो मैंने एक देवता समान संत पर ऐसा घिनौना आरोप लगाया। इस सबके लिए मुझे कबीर साहब के विरोधियों ने पैसा दिया था क्योंकि मेरे दोनों बच्चों को पालने के लिए मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
इतना सुनने पर उपस्थित लोगों ने नर्तकी के लिए तुरंत धन इकट्ठा करके उसे दे दिया और सत्संग फिर प्रारम्भ हो गया। कबीर साहब के विरोधी पंडे और मुल्ला थे जिनकी अंधविश्वास की बातों का कबीर विरोध करते थे।&lt;br /&gt;
         दुनिया की रीत निराली है। लोग 'प्रयासों' को नहीं, 'परिणामों' को देखकर शाबाशी देते हैं। 'पश्चाताप' को नहीं, 'प्रायश्चित' को सराहते हैं। 'खेती' को नहीं, 'फ़सल' को देखकर मुग्ध होते हैं। सुन्दरता की प्रशंसा 'फूल' की होती है न कि 'बीज' की। इसलिए कबीर के इस क़िस्से से हम यह समझ सकते हैं कि कबीर ने किसी को सफ़ाई नहीं दी कि वह स्त्री झूठ बोल रही है बल्कि उस स्त्री के मुख से ही सच कहलवा लिया और वह भी पूर्णत: अहिंसक तरीक़े से।&lt;br /&gt;
कबीर की मां चाहती थी कि कबीर विवाह कर लें। कबीर ने अपनी मां की इच्छा पूरी करने के लिए विवाह कर लिया। विवाह की रात को उनकी पत्नी 'लोई' लगातार रो रही थी। कबीर ने कारण पूछा तो लोई ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं किसी और से प्रेम करती हूँ, किन्तु मेरे माता-पिता ने मेरा विवाह आपसे कर दिया।&amp;quot;&lt;br /&gt;
इतना सुनने पर कबीर अपनी पत्नी लोई को उसके प्रेमी के घर पहुँचा आए। लोई के प्रेमी ने उससे पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इतनी रात में तू कैसे भाग आई ? तेरे पति ने तुझे रोका नहीं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरे पति कबीर ही मुझे यहाँ पहुँचा कर गए हैं, मैं भागकर नहीं आई।&amp;quot; लोई ने बताया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;बाहर अभी-अभी बरसात बंद हुई है और रास्तों में तो घुटने-घुटने पानी भरा हुआ है लेकिन तेरे पैर तो सूखे हैं गीले नहीं हुए, क्यों ?&amp;quot; प्रेमी ने पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;बात ये है कि कबीर ने मुझे पीठ पर उठा रखा था जिससे कि कहीं मेरे कपड़े ख़राब न हो जाएँ।&amp;quot; लोई ने बताया। इतना सुनते ही लोई के प्रेमी ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुझे ज़रा सी भी लाज नहीं आई कि तू कबीर जैसे महापुरुष की सेवा करने के अवसर को त्याग कर मेरे जैसे साधारण आदमी के पास चली आई !&amp;quot;&lt;br /&gt;
लोई का प्रेमी लोई को लेकर कबीर के पास गया और पैरों में गिरकर क्षमा मांगी और सदा के लिए कबीर का शिष्य बन गया।&lt;br /&gt;
        कबीर ने कभी किसी से शिकायत नहीं की। शिकायत वे किया करते हैं जो कमज़ोर होते हैं। अपनी पत्नी लोई से भी उन्होंने यह शिकायत नहीं की कि लोई ने शादी से पहले क्यों नहीं बताया कि वह किसी से प्रेम करती है। कारण यह है कि कबीर ने किसी को इस लायक़ समझा ही नहीं कि वे शिकायत करते। कबीर के सामने सभी छोटे ही तो थे। राम ने कैकयी की शिकायत नहीं की और ना ही कभी यह कहा कि दशरथ ने क्यों कैकयी के कहने से उन्हें वन भेजा।&lt;br /&gt;
        लोई से कबीर की दो सन्तान थीं-  बेटा 'कमाल' और बेटी 'कमाली' । कबीर की अनेक रचनाएँ ऐसी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे कमाली की हैं। आपको याद होगा राजकपूर जी की फ़िल्म &amp;quot;सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌&amp;quot; का गीत &amp;quot; सैंया निकस गए मैं ना लड़ी थी... रंग महल के दस दरवाज़े, ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी...&amp;quot;&lt;br /&gt;
यह कमाली की रचना है। जिसमें 'रंग महल' का अर्थ है हमारा शरीर और 'दस दरवाज़ों' से अर्थ है शरीर के वे दस मार्ग जिनसे प्राणों का निकलना माना जाता है। जनसामान्य को ध्यान में रखते हुए रचनाएँ ऐसी ही बनाई जाती थीं, जिनका सामान्य अर्थ कुछ ऐसा होता था कि सबको रुचिकर लगे लेकिन वास्तविक अर्थ किसी न किसी दर्शन अथवा भक्ति से संबंधित होता था।&lt;br /&gt;
        कमाल भी कमाल ही था। कमाल के संबंध में भी कई क़िस्से मशहूर हैं। जब कमाल को पेट भरने का कोई तरीक़ा नहीं मिला तो उसने कबीर साहब से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं चोरी करने जा रहा हूँ, क्योंकि आपसे कुछ छुपाता नहीं हूँ,  इसलिए बता रहा हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे तुम अकेले कैसे जाओगे, मैं भी साथ चलता हूँ। रात का समय है। चोट लग गई तो तुम्हारी मां नाराज़ होगी। चलो मैं भी चलता हूँ।&amp;quot;- कबीर साहब बोले।&lt;br /&gt;
दोनों बाप बेटे चोरी करने चल दिए। कमाल ने एक धनी व्यक्ति के मकान की चारदीवारी के भीतर चुपचाप प्रवेश किया। कबीर साहब को बाहर ही निगरानी के लिए छोड़ दिया।&lt;br /&gt;
अब स्थिति यह थी कि कबीर साहब दीवार के बाहर की ओर थे और कमाल भीतर की ओर।&lt;br /&gt;
कमाल ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;लगता है कि घर वाले जाग गए हैं। हमें भागना पड़ेगा, नहीं तो पकड़े जाएँगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तो फिर समस्या क्या है ?&amp;quot; कबीर ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;समस्या ये है कि दीवार बहुत ऊँची है। मैं इसको पार नहीं कर सकता। मैंने यहाँ एक छेद भी देखा है लेकिन उस छेद से मेरा बाहर आना मुमकिन नहीं है। केवल मेरा सिर ही बाहर आ सकता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तो फिर क्या किया जाय ?&amp;quot; कबीर ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;कर तो कुछ नहीं सकते सिवा इसके कि मैं अपना सिर बाहर निकालता हूँ और आप मेरा सिर काटकर ले जाएँ ताकि कोई यह न पहचान पाए कि आपका बेटा चोरी कर रहा था।&amp;quot; कमाल ने कबीर साहब को सुझाव दिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन सिर काटूँगा किस चीज़ से, यहाँ तो कुछ भी नहीं है। मैं ऐसा करता हूँ कि पास ही क़साई का घर है, उससे गंडासा लेकर आता हूँ।&amp;quot; इतना कहकर कबीर साहब क़साई के घर पहुँचे और उससे गंडासा मांगा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;कबीर साहब! इतनी रात गए आप गंडासे का क्या करेंगे ?&amp;quot; कसाई ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;बात ये है कि मुझे कमाल का सिर काटना है।&amp;quot; कबीर सहजता से बोले। कबीर साहब को सब जानते थे और उनकी संत प्रकृति को भी। क़साई समझ गया कि कबीर साहब कमाल को कोई सीख देना चाह रहे हैं।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छा! ऐसी बात है तो मैं भी आपके साथ चलता हूँ।&amp;quot; क़साई ने हँस कर कहा और कबीर साहब के साथ कमाल के पास पहुँचा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन कमाल यहाँ कर क्या रहा है ?&amp;quot; क़साई ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;कमाल यहाँ चोरी कर रहा था और निकल नहीं पा रहा है...&amp;quot; कबीर साहब ने पूरी बात बताई।&lt;br /&gt;
क़साई की मदद से कमाल बाहर आ गया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;फिर कभी ख़िदमत का मौक़ा दीजिएगा कबीर साहब!&amp;quot; चलते-चलते क़साई बोला&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं-नहीं, इस बार तो हम लोग घर से ही गंडासा साथ लेकर चलेंगे जिससे रात में तुमको जगाना ना पड़े।&amp;quot; कबीर बोले&lt;br /&gt;
क़साई हँसता हुआ चला गया।&lt;br /&gt;
मेरे ख़याल से कबीर साहब ने जिस तरह से कमाल का साथ दिया वह केवल कबीर साहब ही कर सकते थे। महापुरुषों के लक्षण भी विलक्षण होते हैं और उनके जीने का तरीक़ा भी। उनकी महानता का पता उनके उस तरीक़े से लगता है जो तरीक़ा वे अपनी बात को रखने के लिए अपनाते हैं और यही आगे चलकर एक ऐसी शिक्षा बन जाती है जो सदैव याद रहती है। जैसे,  महाभारत में भीष्म का यह बताना कि उनको मारना है तो शिखण्डी को सामने कर दो। महाभारत युद्ध में  कर्ण द्वारा केवल अर्जुन को ही मारने की प्रतिज्ञा का निर्वहन करते हुए शेष सभी पांडवों को हराने के बावजूद भी उनका वध न करना।...&lt;br /&gt;
ख़ैर...&lt;br /&gt;
आगे चलकर कमाल भी संत हो गये। कुछ समय बाद कबीर साहब की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी और दूसरे शहरों से भी लोग उनसे मिलने आने लगे। एक बहुत धनी व्यापारी कबीर साहब के पास आया और उनको संतरे के आकार का हीरा दिखाके बोला-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरे पास ये अत्यंत मूल्यवान हीरा है और मैं इसे आपको देना चाहता हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन मैं इसका क्या करूँगा। यह मेरे किस काम का है। इसे तुम वापस ले जाओ। मैं तो इसको हाथ भी नहीं लगाऊँगा।&amp;quot; कबीर बोले&lt;br /&gt;
निराश होकर व्यापारी वहाँ से लौटने लगा। उसने एक व्यक्ति से पूछा कि क्या कोई और संत भी है यहाँ। उस व्यक्ति ने बताया कि कबीर के बेटे भी संत हैं और पास ही उनकी कुटिया है।&lt;br /&gt;
व्यापारी कमाल के पास पहुँचा और हीरे को कमाल को समर्पित करना चाहा। कमाल ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इसका कोई मोल मेरे लिए नहीं है। इसे वापस ले जाओ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
व्यापारी यह सोचता हुआ वापस जाने लगा कि बाप-बेटे दोनों ही पहुँचे हुए संत हैं और मोह-माया में भरोसा नहीं करते। लेकिन कमाल ने उसे वापस बुलाया और कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इस पत्थर को तुम भी क्यों ढोते हो ? इससे मुक्ति पाओ और इसे यहीं छोड़ दो। काशी आए हो तो कुछ ज्ञान भी लेकर जाओ केवल पत्थरों को कब तक संभालते फिरोगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं इस हीरे को कहाँ रख दूँ?&amp;quot; व्यापारी ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;जहाँ चाहे रख दो, फेंक दो या चाहो तो मेरी कुटिया में ही छोड़ दो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
व्यापारी ने अपनी समझ से हीरे को कमाल के पीछे की ओर फेंक दिया और हीरा कहीं दुछत्ती पर जा गिरा।&lt;br /&gt;
व्यापारी यह सोचते हुए लौट गया कि कबीर जैसे पिता का ये कैसा बेटा है ?  यह तो पूरा ठग है। इसने बातों में लगाकर मुझसे हीरा ले लिया।&lt;br /&gt;
कुछ साल गुज़र गए व्यापारी फिर एक बार काशी आया और कमाल के यहाँ पहुँचा। कमाल से उसने पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप मुझे पहचानते हैं ? मैं कुछ वर्षों पहले आया था और आपको एक हीरा दे गया था ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
कमाल ने उसे पहचानने का प्रयास करते हुए उससे कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं तो स्वयं को भी नहीं पहचानता फिर तुमको कैसे पहचानूंगा और तुम किस हीरे की बात कर रहे हो मुझे तो कभी किसी ने कोई हीरा नहीं दिया। लगता है तुम ग़लत जगह आ गए हो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जी नहीं मैं बिल्कुल सही जगह आया हूँ। मैंने आपको एक हीरा दिया था। याद कीजिए... आप जहाँ बैठे हैं उसके ठीक पीछे ही आपने हीरे को फेंकने के लिए कहा था।&amp;quot;  व्यापारी ने चिढ़कर कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुमने जहाँ फेंका वहीं खोज लो, शायद मिल जाए।&amp;quot; कमाल ने मुस्कुराते हुए कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अजी वहाँ कहाँ मिलेगा... &amp;quot;इस तरह बड़बड़ाते हुए व्यापारी हीरा खोजने लगा और देखता क्या है कि हीरा तो वहीं रखा है। व्यापारी कमाल के पैरों गिर पड़ा और क्षमा प्रार्थना करते हुए बोला-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आपने सच ही कहा था कि मैंने आपको कोई हीरा नहीं दिया, दिया तो केवल पत्थर, लेकिन आपने मुझे सचमुच का हीरा दिया है। आपके दिए हुए हीरे को मैं छू तो नहीं सकता लेकिन इस हीरे से भी अनमोल शिक्षा के सहारे पूरा जीवन आनंद से व्यतीत कर सकता हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        ज़िन्दगी जितनी सहज हो उतनी ही आनंदमय होती है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन, नहाने के लिए, सर धोने के लिए और दाढ़ी बनाने के लिए एक ही साबुन का प्रयोग करते थे। किसी ने पूछा तो बोले कि तीन तरह के साबुनों से मुझे उलझन होती है और मैं असमंजस में रहना पसंद नहीं करता। सहज होना आनंददायक तो है लेकिन सहज होना बहुत मुश्किल है। सरल और सहज तो आप 'होते' हैं 'बन' नहीं सकते फिर भी प्रयास करते रहने में क्या बुराई है...। सहजता राम जैसी कि तैयार हुए 'राज सिंहासन' के लिए और पल भर में ही जाना पड़ा 'वनवास' के लिए। राम वन को भी सहजता से ही गए। महावीर सहजता में इतने गहरे उतर गए कि 'निर्वस्त्र' ही रहे। रामकृष्ण परमहंस कहीं बारात में नाच होता देखते तो स्वयं भी नाचने लग जाते। जनक महलों में रहकर भी 'विदेह' कहलाए। चैतन्य महाप्रभु की सहज भक्ति के कारण तो मुस्लिम भी 'कृष्ण भक्त' हो गए और इन भक्तों ने वृन्दावन में अनेक भव्य मंदिर बनवा दिए। विष्णुगुप्त चाणक्य चंद्रगुप्त को मगध का 'शासक' बना कर वापस 'शिक्षक' बन गए।&lt;br /&gt;
अनेक-अनेक उदाहरण ऐसे हैं जिनसे विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों द्वारा यह पता लगता है कि सहजता 'त्याग' से प्राप्त नहीं होती बल्कि जो कुछ भी उपलब्ध है, उसके प्रति 'साक्षी भाव' होना ही 'सहजता' है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%9A_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1587</id>
		<title>प्रतीक्षा की सोच -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%9A_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1587"/>
				<updated>2017-05-21T16:55:10Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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[[चित्र:Women-labour.png|300px|right]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
पुराने समय की बात है एक राजा के राज्य में बेहद सुंदर बाग़ीचा था। यह कोई मामूली बाग़ीचा नहीं था। इसे देखने दुनिया भर से लोग आया करते थे। इस बाग़ीचे के इतने सुंदर होने का कारण था 'रमण'। रमण ही इस सुंदर उद्यान का कर्ता-धर्ता था। बूढ़ा हो रहा था रमण और उसे चिंता सता रही थी कि उसके बाद बाग़ का क्या होगा ?&lt;br /&gt;
आख़िरकार उसने राजा से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज ! मैं वृद्ध हो गया हूँ और मेरे जीवन का क्या पता कि आज हूँ कल नहीं... मेरे बाद उद्यान का क्या होगा यही चिंता मुझे खाए जा रही है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुमने सोचा क्या है रमण ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज ! मैं यात्रा पर जाना चाहता हूँ, जिससे मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो आपके इस विश्व प्रसिद्ध उद्यान की सही देखभाल कर सके। यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं यात्रा पर चला जाउँ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
इस तरह रमण देश की यात्रा पर निकल गया...&lt;br /&gt;
अनेक नगरों का भ्रमण करने के बाद वह काशी पहुँचा। जब काशी में भी उसे अपने मापदण्ड के अनुसार कोई व्यक्ति नहीं मिला तो वह निराश हो कर वापस लौटने लगा। रास्ते में तेज़ धूप थी और भयंकर गर्मी पड़ रही थी। चलते-चलते उसने देखा कि कुछ मज़दूर पत्थर तोड़ रहे हैं। उन मज़दूरों में एक महिला भी थी जो सभी के साथ बराबर काम कर रही थी।&lt;br /&gt;
रमण ने अपनी गाड़ी रुकवाई और एक मज़दूर से पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इतनी कड़ी धूप में क्या कर रहे हो भाई?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;करेंगे क्या... पत्थर तोड़ रहे हैं।&amp;quot; मज़दूर निराशा से बोला&lt;br /&gt;
थोड़ा आगे चलकर उसने एक और मज़दूर से भी यही सवाल किया तो दूसरे मज़दूर ने जवाब दिया&lt;br /&gt;
&amp;quot;रोज़ी रोटी कमा रहे हैं सरकार और हमारे पास करने को है ही क्या ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
जब रमण की गाड़ी उस महिला के पास पहुँची तो एक बार फिर रमण ने वही सवाल दोहराया&lt;br /&gt;
महिला ने पत्थर तोड़ना रोककर रमण से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;हम यहाँ एक भव्य मंदिर बना रहे हैं, जो अपने-आप में विलक्षण होगा और विशाल भी होगा। यात्रियों को आश्रय मिलेगा साथ ही स्वस्थ वातावरण भी। जब यह बन जाए तो आप देखने अवश्य आना&amp;quot;&lt;br /&gt;
इतना सुनते ही रमण उस महिला को परिवार सहित राजा के पास ले गया और महिला को उद्यान की देखरेख की ज़िम्मेदारी दे दी।&lt;br /&gt;
जब राजा को पता चला तो राजा ने पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;रमण ! तुमने एक अनपढ़ मज़दूर महिला को उद्यान की ज़िम्मेदारी दे दी है इसके पीछे क्या कारण है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज ! मेरे पास उद्यान की देख-भाल के लिए वनस्पति शास्त्री से लेकर भूमि-शास्त्री तक सभी विद्वान सदैव उपस्थित रहते हैं। मुझे आवश्यकता थी तो एक ऐसे व्यक्ति की जो कि किसी भी कार्य को करने को पूरी तरह से सकारात्मक दृष्टिकोण का गुण रखता हो क्योंकि ऐसा व्यक्ति ही सृजनकर्ता हो सकता है। चिलचिलाती धूप में, मंदिर के लिए पत्थर तो वहाँ सभी मज़दूर तोड़ रहे थे लेकिन इस महिला का, पत्थर तोड़ने के कार्य को 'मंदिर निर्माण कार्य' समझ कर मेहनत करना एक सकारात्मक सोच का सबसे अच्छा उदाहरण है। महाराज ! महान अर्थशास्त्री चाणक्य ने लिखा है कि ज्ञान प्राप्त करने से कोई व्यक्ति योग्य हो सकता है गुणी नहीं हो सकता। यही ध्यान में रखते हुए मैंने जहाँ योग्य विद्वानों को उद्यान के लिए चुना,  वहीं पर कम से कम एक गुणी व्यक्ति को भी चुना।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइए अब भारतकोश पर चलते हैं। &lt;br /&gt;
सकारात्मक सोच का मतलब क्या है ? किसे कहते हैं सकारात्मक सोच और इसकी आदत कैसे डाली जाए ? &lt;br /&gt;
एक बार महान दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति से किसी ने प्रश्न किया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं अपने माता-पिता की इज़्ज़त करना चाहता हूँ और उन्हें सम्मान देना चाहता हूँ तो मुझे क्या करना चाहिए ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
इसके उत्तर में कृष्णमूर्ति ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम उनका अपमान करना बंद कर दो तो उनका सम्मान अपने-आप हो जाएगा। यदि तुम सदैव इस बात का ध्यान रखो कि कहीं भूल से भी मेरे माता-पिता का अपमान तो नहीं हो गया तो वे स्वयं ही सम्मानित हो जाएँगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यही बात सकारात्मक सोच पर भी लागू होती है। यदि हम नकारात्मक रवैया छोड़ दें तो सकारात्मक सोच अपने-आप ही बन जाती है लेकिन कैसे छोड़ें नकारात्मक सोच ?&lt;br /&gt;
; नकारात्मक सोच के कुछ उदाहरण-&lt;br /&gt;
* स्पर्धा में स्वयं को जिताने की बजाय दूसरे को हराने की सोच&lt;br /&gt;
* प्रेम में प्रेमी या प्रेमिका का प्रेम पाने की बजाय प्रेमी या प्रेमिका को पाने (हासिल करने) की इच्छा&lt;br /&gt;
* अपनी कमज़ोरी छुपाने के लिए दूसरे की शिकायत करना&lt;br /&gt;
* व्यापार में 'शॉर्टकट' तलाश करना या ग़ैरक़ानूनी तरीक़े अपनाना&lt;br /&gt;
* अपनी और दूसरों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह रहना&lt;br /&gt;
* तुरंत परिणाम की उम्मीद में हर समय अधीर रहना &lt;br /&gt;
* जिससे काम हो सिर्फ़ उसी से मिलने की इच्छा रखना&lt;br /&gt;
... तमाम ऐसे ही उदाहरण हैं जिनसे हमारी नकारात्मक सोच ज़ाहिर होती है।&lt;br /&gt;
सकारात्मक सोच का व्यक्ति बनने के बहुत उपाय हैं जिनमें से एक है 'धैर्य'। धैर्य को समझना ज़रूरी है। यदि हम बिना बैचैन हुए किसी का इंतज़ार कर सकते हैं तो हम धैर्यवान हैं। सहज होकर, सानंद प्रतीक्षा करना, सबसे आवश्यक गुण है। यदि यह गुण हमारे भीतर नहीं है तो हमें यह योग्यता पैदा करनी चाहिए। प्रतीक्षा किसी की भी हो सकती है; किसी व्यक्ति की, किसी सफलता की या किसी नतीजे की। प्रतीक्षा करने में बेचैनी होने से हमारी सोच का पता चलता है। प्रतीक्षा करने में यदि बेचैनी होती है तो यह सोच नकारात्मक सोच है। प्रतीक्षा का आनंद लेने वाला ही सकारात्मक व्यक्ति होता है।&lt;br /&gt;
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो प्रतीक्षा करने में बेचैन नहीं होते। सीधी सी बात है कि सकारात्मक सोच के व्यक्ति भी बहुत कम ही होते हैं। असल में हम जितने अधिक नासमझ होते हैं उतना ही प्रतीक्षा करने में बेचैन रहते हैं। बच्चों को यदि हम देखें तो आसानी से समझ सकते हैं कि किसी की प्रतीक्षा करने में बच्चे कितने अधीर होते हैं। धीरे-धीरे जब उम्र बढ़ती है तो यह अधीरता कम होती जाती है क्योंकि उनमें 'समझ' आ जाती है। इसी 'समझ' को समझना ज़रूरी है क्योंकि जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि हमारे जीवन में प्रतीक्षा का क्या महत्त्व है और इसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव होता है तब तक हम सकारात्मक सोच नहीं समझ सकते।&lt;br /&gt;
सभी को किसी न किसी की प्रतीक्षा है। राजा हो या रंक इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। साधु-संत भी ईश्वर दर्शन की या मोक्ष की प्रतीक्षा में रहते हैं। यहाँ समझने वाली बात ये है कि हम प्रतीक्षा कैसे कर रहे हैं। यदि कोई संत मोक्ष की प्रतीक्षा में है और वह सहज रूप से यह प्रतीक्षा नहीं कर रहा तो उसका मार्ग ही पूर्णतया अर्थहीन है। वैसे भी सहज हो जाना ही मोक्ष को प्राप्त कर लेना है। यदि और गहराई से देखें तो मोक्ष को 'प्राप्त' करने जैसा भी कुछ नहीं है। मोक्ष तो 'होता' और 'घटता' है, बस इसे समझना ज़रूरी है। ख़ैर यहाँ तो हम सकारात्मक सोच की ही बात कर रहे हैं।&lt;br /&gt;
प्रतीक्षा के प्रति सहज भाव हो जाना ही हमें सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बनाता है। असल में प्रतीक्षा के प्रति निर्लिप्त हो जाना ही सकारात्मक सोच है।&lt;br /&gt;
;एक उदाहरण देखें&lt;br /&gt;
एक बार एक संत और उनका एक शिष्य एक नदी के किनारे-किनारे जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने देखा कि एक स्त्री मूल्यवान वस्त्र और आभूषण पहने नदी के किनारे खड़ी है। पास पहुँचने पर स्त्री ने संत से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्षमा करें प्रभु ! कृपया मेरी सहायता करें। मैं एक नृत्यांगना हूँ और लोगों का मनोरंजन करना और नगरवधू (वैश्या) की तरह जीवन जीना ही मेरी नियति है। आज सायंकाल, नदी के पार, यहाँ के नगर श्रेष्ठि (नगर सेठ) के यहाँ मेरे नृत्य का आयोजन है। मेरा नाव वाला आज आया नहीं है। मैं चलकर भी नदी पार कर सकती हूँ क्योंकि नदी में पानी कम है किन्तु मेरे वस्त्र भीग जाएँगे और मेरा नृत्य कार्यक्रम नहीं हो पाएगा। कृपया नदी पार करने में मेरी सहायता करें। इस दीन नगर वधू पर दया करें प्रभु!&amp;quot;&lt;br /&gt;
इससे पहले कि संत कुछ कहते, उनके शिष्य ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;लगता है तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है जो तुम जैसी वैश्या साधु-संतों से यह अपेक्षा रखती है कि तुमको अंक में भरकर (गोदी में उठाकर) नदी पार करवाई जाए। हमारे लिए तो तुमको स्पर्श करना भी पाप है। तुमको ऐसा दु:साहस नहीं करना चाहिए।&amp;quot; &lt;br /&gt;
इतना कहकर शिष्य आगे बढ़ गया किन्तु संत वहीं खड़े रहे और शिष्य को आदेश दिया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इसे अविलम्ब अपने अंक में लेकर नदी पार करवाओ, यह मेरी आज्ञा है शिष्य !&amp;quot; &lt;br /&gt;
शिष्य ने आज्ञा का पालन किया। कुछ देर बाद जब गुरु-शिष्य एक स्थान पर विश्राम करने को रुके तो शिष्य ने पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;गुरु जी ! आपने उस स्त्री को नदी पार कराने के लिए क्यों कहा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कौन सी स्त्री ?&amp;quot; गुरु ने आश्चर्य प्रकट किया&lt;br /&gt;
&amp;quot;वही सुन्दर स्त्री, जो गोरी थी, जिसकी बड़ी-बड़ी सुन्दर आँखें थीं, लाल वस्त्र पहने थी, मैं उसी की बात कर रहा हूँ। लेकिन क्या आपको याद नहीं कि एक स्त्री को हमने नदी पार कराई थी।&amp;quot; शिष्य ने जिज्ञासा प्रकट की।&lt;br /&gt;
संत ने शांत भाव से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुझे यह तो याद है कि मैंने किसी की सहायता की लेकिन किसकी सहायता की यह याद नहीं क्योंकि यह बात में वहीं भूल गया था जिसे तुम अब तक ढो रहे हो। मेरे लिए यह केवल एक कार्य था जो मुझे समाज की आवश्यकता के लिए करना था, जिसके लिए मना करके मैं स्वयं को मनुष्यता की श्रेणी से गिरा नहीं सकता। तुमको तो उसका चेहरा तक याद है और मुझे उसका स्त्री होना भी नहीं। यदि तुमने भी यह सोचा होता कि तुम गुरु की आज्ञा का पालन मात्र कर रहे हो तो तुम्हारा ध्यान भी उसके चेहरे और वस्त्रों पर नहीं जाता।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यह उदाहरण जीवन की पूर्ण सकारात्मक सोच को परिभाषित करता है। यदि हम सहज होकर निर्लिप्त भाव से अपनी भूमिका इस दुनिया में जीवन भर निभा सकें तो ही यह निश्चित है कि हमारी सोच सकारात्मक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%9A_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1586</id>
		<title>प्रतीक्षा की सोच -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%9A_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1586"/>
				<updated>2017-05-21T16:52:50Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;प्रतीक्षा की सोच&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Women-labour.png|300px|right]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
पुराने समय की बात है एक राजा के राज्य में बेहद सुंदर बाग़ीचा था। यह कोई मामूली बाग़ीचा नहीं था। इसे देखने दुनिया भर से लोग आया करते थे। इस बाग़ीचे के इतने सुंदर होने का कारण था 'रमण'। रमण ही इस सुंदर उद्यान का कर्ता-धर्ता था। बूढ़ा हो रहा था रमण और उसे चिंता सता रही थी कि उसके बाद बाग़ का क्या होगा ?&lt;br /&gt;
आख़िरकार उसने राजा से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज ! मैं वृद्ध हो गया हूँ और मेरे जीवन का क्या पता कि आज हूँ कल नहीं... मेरे बाद उद्यान का क्या होगा यही चिंता मुझे खाए जा रही है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुमने सोचा क्या है रमण ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज ! मैं यात्रा पर जाना चाहता हूँ, जिससे मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो आपके इस विश्व प्रसिद्ध उद्यान की सही देखभाल कर सके। यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं यात्रा पर चला जाउँ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
इस तरह रमण देश की यात्रा पर निकल गया...&lt;br /&gt;
अनेक नगरों का भ्रमण करने के बाद वह [[काशी]] पहुँचा। जब काशी में भी उसे अपने मापदण्ड के अनुसार कोई व्यक्ति नहीं मिला तो वह निराश हो कर वापस लौटने लगा। रास्ते में तेज़ धूप थी और भयंकर गर्मी पड़ रही थी। चलते-चलते उसने देखा कि कुछ मज़दूर पत्थर तोड़ रहे हैं। उन मज़दूरों में एक महिला भी थी जो सभी के साथ बराबर काम कर रही थी।&lt;br /&gt;
रमण ने अपनी गाड़ी रुकवाई और एक मज़दूर से पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इतनी कड़ी धूप में क्या कर रहे हो भाई?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;करेंगे क्या... पत्थर तोड़ रहे हैं।&amp;quot; मज़दूर निराशा से बोला&lt;br /&gt;
थोड़ा आगे चलकर उसने एक और मज़दूर से भी यही सवाल किया तो दूसरे मज़दूर ने जवाब दिया&lt;br /&gt;
&amp;quot;रोज़ी रोटी कमा रहे हैं सरकार और हमारे पास करने को है ही क्या ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
जब रमण की गाड़ी उस महिला के पास पहुँची तो एक बार फिर रमण ने वही सवाल दोहराया&lt;br /&gt;
महिला ने पत्थर तोड़ना रोककर रमण से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;हम यहाँ एक भव्य मंदिर बना रहे हैं, जो अपने-आप में विलक्षण होगा और विशाल भी होगा। यात्रियों को आश्रय मिलेगा साथ ही स्वस्थ वातावरण भी। जब यह बन जाए तो आप देखने अवश्य आना&amp;quot;&lt;br /&gt;
इतना सुनते ही रमण उस महिला को परिवार सहित राजा के पास ले गया और महिला को उद्यान की देखरेख की ज़िम्मेदारी दे दी।&lt;br /&gt;
जब राजा को पता चला तो राजा ने पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;रमण ! तुमने एक अनपढ़ मज़दूर महिला को उद्यान की ज़िम्मेदारी दे दी है इसके पीछे क्या कारण है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज ! मेरे पास उद्यान की देख-भाल के लिए वनस्पति शास्त्री से लेकर भूमि-शास्त्री तक सभी विद्वान सदैव उपस्थित रहते हैं। मुझे आवश्यकता थी तो एक ऐसे व्यक्ति की जो कि किसी भी कार्य को करने को पूरी तरह से सकारात्मक दृष्टिकोण का गुण रखता हो क्योंकि ऐसा व्यक्ति ही सृजनकर्ता हो सकता है। चिलचिलाती धूप में, मंदिर के लिए पत्थर तो वहाँ सभी मज़दूर तोड़ रहे थे लेकिन इस महिला का, पत्थर तोड़ने के कार्य को 'मंदिर निर्माण कार्य' समझ कर मेहनत करना एक सकारात्मक सोच का सबसे अच्छा उदाहरण है। महाराज ! महान अर्थशास्त्री चाणक्य ने लिखा है कि ज्ञान प्राप्त करने से कोई व्यक्ति योग्य हो सकता है गुणी नहीं हो सकता। यही ध्यान में रखते हुए मैंने जहाँ योग्य विद्वानों को उद्यान के लिए चुना,  वहीं पर कम से कम एक गुणी व्यक्ति को भी चुना।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइए अब भारतकोश पर चलते हैं। &lt;br /&gt;
सकारात्मक सोच का मतलब क्या है ? किसे कहते हैं सकारात्मक सोच और इसकी आदत कैसे डाली जाए ? &lt;br /&gt;
एक बार महान दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति से किसी ने प्रश्न किया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं अपने माता-पिता की इज़्ज़त करना चाहता हूँ और उन्हें सम्मान देना चाहता हूँ तो मुझे क्या करना चाहिए ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
इसके उत्तर में कृष्णमूर्ति ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम उनका अपमान करना बंद कर दो तो उनका सम्मान अपने-आप हो जाएगा। यदि तुम सदैव इस बात का ध्यान रखो कि कहीं भूल से भी मेरे माता-पिता का अपमान तो नहीं हो गया तो वे स्वयं ही सम्मानित हो जाएँगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यही बात सकारात्मक सोच पर भी लागू होती है। यदि हम नकारात्मक रवैया छोड़ दें तो सकारात्मक सोच अपने-आप ही बन जाती है लेकिन कैसे छोड़ें नकारात्मक सोच ?&lt;br /&gt;
; नकारात्मक सोच के कुछ उदाहरण-&lt;br /&gt;
* स्पर्धा में स्वयं को जिताने की बजाय दूसरे को हराने की सोच&lt;br /&gt;
* प्रेम में प्रेमी या प्रेमिका का प्रेम पाने की बजाय प्रेमी या प्रेमिका को पाने (हासिल करने) की इच्छा&lt;br /&gt;
* अपनी कमज़ोरी छुपाने के लिए दूसरे की शिकायत करना&lt;br /&gt;
* व्यापार में 'शॉर्टकट' तलाश करना या ग़ैरक़ानूनी तरीक़े अपनाना&lt;br /&gt;
* अपनी और दूसरों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह रहना&lt;br /&gt;
* तुरंत परिणाम की उम्मीद में हर समय अधीर रहना &lt;br /&gt;
* जिससे काम हो सिर्फ़ उसी से मिलने की इच्छा रखना&lt;br /&gt;
... तमाम ऐसे ही उदाहरण हैं जिनसे हमारी नकारात्मक सोच ज़ाहिर होती है।&lt;br /&gt;
सकारात्मक सोच का व्यक्ति बनने के बहुत उपाय हैं जिनमें से एक है 'धैर्य'। धैर्य को समझना ज़रूरी है। यदि हम बिना बैचैन हुए किसी का इंतज़ार कर सकते हैं तो हम धैर्यवान हैं। सहज होकर, सानंद प्रतीक्षा करना, सबसे आवश्यक गुण है। यदि यह गुण हमारे भीतर नहीं है तो हमें यह योग्यता पैदा करनी चाहिए। प्रतीक्षा किसी की भी हो सकती है; किसी व्यक्ति की, किसी सफलता की या किसी नतीजे की। प्रतीक्षा करने में बेचैनी होने से हमारी सोच का पता चलता है। प्रतीक्षा करने में यदि बेचैनी होती है तो यह सोच नकारात्मक सोच है। प्रतीक्षा का आनंद लेने वाला ही सकारात्मक व्यक्ति होता है।&lt;br /&gt;
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो प्रतीक्षा करने में बेचैन नहीं होते। सीधी सी बात है कि सकारात्मक सोच के व्यक्ति भी बहुत कम ही होते हैं। असल में हम जितने अधिक नासमझ होते हैं उतना ही प्रतीक्षा करने में बेचैन रहते हैं। बच्चों को यदि हम देखें तो आसानी से समझ सकते हैं कि किसी की प्रतीक्षा करने में बच्चे कितने अधीर होते हैं। धीरे-धीरे जब उम्र बढ़ती है तो यह अधीरता कम होती जाती है क्योंकि उनमें 'समझ' आ जाती है। इसी 'समझ' को समझना ज़रूरी है क्योंकि जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि हमारे जीवन में प्रतीक्षा का क्या महत्त्व है और इसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव होता है तब तक हम सकारात्मक सोच नहीं समझ सकते।&lt;br /&gt;
सभी को किसी न किसी की प्रतीक्षा है। राजा हो या रंक इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। साधु-संत भी ईश्वर दर्शन की या मोक्ष की प्रतीक्षा में रहते हैं। यहाँ समझने वाली बात ये है कि हम प्रतीक्षा कैसे कर रहे हैं। यदि कोई संत मोक्ष की प्रतीक्षा में है और वह सहज रूप से यह प्रतीक्षा नहीं कर रहा तो उसका मार्ग ही पूर्णतया अर्थहीन है। वैसे भी सहज हो जाना ही मोक्ष को प्राप्त कर लेना है। यदि और गहराई से देखें तो मोक्ष को 'प्राप्त' करने जैसा भी कुछ नहीं है। मोक्ष तो 'होता' और 'घटता' है, बस इसे समझना ज़रूरी है। ख़ैर यहाँ तो हम सकारात्मक सोच की ही बात कर रहे हैं।&lt;br /&gt;
प्रतीक्षा के प्रति सहज भाव हो जाना ही हमें सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बनाता है। असल में प्रतीक्षा के प्रति निर्लिप्त हो जाना ही सकारात्मक सोच है।&lt;br /&gt;
;एक उदाहरण देखें&lt;br /&gt;
एक बार एक संत और उनका एक शिष्य एक नदी के किनारे-किनारे जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने देखा कि एक स्त्री मूल्यवान वस्त्र और आभूषण पहने नदी के किनारे खड़ी है। पास पहुँचने पर स्त्री ने संत से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्षमा करें प्रभु ! कृपया मेरी सहायता करें। मैं एक नृत्यांगना हूँ और लोगों का मनोरंजन करना और नगरवधू (वैश्या) की तरह जीवन जीना ही मेरी नियति है। आज सायंकाल, नदी के पार, यहाँ के नगर श्रेष्ठि (नगर सेठ) के यहाँ मेरे नृत्य का आयोजन है। मेरा नाव वाला आज आया नहीं है। मैं चलकर भी नदी पार कर सकती हूँ क्योंकि नदी में पानी कम है किन्तु मेरे वस्त्र भीग जाएँगे और मेरा नृत्य कार्यक्रम नहीं हो पाएगा। कृपया नदी पार करने में मेरी सहायता करें। इस दीन नगर वधू पर दया करें प्रभु!&amp;quot;&lt;br /&gt;
इससे पहले कि संत कुछ कहते, उनके शिष्य ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;लगता है तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है जो तुम जैसी वैश्या साधु-संतों से यह अपेक्षा रखती है कि तुमको अंक में भरकर (गोदी में उठाकर) नदी पार करवाई जाए। हमारे लिए तो तुमको स्पर्श करना भी पाप है। तुमको ऐसा दु:साहस नहीं करना चाहिए।&amp;quot; &lt;br /&gt;
इतना कहकर शिष्य आगे बढ़ गया किन्तु संत वहीं खड़े रहे और शिष्य को आदेश दिया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इसे अविलम्ब अपने अंक में लेकर नदी पार करवाओ, यह मेरी आज्ञा है शिष्य !&amp;quot; &lt;br /&gt;
शिष्य ने आज्ञा का पालन किया। कुछ देर बाद जब गुरु-शिष्य एक स्थान पर विश्राम करने को रुके तो शिष्य ने पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;गुरु जी ! आपने उस स्त्री को नदी पार कराने के लिए क्यों कहा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कौन सी स्त्री ?&amp;quot; गुरु ने आश्चर्य प्रकट किया&lt;br /&gt;
&amp;quot;वही सुन्दर स्त्री, जो गोरी थी, जिसकी बड़ी-बड़ी सुन्दर आँखें थीं, लाल वस्त्र पहने थी, मैं उसी की बात कर रहा हूँ। लेकिन क्या आपको याद नहीं कि एक स्त्री को हमने नदी पार कराई थी।&amp;quot; शिष्य ने जिज्ञासा प्रकट की।&lt;br /&gt;
संत ने शांत भाव से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुझे यह तो याद है कि मैंने किसी की सहायता की लेकिन किसकी सहायता की यह याद नहीं क्योंकि यह बात में वहीं भूल गया था जिसे तुम अब तक ढो रहे हो। मेरे लिए यह केवल एक कार्य था जो मुझे समाज की आवश्यकता के लिए करना था, जिसके लिए मना करके मैं स्वयं को मनुष्यता की श्रेणी से गिरा नहीं सकता। तुमको तो उसका चेहरा तक याद है और मुझे उसका स्त्री होना भी नहीं। यदि तुमने भी यह सोचा होता कि तुम गुरु की आज्ञा का पालन मात्र कर रहे हो तो तुम्हारा ध्यान भी उसके चेहरे और वस्त्रों पर नहीं जाता।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यह उदाहरण जीवन की पूर्ण सकारात्मक सोच को परिभाषित करता है। यदि हम सहज होकर निर्लिप्त भाव से अपनी भूमिका इस दुनिया में जीवन भर निभा सकें तो ही यह निश्चित है कि हमारी सोच सकारात्मक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B9%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%AE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1585</id>
		<title>अहम का वहम -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B9%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%AE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1585"/>
				<updated>2017-05-21T16:50:00Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;अहम का वहम&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Yamuna-Mathura-2.jpg|300px|border|right]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        कहते हैं कि बादशाह अकबर वृन्दावन में स्वामी हरिदास के दर्शन करने संगीत सम्राट तानसेन के साथ आया था। स्वामी जी के मुख से यमुना की महिमा सुनकर अकबर की इच्छा यमुना पूजन करने की हुई। सभी पंडे पुजारी जानते थे कि जो भी अकबर को यमुना पूजन करवाएगा उसे अकबर बहुत बड़ा इनाम देगा। सभी में होड़ लगी थी कि कौन कराएगा पूजन !&lt;br /&gt;
        आख़िरकार तानसेन ने एक पुजारी को चुना जो सबसे अधिक विद्वान और बहुत वृद्ध था। जब पूजन हो गया तो अकबर ने पुजारी को एकान्त में ले जाकर यमुना की रेत से ही उठाकर एक 'फूटी कौड़ी' पुरस्कार के रूप में दी। पुजारी ने अकबर को विधिवत् आशीर्वाद दिया और पुरस्कार के लिए कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद दिया।&lt;br /&gt;
        कोई नहीं जानता था कि अकबर ने पुजारी को क्या दान दिया!  यहाँ तक कि तानसेन भी नहीं। मथुरा-वृन्दावन में तो सबने यही समझा कि पुजारी को अथाह संपत्ति मिली होगी। सच्चाई तो केवल पुजारी और अकबर को ही मालूम थी।&lt;br /&gt;
        लोगों ने पुजारी से पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;बादशाह ने तुम्हें क्या दान दिया ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सम्राट अकबर बहुत ही दयालु और दानवीर हैं। उन्होंने मुझे ऐसी चीज़ दी है जिसे मैं पूरे जीवन भर भी ख़र्च करने में लगा रहूँ, ख़र्च नहीं होगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        पुजारी ने तो सच ही बताया। इसमें क्या दो राय है कि फूटी कौड़ी का कोई मोल नहीं है और जिसका कोई मोल नहीं उसको हम ख़र्च करेंगे भी कैसे ?  लेकिन लोगों ने समझा कि निश्चित ही अनुपम उपहार दिया गया है। पुजारी की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। जो कोई भी मथुरा-वृन्दावन आता, वही चाहता कि उसका यमुना पूजन वही पुजारी करवाए जिसने कि अकबर से यमुना पूजन कराया। सम्राट के पुरोहित को कौन अपना पुरोहित नहीं बनाना चाहेगा। इस तरह पुजारी पर बहुत धन-संपत्ति एकत्रित होने लगी। &lt;br /&gt;
        यह बात तानसेन तक पहुँची और फिर अकबर को पता चला। अकबर को अपार आश्चर्य हुआ यह जानकर कि जो दान उसने पुजारी को दिया था वह इतना क़ीमती था कि सारे जीवन में उसे ख़र्च नहीं किया जा सकता। पुजारी को अकबर ने राजधानी आगरा बुलवाया और एकान्त में ले जाकर पूछा-&lt;br /&gt;
        &amp;quot;पुजारी जी!  मैंने आपको दान में एक कौड़ी दी थी और वह भी फूटी हुई थी फिर ये अफ़वाह कैसे हुई और आपके पास इतनी धन संपदा कहाँ से आई, ये क्या रहस्य है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;इसमें कोई रहस्य नहीं है महाराज,  न ही कोई झूठ है। यह सत्य है कि आपने मुझे एक फूटी कौड़ी ही दी थी, जिसका कि बाज़ार में कोई मोल नहीं है, अब आप ही बताइए कि मैं उस फूटी कौड़ी से भला क्या ख़रीद सकता हूँ ? महाराज आपने मुझे यमुना पूजन के लिए चुना,  यह मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा अवसर था। इस अवसर का लाभ उठा कर मैं कुछ अद्भुत करना चाहता था,  मैं यह भी जानता था कि ऐसे अवसर जीवन में बार-बार नहीं आते और मैं इतना मूर्ख नहीं कि सम्राट अकबर के उपहार का अपमान करूँ, इसलिए मैंने अपनी छोटी सी बुद्धि से उस फूटी कौड़ी को ही अपनी सफलता का कारण बना दिया।&amp;quot; इसके बाद अकबर ने उस पुजारी को बहुत इनाम देकर सम्मान के साथ विदा किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइए अब भारतकोश पर वापस चलें...&lt;br /&gt;
        मित्रो ! यदि हम भी अवसर का लाभ उठाना सीख जाएँ तो सफलता बहुत आसान होती है। किसी कलाकार, साहित्यकार, नेता या वैज्ञानिक का उदाहरण न लेते हुए हम मात्र कुछ उद्यमियों का उदाहरण लेते हैं। भारत के आज़ादी के बाद तीन प्रसिद्ध उद्यमी ऐसे हैं जिन्होंने 10 से 25 हज़ार रुपयों से अपना कारोबार शुरु किया,  धीरूभाई अंबानी (रिलाइंस),  नारायण मूर्ति (इंफ़ोसिस) और सुब्रतो राय (सहारा)। न तो ये किसी अमीर घराने से संबंधित थे और न ही कोई उद्योग-व्यापार की उल्लेखनीय पृष्ठभूमि थी, फिर भी ये मुख्य उद्यमियों में से एक बने। &lt;br /&gt;
ऐसा क्या होता है उन लोगों में जो विभिन्न क्षेत्रों में सफल होते हैं ?&lt;br /&gt;
        आइए इस पर चर्चा करते हैं...&lt;br /&gt;
        इन तीनों की कम से कम एक बात ऐसी है जिसे लगभग सभी जानते हैं-&lt;br /&gt;
        धीरूभाई अंबानी अक्सर कहा करते थे &amp;quot;मुझे किसी भी सरकारी व्यक्ति का अभिवादन करने में कोई संकोच नहीं है और मुझे इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उसका पद क्या है, भले ही वह चपरासी ही क्यों न हो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नारायण मूर्ति ने इंफ़ोसिस में सभी कर्मचारियों को निवेशक के रूप में हिस्सेदार बना लिया। बताया जाता है कि उनके वाहन चालक को भी इंफ़ोसिस में निवेशक होने का गर्व था।&lt;br /&gt;
सुब्रतो राय ने अधिकतर ऐसे समय में प्रसिद्ध लोगों की आर्थिक सहायता की जब वे किसी न किसी कारण संकटग्रस्त थे। वे सभी व्यक्ति हमेशा के लिए सुब्रतो राय के समर्थक हो गए&lt;br /&gt;
        कोई एक नहीं,  बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो किसी इंसान को सामान्य से विशेष बना देती हैं। जिसमें सबसे अहम् है अहंकार पर नियंत्रण या फिर अहंकार का परित्याग।&lt;br /&gt;
कैसे होता है अहंकार का परित्याग ? क्या अहंकार कोई वस्त्र जैसी वस्तु है जिसे उतार कर फेंका जा सके और अहंकार ही सबसे बड़ी अड़चन क्यों है सफलता में ? &lt;br /&gt;
        इसके लिए हमें मनुष्य के बचपन से शुरुआत करनी होगी। बच्चा जब पैदा होता है तो रोज़ाना 20-22 घंटे सोता है। यह समय धीरे-धीरे कम होता जाता है और जवान होने पर 8-9 घंटे की नींद रह जाती है। जैसे-जैसे नींद कम होती जाती है वैसे-वैसे ही मनुष्य के विकास की गति भी धीमी होती जाती है। जब अपने 'होने' का अहसास होने लगता है तब विकास थमने लगता है, अपनी ओर ध्यान देना प्रारम्भ हो जाता है और विकास का क्रम बाधित होने लगता है। हमने बुज़ुर्गों को अक्सर कहते सुना है कि बच्चों को कच्ची नींद मत जगाओ उनका विकास सोते में ही होता है। चिकित्सा विज्ञानी भी मानते हैं कि शरीर अपनी मरम्मत का कार्य सोते समय ही करता है। 18 से 25 वर्ष की उम्र के बाद मानव के शरीर का विकास रुक जाता है और साथ ही मस्तिष्क का भी। यह समय वह होता है जब हम अपनी ओर 'ध्यान' देना शुरू करते हैं। बचपन के दौर की तरह अपने प्रति बेसुध नहीं रहते। जितना हम स्वयं की ओर ध्यान देते हैं उतना ही हमारे विकास में बाधा आती है। यह विकास दोनों तरह का है शरीर का भी और बुद्धि का भी। साथ ही सफलता के संभावना भी बहुत कम हो जाती है। इस बात को समझना पड़ेगा कि ऐसा क्यों होता है ?&lt;br /&gt;
        रामकृष्ण परमहंस को परमहंस क्यों कहा गया ? कहा ही नहीं वरन माना भी जाता है। इसका कारण था कि वे स्वयं के प्रति बेसुध रहते थे। कबीर क्यों इतने सहज थे ? कारण वही है, ख़ुद को भुलाए रखने की प्रक्रिया को उन्होंने बचपन से अंतिम समय तक बनाए रखा। कहीं भी यह शृंखला टूटने नहीं दी और अहंकारों की शृंखला प्रारम्भ नहीं होने दी। वे जिए भी 125 वर्ष तक। न्यूटन, आइंस्टाइन,  फ्रॉयड जैसी अनेक प्रसिद्ध हस्तियों के अनेकानेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जिन उदाहरणों में उनके स्वयं को भुलाए रखने की और अपनी साधना की ओर ही ध्यान बनाए रखने की स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है। ये वे लोग हैं जो साधना में खाना-पीना तक भूल जाते थे।&lt;br /&gt;
        मैंने ऊपर लिखा है 'अहंकारों की शृंखला'। ऐसा लगता है जैसे अहंकार एक न होकर अनेक होते हों और आते-जाते रहते हों ? हाँ यह सही है बिल्कुल ऐसा ही है। जिस अहंकार का प्रदर्शन हम कमज़ोर पर कर रहे होते हैं,  वही अहंकार किसी शक्तिशाली के सामने आते ही छूमंतर हो जाता है। अहंकार सबसे अधिक रूप बदलता है और सबसे तेज़ भी। विद्वानों ने मन की गति को तीव्रतम माना है वह 'मन' भी इसी अहंकार से रचा बसा रहता है। मन भी अहंकार का ही एक रूप है। जब हम अहंकार से मुक्त होते हैं तो हमारा मन भी निरर्थक गति से रिक्त होता है। जितने भी समाज सुधारक और संत हुए हैं उन्होंने 'मैं' को भुलाने की ही बात कही है। यही 'वह' मैं है जो हमारे भीतर अहंकारों की कभी न टूटने वाली शृंखला बनाता है। इसी 'मैं' के भीतर स्वयं को क़ैद रखकर हम विभिन्न क्षेत्रों में अद्भुत सृजन आदि कर पाने से वंचित रह जाते हैं।&lt;br /&gt;
        हमारे आस-पास अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं जिनमें कोई न कोई विशेष प्रतिभा होती है लेकिन वे सफल नहीं होते और भाग्य को दोष देते मिलते हैं। जबकि वे यह नहीं जान पाते कि उनकी सफलता का रास्ता रोकने के लिए अहंकार हर समय उनके मस्तिष्क पर शासन करता है। प्रतिभा को निखारने के लिए हमें अपने ऊपर से ध्यान हटाना पड़ता है और उसके बाद ही हमारा ध्यान प्रतिभा को निखारने में लगता है। कोई जन्म से 'रहमान' या 'गुलज़ार' नहीं होता वरन उसे ख़ुद को भुलाकर अपनी साधना पर ध्यान देना होता है तब कहीं जाकर सफलता मिलती है। इसे यूँ कहा जाय तो अधिक सही होगा कि साधना में इतना खो जाया जाय कि ख़ुद को भूल जाएँ।&lt;br /&gt;
        सिग्मन्ड फ्रॉयड ने मनुष्य के मनोविज्ञान पर गहन अध्ययन किया है और मनोविश्लेषण के प्रत्येक आयाम पर लिखा है। फ्रॉयड के विचार से मनुष्य के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण काम वासना है। उनका कहना है कि सॅक्स ही जीवन में सब कुछ करवाता है और मनुष्य के जीवन की धुरी काम वासना पर ही टिकी है। लेकिन जॉन ड्युई का कहना कुछ और ही है। अमरीका के मशहूर दार्शनिक और शिक्षा विद् जॉन ड्युई (Jhon Dewey 1869-1952) ने छात्रों को लिखाई-पढ़ाई वाली शिक्षा के स्थान पर अनुप्रयुक्त शिक्षा या व्यावहारिक शिक्षा पर नये और प्रभावशाली प्रयोग किए और इसी पर ज़ोर दिया ख़ैर... वे कहते हैं कि 'the deepest urge in human nature is “the desire to be important.”'&lt;br /&gt;
अर्थात मनुष्य की सर्वोपरि इच्छा है 'महत्त्वपूर्ण बनना'। जॉन ड्युई का मानना है कि महत्त्वपूर्ण बनने की चाह मनुष्य को कुछ भी करवाने में सक्षम है। अब अधिकतर मनोवैज्ञानिक जॉन ड्युई से ही सहमत हैं फ्रॉयड से नहीं।&lt;br /&gt;
        बात तो जॉन ड्युई ने सही कही है क्योंकि महत्त्वपूर्ण बनने के लिए मनुष्य- बड़े से बड़ा त्याग,  हिंसा,  युद्ध, अपराध,  नरसंहार,  लालच,  पाप,  पुण्य आदि कुछ भी कर सकता है। यदि मनुष्य में यह इच्छा न होती तो अनेक युद्ध और अपराध न हुए होते। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जिनमें यदि राजा बनकर महत्त्व न मिला तो सन्न्यासी बनने तक का ज़िक्र आता है।&lt;br /&gt;
        महत्त्व प्राप्ति की इच्छा और सफल होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। एक सफल जीवन का अर्थ एक सकारात्मक और समाज के हित का जीवन है जिसमें अपना हित भी निहित हो। महत्त्वपूर्ण होने की जहाँ तक बात है तो कोई भी किसी तरह भी हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A5%81:%E0%A4%96_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1584</id>
		<title>उसके सुख का दु:ख -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T16:41:36Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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        एक गांव में एक ज़मींदार रहता था। ज़मींदार को अपनी हवेली की छत पर बैठ कर हुक़्क़ा पीने की आदत थी। शाम के समय मूढ़े पर  बैठकर जब वो हुक़्क़ा पी रहा होता तो उसका कारिंदा उसके पैर दबाता रहता। ज़मींदार की मूछें बड़ी-बड़ी थीं। हुक़्क़ा पीते समय मूछों पर लगातार ताव देते रहना ज़मींदार की आदत थी। उसकी हवेली के सामने एक व्यापारी सेठ भी रहता था। ज़मींदार की हवेली तीन मंज़िल की थी और सेठ की दो मंज़िल की। सेठ ने भी अपनी हवेली तीन मंज़िल की करवा ली। ज़मींदार के सामने वाली हवेली की छत पर अब सेठ भी ठीक उसी तरह बैठने लगा जैसे ज़मींदार बैठता था और उसने ज़मींदार से भी लम्बी मूछें बढ़ा लीं और मूढ़े पर बैठ कर मूछों को ताव देने लगा। दोनों हवेलियों की छत इतनी क़रीब हो गयी थी कि आराम से आपस में बातें की जा सकती थीं। ज़मींदार ने सेठ से कहा -&lt;br /&gt;
&amp;quot;सेठ! तूने अपनी हवेली की छत हमारे बराबर ऊँची कर ली जो कि ग़लत बात है, तुझे हमारी बराबरी नहीं करनी चाहिए, फिर तूने मूछें बढ़ा ली और अब तू हमारे सामने बैठा मूछों पर ताव दे रहा है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरा मकान, मेरी छ्त और मेरी मूछें ... आपको क्या परेशानी है सरकार ?&amp;quot; सेठ ने कहा ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छा ! इतनी हिम्मत ? अगर मर्द का बच्चा है तो अपने मकान से निकलकर बाहर आ। मैं भी आता हूँ और अपनी तलवार से तेरी गर्दन उड़ाता हूँ।&amp;quot; ज़मींदार गुस्से से बोला।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सरकार आप कैसी बात कर रहे हैं! इस तरह से गली मौहल्ले की लड़ाई क्या आपको शोभा  देती है? क़ायदे की बात तो ये है कि कोई तारीख़ तय करके मेरे और आपके बीच मुक़ाबला हो जाए। जो जीतेगा उसकी मूँछ रहेंगी जो हारेगा उसकी मूँछ साफ़, बोलिए क्या कहते हैं ?  सेठ ने ज़मींदार से कहा । &lt;br /&gt;
&amp;quot;बात तो तू ठीक कह रहा है सेठ! तू ही बता कब का रखेगा मुकाबला।&amp;quot; ज़मींदार ने कहा । &lt;br /&gt;
सेठ ने कुछ सोच कर जवाब दिया- &amp;quot; देखिये सरकार! इस समय बरसात का मौसम है। गाँव में चारों तरफ़ कीचड़ हो रही है। बरसात निकलने के बाद  की तारीख़  तय कर लेते हैं। आज से ठीक तीन महीने बाद हमारे आपके बीच में मुकाबला होगा, जो हारेगा उसकी मूँछें साफ़ हो जाएंगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तीन महीने बाद क्यों ? अभी क्यों नहीं&amp;quot; ज़मींदार ने कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सरकार आप तो बड़े आदमीं हैं, मुझे तो लड़ाई की तैयारी करने में समय लगेगा।&amp;quot; सेठ ने कहा। &amp;quot;हम व्यापारी लोग हैं, हम लड़ाई लड़ना क्या जानें ? वो तो मूँछों को बचाने के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है। इसलिए कम से कम तीन महीने का समय तो मुझे चाहिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ज़मींदार ने भी हामी भर ली।&lt;br /&gt;
अब क्या था, दोनों तरफ़ से लड़ाई की तैयारियाँ शुरू हो गयीं। इस गाँव तो क्या आसपास के गाँवों में भी यह ख़बर फैल गयी। सेठ जी अपनी छ्त पर बैठकर अपने मुनीम को रोज़ाना का हिसाब लिखवाते- &amp;quot;मुनीम जी! बनारस से दो गाड़ी लाठियाँ मँगाई थीं वो कब तक आएँगी ?... और पच्चीस आदमियों के रुकने, खाने-पीने का इंतज़ाम करवाया था, वो हुआ कि नहीं...और हाँ, मुनीम जी, अब तक कुल कितने आदमियों को ख़बर हो चुकी है?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सेठ जी, अभी तक दो सौ आदमी तैयार हो गये हैं और आस पास के गाँवों में रुकवा दिये गये हैं, असल में उनको यहाँ लाना तो ठीक नहीं है ना, ज़मींदार को पता चल गया तो दुगनी तैयारी करके हमें हरवा देगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        ज़मींदार छ्त पर छिपकर उन दोनों की बातें सुन रहा था। उसने तुरंत चार सौ आदमी तैयार करने के लिए कह दिया। दोनों तरफ़ तैयारियाँ ज़ोरों से चल रहीं थीं। सेठ अपने मुनीम को रोज़ाना छ्त पर बैठकर हिसाब लिखवाता था। आदमियों की फौज बढ़ती जा रही थी। लाठी, तमंचे, तलवार, भाले, बंदूक और हथगोले तक सेठ की सूची में आ चुके थे और ज़मींदार की सूची में उनकी संख्या दोगुनी हो चुकी थी। ज़मींदार के पास पुरानी हवेली तो थी लेकिन आमदनी के नाम पर कुछ खेत ही था। कुल मिलाकर कहानी ये थी कि ज़मींदार नाम का ही ज़मींदार था। इस लड़ाई के चक्कर में ज़मींदार की हवेली और खेत दोनों गिरवी रख गये। &lt;br /&gt;
        लड़ाई का दिन भी आ पहुँचा। ज़मींदार अपनी फ़ौज को लेकर मैदान में जा पहुँचा। तरह-तरह के हथियार लिए, हज़ारों आदमियों की फ़ौज ज़मींदार के पक्ष में नारे लगा रही, लेकिन सेठ का कहीं पता नहीं था। काफ़ी देर के इंतज़ार करने के बाद सेठ, अपने मुनीम के साथ आया और बोला-&lt;br /&gt;
&amp;quot;बहुत बड़ी ग़लती हो गई सरकार ! मेरी औक़ात नहीं है आपसे लड़ने की... कहाँ आप और कहाँ मैं... सिर्फ़ मूछों की ही तो लड़ाई थी... इनको तो मैं अभी मुंडवा कर आपके चरणों में डाले देता हूँ... चलो मुनीम जी ! जल्दी मेरी मूछें साफ़ कर दो...।&amp;quot; इतना कहते ही मुनीम ने सेठ की मूछें साफ़ कर दीं। ज़मींदार की सेना ने ज़मींदार की जीत के नारे लगाने शुरू कर दिये। ज़मींदार की जीत के नारे लगाने वालों में सबसे आगे सेठ था।&lt;br /&gt;
        ज़मींदार की समझ में आ चुका था कि सेठ ने कोई तैयारी नहीं कि थी, सिर्फ़ झूठमूठ को मुनीम को खर्चा लिखवाता रहता था। दो तीन साल में ज़मींदार की हवेली बिक गई और सेठ ने ही ख़रीद ली, साथ ही ज़मींदार को भी अपने यहाँ नौकरी दे दी।  सेठ की मूछें फिर उग आईं और अपनी हवेली की छत पर बैठकर वो अपनी मूछों को ताव देता रहता था और वो ज़मींदार, जो अब उसका  नौकर बन चुका था, उसे देखता रहता था।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=ईर्ष्या के बारे में सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि ईर्ष्या 'की' नहीं जाती ईर्ष्या 'हो' जाती है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता जो सोच समझकर ईर्ष्या कर पाये। ईर्ष्या  मानव के सहज स्वभाव के मूल में निहित है। यह प्रकृति की देन है। इसी तरह ईर्ष्या सामाजिक शिक्षा या संस्था नहीं है, जिसके लिए किसी को प्रशिक्षित किया जा सके।|विचारक=}} &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        आइए वापस लौट आएँ और ये सोचें कि हम कहीं दूसरे के सुख से दुखी तो नहीं होते... जैसे कि अपने पड़ोसी का सुख या अपने किसी पहचान वाले का सुख हमें परेशान तो नहीं करता...? &lt;br /&gt;
निश्चित रूप से कर सकता है। तो इसका इलाज क्या है ? कैसे हमारा स्वभाव ऐसा हो सकता है कि हम ईर्ष्या न करें और दूसरों के सुख से हमारी की गयी ईर्ष्या हमारे सुख को दुख में ना बदल दे।&lt;br /&gt;
        ईर्ष्या हमेशा से उपदेशकों का प्रिय विषय रहा है, जैसे- काम, क्रोध, मद, लोभ आदि। विशेषकर धार्मिक उपदेशक इस तरह के बड़े बड़े चित्र अपने अपने धार्मिक स्थानों पर दीवारों पर सजाते हैं। बड़े बड़े चार्ट, कलैंण्डर बाज़ार में बिकते रहे हैं जिनमें मनुष्य के उक्त सभी आचरणों को पाप की संज्ञा दी जाती है। निश्चित ही पापियों की अपने अपने धर्मों के नर्क में स्वत: ही एडवांस बुकिंग हो जाती है। उपदेशों का हमारे ऊपर कितना असर होता है इस बात का पता इससे चलता है कि पीढ़ी दर पीढ़ी हम उपदेश सुनते चले आ रहे हैं पर उपदेश ख़त्म होने का नाम नहीं लेते। ख़त्म  होना तो बहुत बड़ी बात है एकाध उपदेश कम भी नहीं होता। यदि समाज पर उपदेशों का असर  हुआ होता तो उपदेश अब तक समाप्त हो चुके होते और उपदेशक अपने मंचों को छोड़कर किसी प्राइमरी स्कूल में हैडमास्टरी कर रहे होते।  &lt;br /&gt;
        ईर्ष्या के बारे में सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि ईर्ष्या 'की' नहीं जाती ईर्ष्या 'हो' जाती है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता जो सोच समझकर ईर्ष्या कर पाये। ईर्ष्या  मानव के सहज स्वभाव के मूल में निहित है। यह प्रकृति की देन है। इसी तरह ईर्ष्या सामाजिक शिक्षा या संस्था नहीं है, जिसके लिए किसी को प्रशिक्षित किया जा सके। हमने अक्सर सुना और पढ़ा है कि अमुक व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, जबकि यह सम्भव नहीं है। सच्चाई यह होती है कि वह 'ईर्ष्यालु' व्यक्ति इतना बुद्धिमान और अनुभवी नहीं होता कि अपनी ईर्ष्या  को छुपा सके और सहज रूप से प्रदर्शित ना होने दे। &lt;br /&gt;
        जो लोग जितना अधिक यह कहते हैं कि उन्हें किसी से ईर्ष्या नहीं होती वे कितना सत्य बोलते हैं इसका पता तब चलता है जब उनका आचरण कहीं ना कहीं उनकी सावधानी से छुपायी गयी उनकी ईर्ष्या की भावना को प्रकट कर देता है। कोई व्यक्ति शिक्षित है या अशिक्षित इस बात से ईर्ष्या के स्वभाव पर कोई असर नहीं पड़ता। समान कार्यक्षेत्र के लोग आपस में सहज ही ईर्ष्या  करने लगते हैं। जो कथावाचक और उपदेशक संत ज्ञान और वैराग्य के महाकाव्य गाते रहते हैं, उनकी भी ईर्ष्यालु प्रवृति जब छुपाये नहीं छुपती तब हमको अत्यधिक आश्चर्य होता है जबकि यह आश्चर्य का विषय ही नहीं है। &lt;br /&gt;
        स्कूलों से लेकर बड़ी बड़ी कम्पनियों में स्पर्धा की भावना को बढ़ावा दिया जाता है। माता पिता अपने बच्चों को परीक्षा में अधिक अंक लाने के लिए उन तरीक़ों को अपनाने के लिए भी कहते हैं जो कि बच्चे की वास्तविक और स्वाभाविक शिक्षा का अंग नहीं हैं। इसी तरह कम्पनियों में अपने कर्मचारियों में स्वस्थ स्पर्धा से कहीं हटकर गलाकाट ईर्ष्या पैदा की जाती है जो आगे चलकर स्वयं जीतने की इच्छा को बदलकर दूसरे को हराने की इच्छा में अपना द्वेषपूर्ण रूप ले लेती है। &lt;br /&gt;
        आख़िर इस ईर्ष्या के असली मायने क्या हैं? यदि समाज के विभिन्न स्तरों पर देखें तो ये ईर्ष्या किसी के लिए प्रेरणा भी बन जाती है और उसकी सफलता का राज़ भी। तो फिर ईर्ष्या को अच्छा माना जाए या बुरा? निश्चित रूप से ईर्ष्या को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है। एक ईर्ष्या वो है जिसका परिणाम नकारात्मक होता है और दूसरी निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम सामने लाती है जिसे हम 'स्वस्थ स्पर्धा की भावना' भी कहते है। स्पर्धा की भावना हमारी प्रगति के लिए एक अनिवार्य ऊर्जा है।&lt;br /&gt;
        अब सवाल ये उठता है कि ईर्ष्या करने से कैसे बचा जाए तो उसका एक ही उपाय है कि हम जैसे ही ख़ुद को किसी से ईर्ष्या  करते हुए पायें तो हमें ख़ुद पर हँस लेना चाहिए और ईर्ष्या को मनुष्य का सहज स्वभाव मानते हुए इसे सरलता से आने और चले जाने देना चाहिए। सीधी सी बात है कि ईर्ष्या को हम आने से तो नहीं रोक सकते लेकिन इसका उपहास करके इसे अपने मन से जाने को मजबूर अवश्य कर सकते हैं।   &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;ग़रीबों में अगर ईर्ष्या और वैर है तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए। ऐसी ईर्ष्या और वैर को मैं क्षम्य समझता हूँ। हमारे मुँह की रोटी कोई छीन ले तो उसके गले में उँगली डालकर निकालना हमारा धर्म हो जाता है। अगर हम छोड़ दें, तो देवता हैं। बड़े आदमियों की ईर्ष्या और वैर केवल आनंद के लिए हैं।&amp;quot; - प्रेमचंद&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ईर्ष्या का दु:ख प्रा:य: निष्फल ही जाता है। अधिकतर तो जिस बात की ईर्ष्या होती है, वह ऐसी बात होगी जिस पर हमारा वश नहीं होता।&amp;quot; - रामचंद्र शुक्ल&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
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==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0_%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A5%81%E0%A4%9F%E0%A4%AC%E0%A5%89%E0%A4%B2_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1583</id>
		<title>चौकोर फ़ुटबॉल -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T16:38:13Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;चौकोर फ़ुटबॉल&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Football-01.jpg|250px|right]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पुराने ज़माने की बात है, एक गाँव से होकर एक व्यापारी सेठ की माल असबाब से लदी बैलगाड़ी गुज़र रही थी। रास्ते में बरसात के कारण गहरा गड्ढ़ा था जिसमें गाड़ी फंस गई। चार-चार आदमियों की काफ़ी कोशिश के बाद भी गाड़ी निकाली न जा सकी। पास ही एक दुकान के पट्टे पर छोटे पहलवान भी बैठा था और यह सब देख रहा था। दुकानदार ने सेठ जी से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;सेठ जी आप छोटे पहलवान से अगर कह दें तो आपकी गाड़ी पार निकल जाएगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
सेठ जी ने छोटे पहलवान से गाड़ी निकालने कहा। पहलवान ने चारों लोगों को हटा दिया और अकेले ही कंधे के सहारे से बड़े आसानी से गाड़ी को गड्ढ़े से निकाल दिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;भई ये तो कमाल हो गया... पहलवान तो बड़े ताक़तवर हैं।... आप करते क्या हैं पहलवान जी ?&amp;quot; सेठ जी ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;अजी करते तो कुछ नहीं हैं... आजकल बिल्कुल ख़ाली हैं... बहुत भले और शरीफ़ आदमी हैं ... लाठी चलाने में तो इतने माहिर हैं कि बीस-बीस आदमी भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते &amp;quot;&lt;br /&gt;
दुकानदार ने पहलवान की तरफ़ से जवाब दिया। पहलवान चुपचाप वापस वहीं जाकर बैठ गया जहाँ पहले बैठा था और चेहरे पर लापरवाही के भाव लाकर बातों को अनसुनी जैसी करने लगा।&lt;br /&gt;
अब तो सेठ जी की दिलचस्पी छोटे पहलवान में और बढ़ गई-&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं शहरों और गाँवो में अपने व्यापार के कारण घूमता रहता हूँ... अक्सर रात में भी सफ़र करना पड़ता है… अगर ये  पहलवान सफ़र में मेरे साथ रहेगा तो चोर-डाकुओं का ख़तरा नहीं रहेगा&amp;quot; सेठ ने मन ही मन सोचा और पहलवान को अपने साथ चलने को राज़ी कर लिया।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=तीन तरह के व्यक्ति होते हैं। पहले वे जो ज़रूरत को देखते हुए बिना कहे ही काम करते हैं, दूसरे वे जो कहने से काम कर देते हैं और तीसरे वे जो कहने से भी काम नहीं करते बल्कि उनको किसी परिस्थिति में फँसाकर ही काम 'कराया' जा सकता है। ये दुनिया जितनी भी तरक़्क़ी कर रही है वह पहली श्रेणी वाले लोगों के कारण कर रही है और दुनिया में व्यवस्था संभालने का ज़िम्मा उनका है जो दूसरी श्रेणी के लोग हैं, अब रह जाते हैं तीसरी श्रेणी के लोग... तो आप ख़ुद ही सोच सकते हैं कि वे किस श्रेणी में आते हैं। ये लोग होते हैं चौकोर फ़ुटबॉल।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        छोटे पहलवान की तो मौज आ गई। अच्छा खाना-पीना मिलने लगा तो पहलवान की सेहत और अच्छी हो गई। सेठ भी बेखटके अपनी व्यापारिक यात्राएँ करने लगा। एक दिन शाम के झुटपुटे में सेठ की गाड़ी को कुछ लुटेरों ने घेर लिया और गाड़ी को लूट लिया। सेठ ने देखा कि इस पूरे हादसे में पहलवान कुछ नहीं बोला और एक तरफ़ जा कर बैठ गया। जब सेठ का सारा माल लूटकर और सेठ जी की अच्छी पिटाई करने के बाद वहाँ से चलने लगे तो सेठ ने लुटेरों को रोका और कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;भाइयों ! तुमने मुझे लूट  लिया और  पिटाई भी की लेकिन मैं तुमको ये हीरे की अँगूठी देना चाहता हूँ जो मैंने छुपा के रखी हुई थी और तुम लोगों की निगाह में नहीं आई। लेकिन इसके बदले में, मैं तुमसे कुछ चाहता हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या ?&amp;quot; लुटेरों के मुखिया ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;वो जो पहलवान बैठा है न पेड़ के नीचे उसमें हल्के से सिर्फ़ एक लाठी मार दो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
लुटेरों के मुखिया ने जैसे ही छोटे पहलवान को मारने के लिए लाठी उठाई, पहलवान ने लाठी छीनकर जो दनादन लाठी चलाई तो सारे लुटेरे ढेर कर दिए। सेठ जी का सारा सामान वापस मिल गया।&lt;br /&gt;
        अपने घर वापस लौटकर सेठ जी ने छोटे पहलवान से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;पहलवान ये लो अपने हिसाब के पैसे... अब तुम अपने घर जाओ... मैं तुम्हें नहीं रख सकता... कारण ये है कि &lt;br /&gt;
पहले तो मैं पिटूँ... फिर लुटूँ... फिर एक हीरे की अँगूठी दूँ...फिर तुमको पिटवाऊँ... तब कहीं जाकर तुमको होश आएगा और तुम मुझे बचाओगे... तो भैया तुम अपने घर और हम अपने घर भले...। &lt;br /&gt;
चलिए वापस चलते हैं-&lt;br /&gt;
        तीन तरह के व्यक्ति होते हैं। पहले वे जो ज़रूरत को देखते हुए बिना कहे ही काम करते हैं, दूसरे वे जो कहने से काम कर देते हैं और तीसरे वे जो कहने से भी काम नहीं करते बल्कि उनको किसी परिस्थिति में फँसाकर ही काम 'कराया' जा सकता है। ये दुनिया जितनी भी तरक़्क़ी कर रही है वह पहली श्रेणी वाले लोगों के कारण कर रही है और दुनिया में व्यवस्था संभालने का ज़िम्मा उनका है जो दूसरी श्रेणी के लोग हैं, अब रह जाते हैं तीसरी श्रेणी के लोग... तो आप ख़ुद ही सोच सकते हैं कि वे किस श्रेणी में आते हैं। ये लोग होते हैं चौकोर फ़ुटबॉल। जितना लात मारोगे उतना ही सरकेगी; गोल फ़ुटबॉल की तरह नहीं कि एक किक लगाते ही ये जा-वो जा...   &lt;br /&gt;
        सार्वजनिक क्षेत्र में किस तरह से काम होता है यह तो आप जानते ही हैं। डाकखाना, बिजलीघर, सरकारी अस्पताल आदि में चले जायें तो लगता है जैसे दुनिया रुक सी गई है। निजी क्षेत्र में भी जिन्होंने अनुभव किए हैं वे काफ़ी दिलचस्प हैं। किसी भी प्रतिष्ठान में 10 में से 2 व्यक्ति ही कर्मठ होते हैं। ये दो व्यक्ति वे होते हैं जिनके बल पर कम्पनियाँ प्रगति करती हैं, विकास करती हैं। &lt;br /&gt;
        काम के बारे में कुछ मशहूर हस्तियों के उद्धरण- &lt;br /&gt;
# ऐसा काम चुनो जिसे तुम प्यार करते हो, इसके बाद तुम्हें ज़िंदगी भर 'काम' करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी-  कंफ़्यूशस (क्योंकि यह काम तुम्हारा प्रेम होगा और प्रेम कोई 'कार्य' नहीं होता)&lt;br /&gt;
# किसी ऐसे आदमी को नौकरी मत दो जो अपना काम पैसे के लिए करता है, बल्कि उसे नौकरी दो जो अपने काम से मुहब्बत करता है- हेनरी डेविड थोरो&lt;br /&gt;
# साथ जुड़ना एक शुरूआत है; साथ रहना प्रगति है और साथ काम करना ही सफलता है- हेनरी फ़ोर्ड &lt;br /&gt;
        जब एक बुद्धिमान और होनहार व्यक्ति किसी प्रतिष्ठान में नौकरी करता है तो उसका काम करने का तरीक़ा सामान्य व्यक्तियों से अलग होता है। वह जानता है कि यदि उसे विकास करना है तो कम्पनी की प्रगति भी जरूरी है और वह बिना भावुकता के सोची समझी रणनीति के साथ अपने काम को ज़िम्मेदारी से करता है। सीधी सी बात है अगर हमें महत्त्वपूर्ण बनना है तो हमें उस प्रतिष्ठान की अनिवार्य ज़रूरत के रूप में खुद को साबित करना होगा। यहाँ पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोई भी प्रतिष्ठान किसी कर्मचारी को भावुकता के धरातल पर नहीं रखता इसलिए कर्मचारियों का भी प्रतिष्ठान के प्रति भावुक प्रेम निरर्थक ही है। &lt;br /&gt;
        150 करोड़ की आबादी को छूने को तैयार हमारे देश में कई पार्टियों की सरकारें बनीं, कभी स्पष्ट बहुमत से तो कभी मिली जुली लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र को अच्छी तरह संभालने में कभी भी, कोई भी सरकार सफल नहीं रही। क्या ये लोकतंत्र की मजबूरी है ? क्या प्रजातांत्रिक ढांचे में चल रहे देश इसी प्रकार की समस्याओं से जूझते रहते हैं ? क्या उत्तर है इन बातों का ? असल में सरकारी नौकरियों की दुनिया ही अलग है जहाँ कर्मठता और अकर्मण्यता में कोई उल्लेखनीय भेद नहीं है। न जाने क्यों सार्वजनिक क्षेत्र में कर्मचारियों के निष्क्रिय और अकर्मण्य होने पर भी किसी प्रकार के गम्भीर दण्ड का प्रावधान नहीं है। इसी कारण सार्वजनिक क्षेत्र निजी क्षेत्र से पिछड़ते जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
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==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
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[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%AA_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1582</id>
		<title>शाप और प्रतिज्ञा -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%AA_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1582"/>
				<updated>2017-05-21T16:36:55Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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        &amp;quot;आपका शाप मुझे तब तक हानि नहीं पहुँचा सकता माते! जब तक कि मैं उसे स्वीकार न कर लूँ। मैं साक्षात्‌ ईश्वर हूँ और आप नश्वर, मृत्युलोक की शरीरधारी स्त्री मात्र, तदैव आपका शाप, द्वापर युग में अवतरित मेरे सोलह अंशों के पूर्णावतार, अर्थात समस्त सोलह कलाओं से युक्त अवतार, 'कृष्ण' को प्रभावित करने में सक्षम नहीं होगा,  फिर भी आप निश्चिंत रहें, मेरी कोई आयोजना ऐसी नहीं जिससे मैं अपनी उपस्थिति को एक माँ से श्रेष्ठ स्थापित करने का प्रयत्न करूँ। इसलिए माते! मैं आपके शाप को विनम्रता से स्वीकार करता हूँ। अब यदुकुल वंश का समूल नाश वैसे ही होना अवश्यंभावी है जैसा आपके शाप में संकल्पित है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Krishn-title.jpg|right|300px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
गांधारी ने अपने सभी पुत्रों के मारे जाने पर कृष्ण को शाप दिया कि उनके कुल-वंश का समूल नाश हो जाएगा और पौराणिक संदर्भ और मान्यताएँ ऐसा ही कहती हैं कि कालांतर में ऐसा ही हुआ।&lt;br /&gt;
        शाप और प्रतिज्ञा के प्रसंग पौराणिक काल में अनेक बार आए हैं। महाभारत ग्रंथ में अनेक प्रतिज्ञाओं के प्रसंग हैं। कोई भी प्रतिज्ञा जब हम करते हैं, तो हम प्रतिज्ञाबद्ध हो जाते हैं। हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है हमारी की गयी प्रतिज्ञा। वरीयता क्रम में हम प्रत्येक इस प्रतिज्ञा से भिन्न तत्त्व के अस्तित्व को महत्त्वहीन कर देते हैं। इस बार हम पौराणिक काल विशेषकर महाभारतकालीन वचनों, प्रतिज्ञाओं, मर्यादाओं और शापों पर विचार करेंगे। प्रतिज्ञा कौन करता है ? और प्रतिज्ञा के क्या वही परिणाम होते हैं जो प्रत्यक्ष में दिखायी देते हैं ? अथवा इन प्रतिज्ञाओं के पीछे छुपे कुछ ऐसे भी परिणाम होते हैं, जो समाज के लिए अत्यंत हानिकारक भी सिद्ध होते हैं।&lt;br /&gt;
        भीष्म प्रतिज्ञा सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसमें गंगापुत्र देवव्रत, आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर एवं सिंहासन का त्याग कर देवव्रत से 'भीष्म' बन जाते हैं। यदि भीष्म ने यह प्रतिज्ञा न की होती तो हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर पुत्र मोह से विवश नेत्रहीन धृतराष्ट्र न बैठता और महाभारत युद्ध के समीकरण बने ही न होते। प्रतिज्ञा करते समय भीष्म ने अपने पिता की अनुचित इच्छा पूर्ति को ही ध्यान में रखा, हस्तिनापुर की जनता के प्रति उत्तरदायित्व को वे भूल गए।&lt;br /&gt;
        भीष्म की केवल पुरुषों से ही युद्ध करने और स्त्रियों पर अस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा भी राज-हित में नहीं थी और जिसका परिणाम हुआ भीष्म की मृत्यु और कौरवों की हार। भीष्म यह क्यों भूल गए कि उनकी एक प्रतिज्ञा यह भी थी कि वे हस्तिनापुर की रक्षा करेंगे। इस हस्तिनापुर के सिंहासन की वफ़ादारी करने में उन्होंने द्रौपदी के भरी सभा में अपमान को भी अनदेखा कर दिया था। जबकि कृष्ण ने अपनी शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा को अपने मित्र अर्जुन की रक्षा हेतु तोड़ दिया। कृष्ण ने अपने उद्देश्य की सफलता में प्रतिज्ञा को बाधक बनते देखा तो उन्होंने प्रतिज्ञा तोड़ दी।&lt;br /&gt;
        द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञा में पुत्र मोह की पराकाष्ठा थी, जो कि अश्वत्थामा के मरने के झूठे समाचार के कारण, उनके अस्त्र त्याग करने से, उनकी मृत्यु का कारण बनी। असल में अपनी प्रतिज्ञाओं को लेकर भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों ही ऊहापोह की स्थिति में थे। द्रोणाचार्य का अश्वथामा की मृत्यु के समाचार मिलते ही युद्धभूमि में अस्त्र त्यागकर ध्यानस्थ हो जाना क्या एक युद्ध का सेनापतित्व करने वाले व्यक्ति के लिए ठीक था, जब कि युद्ध भी महाभारत का हो और प्रतिष्ठा हो हस्तिनापुर की। सरल सी बात है कि यह प्रतिज्ञा स्वार्थपूर्ण थी न कि कर्तव्यपूर्ण।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{बाँयाबक्सा|पाठ=शिशुपाल को मारने में भी कृष्ण ने एक ऐसा संदेश दिया जिससे बहुत बड़ी राजनीतिक रणनीति की शिक्षा मिलती है। शिशुपाल कोई छोटा-मोटा राजा नहीं था जिसे मारना और मारकर शांत बैठ पाना आसान हो। निन्यानवे अपराध क्षमा करना कृष्ण की एक सोची समझी रणनीति थी जिसमें छिपे हुए संदेश को समझना बहुत आवश्यक है।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        इन्हीं प्रतिज्ञाओं के सिलसिले में अर्जुन ने भी एक ऐसी प्रतिज्ञा की जिससे महाभारत युद्ध का परिणाम कौरवों के पक्ष में जा सकता था। अभिमन्यु के अमानवीय वध के उपरांत अर्जुन ने सूर्यास्त से पहले ही जयद्रथ को मारने का संकल्प लिया अन्यथा अपने प्राण त्यागने की प्रतिज्ञा की। पूरा दिन निकल जाने पर भी जब जयद्रथ नहीं मिला तो कृष्ण ने सूर्य को बादलों के पीछे ढक कर रात का आभास करा दिया और अर्जुन की आत्मबलि देखने के लिए जयद्रथ भी आ पहुँचा। कृष्ण ने सूर्य के सामने से बादल हटा दिए और जयद्रथ का वध करके अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। ज़रा सोचिए कि अपनी प्रतिज्ञा न पूरी कर पाने के कारण अर्जुन मारा जाता तो ? महाभारत का परिणाम क्या होता! पुत्र मोह में अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरा समीकरण बदल सकती थी। यह प्रतिज्ञा भी स्वार्थ से वशीभूत थी।&lt;br /&gt;
        &amp;quot;जब तक मैं दु:शासन के लहू से अपने केश नहीं धो लूँगी तब तक अपने केश खुले रखूँगी&amp;quot; यह प्रतिज्ञा द्रौपदी ने की थी और यह उसने किया भी। अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते हुए ही जलाकर मार डाला। इसके उपरांत भी द्रौपदी ने अश्वत्थामा का वध होने से रोका और उसे क्षमा कर दिया। जिन श्रेष्ठ कृत्यों का महाभारत में उल्लेख है उनमें से द्रौपदी की क्षमा को मैं सर्वोपरि मानता हूँ।&lt;br /&gt;
        कर्ण के जन्म का भेद उसे बताने वाली उसकी माँ कुंती कर्ण से महाभारत युद्ध से पहले ही यह वचन ले गयी कि कर्ण अर्जुन के अलावा किसी पाण्डव का वध नहीं करेगा। युद्ध में कर्ण का युधिष्ठिर को बंदी बनाकर फिर जीवित छोड़ देना, कर्ण के लिए अपने वचन को निभाने के लिए भले ही आवश्यक हो लेकिन दुर्योधन के मित्र और कौरवों की सेना का सेनापति होने के नाते कहाँ उचित था ? यदि कर्ण ने उसी समय युधिष्ठिर को मार दिया होता तो महाभारत युद्ध का निर्णय कौरवों के पक्ष में हो जाता क्योंकि युधिष्ठिर ही राजा था और राजा ही यदि मारा जाता तो युद्ध समाप्त हो जाता। युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा (जुआ) की मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना था इसलिए उसने शकुनि का निमंत्रण स्वीकार किया और द्यूत में अपने भाइयों और द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया। द्यूत एक बार नहीं दोबारा फिर हुआ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते हुए ही जलाकर मार डाला। इसके उपरांत भी द्रौपदी ने अश्वत्थामा का वध होने से रोका और उसे क्षमा कर दिया। जिन श्रेष्ठ कृत्यों का महाभारत में उल्लेख है उनमें से द्रौपदी की क्षमा को मैं सर्वोपरि मानता हूँ।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        ये प्रतिज्ञाएँ क्यों होती थीं ? क्या मानसिकता कार्य करती थी इनके पीछे ? क्या ऐसा नहीं लगता कि जब हमें अपने ऊपर किसी कार्य को कर पाने का विश्वास नहीं होता, तभी प्रतिज्ञा की जाती है। यदि महाभारत के प्रसंगों को ही देखें तो पता चलता है कि कृष्ण ने कोई प्रतिज्ञा नहीं की और एक की भी थी तो वह भी भीष्म ने युद्ध में अस्त्र उठवाकर तुड़वा दी थी। सहज रूप से जीवन जीने वाले कृष्ण को किसी प्रतिज्ञा की आवश्यकता थी भी नहीं। यहाँ तक कि कृष्ण ने जो महाभारत में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी वह भी किसी निजी स्वार्थ के चलते नहीं की थी।&lt;br /&gt;
        शिशुपाल को मारने में भी कृष्ण ने एक ऐसा संदेश दिया जिससे बहुत बड़ी राजनीतिक रणनीति की शिक्षा मिलती है। शिशुपाल कोई छोटा-मोटा राजा नहीं था जिसे मारना और मारकर शांत बैठ पाना आसान हो। निन्यानवे अपराध क्षमा करना कृष्ण की एक सोची समझी रणनीति थी जिसमें छिपे हुए संदेश को समझना बहुत आवश्यक है। निन्यानवे अपराधों तक कृष्ण ने शक्ति और समर्थन की प्रतीक्षा की और जब सभी यह चाहने लगे कि अब तो शिशुपाल ने अति कर दी है, तब कृष्ण ने उसे मारा। शिशुपाल के वध को सभी ने सही माना। इसीलिए शिशुपाल वध को मृत्युदण्ड की मान्यता मिली। &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{बाँयाबक्सा|पाठ=शाप देना भी जैसे ख़ुद ही शापित हो जाना है। पौराणिक कथाओं में अनेक उदाहरण ऐसे हैं जब शाप देने वाले को शाप देते ही तुरंत पछतावा हुआ और उसने अपने शाप से मुक्त होने का उपाय भी उसी क्षण बता दिया।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        प्रतिज्ञा, शपथ, वचन आदि सारी बातें मनुष्य के कमज़ोर पक्ष को उजागर करती हैं। कहीं सुना है कि किसी मां को यह प्रतिज्ञा दिलाई जाती हो कि वह अपने बच्चे को अवश्य पालेगी ? ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं होती क्योंकि यह प्रकृति की एक सामान्य प्रक्रिया है। वचनों की प्रक्रिया तो मनुष्य निर्मित नियमों को मानने में लागू होती है, जैसे विवाह संस्था, नौकरी, न्यायप्रक्रिया आदि। हिन्दू विवाह में पति पत्नी द्वारा सात वचन निभाने की प्रक्रिया होती है क्योंकि यह उतना अटूट रिश्ता नहीं है जितना माता और संतान का। इसलिए वचन निबाहने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।&lt;br /&gt;
        वास्तविक स्थिति यह है कि जब हम कहते हैं कि यह मेरा निश्चय है या ऐसा मैंने तय किया है तो हम स्वयं को विश्वास दिला रहे होते हैं कि हम 'यह' कर सकते हैं। ये सारे निश्चय होते हैं- पढ़ने, डाइटिंग, कसरत, आदि जैसे किसी ऐसे कार्य के लिए जो सामान्यत: हमारी रुचि के नहीं है। निश्चय ही असामान्य परिस्थितियों के लिए बनी हैं ये प्रतिज्ञाएँ।&lt;br /&gt;
        शाप देना भी जैसे ख़ुद ही शापित हो जाना है। पौराणिक कथाओं में अनेक उदाहरण ऐसे हैं जब शाप देने वाले को शाप देते ही तुरंत पछतावा हुआ और उसने अपने शाप से मुक्त होने का उपाय भी उसी क्षण बता दिया। किसी भी कमज़ोर व्यक्ति के आकस्मिक क्रोध की परिणति ही शाप है। शाप देने वाले की मानसिकता भी लगभग वही है जो प्रतिज्ञा करने वाले की। शाप वही देता है जो प्रत्यक्ष रूप से प्रतिशोध लेने में सक्षम नहीं होता। जो सक्षम होगा वह तो तुरंत ही बदला ले लेगा।   &lt;br /&gt;
        संतुलित मनुष्य सहज रूप से जीवन जीता है। प्रतिज्ञा, शाप, वचन, निरर्थक मर्यादा, कोरे आदर्श, आदि एक बुद्धिमान और संतुलित मनुष्य के जीवन में कोई स्थान नहीं रखते। सहजता से जिया जीवन ही श्रेष्ठतम जीवन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%AA_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1581</id>
		<title>शाप और प्रतिज्ञा -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%AA_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1581"/>
				<updated>2017-05-21T15:06:23Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;शाप और प्रतिज्ञा&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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        &amp;quot;आपका शाप मुझे तब तक हानि नहीं पहुँचा सकता माते! जब तक कि मैं उसे स्वीकार न कर लूँ। मैं साक्षात्‌ ईश्वर हूँ और आप नश्वर, मृत्युलोक की शरीरधारी स्त्री मात्र, तदैव आपका शाप, द्वापर युग में अवतरित मेरे सोलह अंशों के पूर्णावतार, अर्थात समस्त सोलह कलाओं से युक्त अवतार, 'कृष्ण' को प्रभावित करने में सक्षम नहीं होगा,  फिर भी आप निश्चिंत रहें, मेरी कोई आयोजना ऐसी नहीं जिससे मैं अपनी उपस्थिति को एक माँ से श्रेष्ठ स्थापित करने का प्रयत्न करूँ। इसलिए माते! मैं आपके शाप को विनम्रता से स्वीकार करता हूँ। अब यदुकुल वंश का समूल नाश वैसे ही होना अवश्यंभावी है जैसा आपके शाप में संकल्पित है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Krishn-title.jpg|right|300px]]&lt;br /&gt;
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गांधारी ने अपने सभी पुत्रों के मारे जाने पर कृष्ण को शाप दिया कि उनके कुल-वंश का समूल नाश हो जाएगा और पौराणिक संदर्भ और मान्यताएँ ऐसा ही कहती हैं कि कालांतर में ऐसा ही हुआ।&lt;br /&gt;
        शाप और प्रतिज्ञा के प्रसंग पौराणिक काल में अनेक बार आए हैं। महाभारत ग्रंथ में अनेक प्रतिज्ञाओं के प्रसंग हैं। कोई भी प्रतिज्ञा जब हम करते हैं, तो हम प्रतिज्ञाबद्ध हो जाते हैं। हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है हमारी की गयी प्रतिज्ञा। वरीयता क्रम में हम प्रत्येक इस प्रतिज्ञा से भिन्न तत्त्व के अस्तित्व को महत्त्वहीन कर देते हैं। इस बार हम पौराणिक काल विशेषकर महाभारतकालीन वचनों, प्रतिज्ञाओं, मर्यादाओं और शापों पर विचार करेंगे। प्रतिज्ञा कौन करता है ? और प्रतिज्ञा के क्या वही परिणाम होते हैं जो प्रत्यक्ष में दिखायी देते हैं ? अथवा इन प्रतिज्ञाओं के पीछे छुपे कुछ ऐसे भी परिणाम होते हैं, जो समाज के लिए अत्यंत हानिकारक भी सिद्ध होते हैं।&lt;br /&gt;
        भीष्म प्रतिज्ञा सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसमें गंगापुत्र देवव्रत, आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर एवं सिंहासन का त्याग कर देवव्रत से 'भीष्म' बन जाते हैं। यदि भीष्म ने यह प्रतिज्ञा न की होती तो हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर पुत्र मोह से विवश नेत्रहीन धृतराष्ट्र न बैठता और महाभारत युद्ध के समीकरण बने ही न होते। प्रतिज्ञा करते समय भीष्म ने अपने पिता की अनुचित इच्छा पूर्ति को ही ध्यान में रखा, हस्तिनापुर की जनता के प्रति उत्तरदायित्व को वे भूल गए।&lt;br /&gt;
        भीष्म की केवल पुरुषों से ही युद्ध करने और स्त्रियों पर अस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा भी राज-हित में नहीं थी और जिसका परिणाम हुआ भीष्म की मृत्यु और कौरवों की हार। भीष्म यह क्यों भूल गए कि उनकी एक प्रतिज्ञा यह भी थी कि वे हस्तिनापुर की रक्षा करेंगे। इस हस्तिनापुर के सिंहासन की वफ़ादारी करने में उन्होंने द्रौपदी के भरी सभा में अपमान को भी अनदेखा कर दिया था। जबकि कृष्ण ने अपनी शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा को अपने मित्र अर्जुन की रक्षा हेतु तोड़ दिया। कृष्ण ने अपने उद्देश्य की सफलता में प्रतिज्ञा को बाधक बनते देखा तो उन्होंने प्रतिज्ञा तोड़ दी।&lt;br /&gt;
        द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञा में पुत्र मोह की पराकाष्ठा थी, जो कि अश्वत्थामा के मरने के झूठे समाचार के कारण, उनके अस्त्र त्याग करने से, उनकी मृत्यु का कारण बनी। असल में अपनी प्रतिज्ञाओं को लेकर भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों ही ऊहापोह की स्थिति में थे। द्रोणाचार्य का अश्वथामा की मृत्यु के समाचार मिलते ही युद्धभूमि में अस्त्र त्यागकर ध्यानस्थ हो जाना क्या एक युद्ध का सेनापतित्व करने वाले व्यक्ति के लिए ठीक था, जब कि युद्ध भी महाभारत का हो और प्रतिष्ठा हो हस्तिनापुर की। सरल सी बात है कि यह प्रतिज्ञा स्वार्थपूर्ण थी न कि कर्तव्यपूर्ण।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{बाँयाबक्सा|पाठ=[[शिशुपाल]] को मारने में भी कृष्ण ने एक ऐसा संदेश दिया जिससे बहुत बड़ी राजनीतिक रणनीति की शिक्षा मिलती है। शिशुपाल कोई छोटा-मोटा राजा नहीं था जिसे मारना और मारकर शांत बैठ पाना आसान हो। निन्यानवे अपराध क्षमा करना कृष्ण की एक सोची समझी रणनीति थी जिसमें छिपे हुए संदेश को समझना बहुत आवश्यक है।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        इन्हीं प्रतिज्ञाओं के सिलसिले में अर्जुन ने भी एक ऐसी प्रतिज्ञा की जिससे महाभारत युद्ध का परिणाम कौरवों के पक्ष में जा सकता था। अभिमन्यु के अमानवीय वध के उपरांत अर्जुन ने सूर्यास्त से पहले ही जयद्रथ को मारने का संकल्प लिया अन्यथा अपने प्राण त्यागने की प्रतिज्ञा की। पूरा दिन निकल जाने पर भी जब जयद्रथ नहीं मिला तो कृष्ण ने सूर्य को बादलों के पीछे ढक कर रात का आभास करा दिया और अर्जुन की आत्मबलि देखने के लिए जयद्रथ भी आ पहुँचा। कृष्ण ने सूर्य के सामने से बादल हटा दिए और जयद्रथ का वध करके अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। ज़रा सोचिए कि अपनी प्रतिज्ञा न पूरी कर पाने के कारण अर्जुन मारा जाता तो ? महाभारत का परिणाम क्या होता! पुत्र मोह में अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरा समीकरण बदल सकती थी। यह प्रतिज्ञा भी स्वार्थ से वशीभूत थी।&lt;br /&gt;
        &amp;quot;जब तक मैं दु:शासन के लहू से अपने केश नहीं धो लूँगी तब तक अपने केश खुले रखूँगी&amp;quot; यह प्रतिज्ञा द्रौपदी ने की थी और यह उसने किया भी। अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते हुए ही जलाकर मार डाला। इसके उपरांत भी द्रौपदी ने अश्वत्थामा का वध होने से रोका और उसे क्षमा कर दिया। जिन श्रेष्ठ कृत्यों का महाभारत में उल्लेख है उनमें से द्रौपदी की क्षमा को मैं सर्वोपरि मानता हूँ।&lt;br /&gt;
        कर्ण के जन्म का भेद उसे बताने वाली उसकी माँ कुंती कर्ण से महाभारत युद्ध से पहले ही यह वचन ले गयी कि कर्ण अर्जुन के अलावा किसी पाण्डव का वध नहीं करेगा। युद्ध में कर्ण का युधिष्ठिर को बंदी बनाकर फिर जीवित छोड़ देना, कर्ण के लिए अपने वचन को निभाने के लिए भले ही आवश्यक हो लेकिन दुर्योधन के मित्र और कौरवों की सेना का सेनापति होने के नाते कहाँ उचित था ? यदि कर्ण ने उसी समय युधिष्ठिर को मार दिया होता तो महाभारत युद्ध का निर्णय कौरवों के पक्ष में हो जाता क्योंकि युधिष्ठिर ही राजा था और राजा ही यदि मारा जाता तो युद्ध समाप्त हो जाता। युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा (जुआ) की मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना था इसलिए उसने शकुनि का निमंत्रण स्वीकार किया और द्यूत में अपने भाइयों और द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया। द्यूत एक बार नहीं दोबारा फिर हुआ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते हुए ही जलाकर मार डाला। इसके उपरांत भी द्रौपदी ने अश्वत्थामा का वध होने से रोका और उसे क्षमा कर दिया। जिन श्रेष्ठ कृत्यों का महाभारत में उल्लेख है उनमें से द्रौपदी की क्षमा को मैं सर्वोपरि मानता हूँ।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        ये प्रतिज्ञाएँ क्यों होती थीं ? क्या मानसिकता कार्य करती थी इनके पीछे ? क्या ऐसा नहीं लगता कि जब हमें अपने ऊपर किसी कार्य को कर पाने का विश्वास नहीं होता, तभी प्रतिज्ञा की जाती है। यदि महाभारत के प्रसंगों को ही देखें तो पता चलता है कि कृष्ण ने कोई प्रतिज्ञा नहीं की और एक की भी थी तो वह भी भीष्म ने युद्ध में अस्त्र उठवाकर तुड़वा दी थी। सहज रूप से जीवन जीने वाले कृष्ण को किसी प्रतिज्ञा की आवश्यकता थी भी नहीं। यहाँ तक कि कृष्ण ने जो महाभारत में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी वह भी किसी निजी स्वार्थ के चलते नहीं की थी।&lt;br /&gt;
        शिशुपाल को मारने में भी कृष्ण ने एक ऐसा संदेश दिया जिससे बहुत बड़ी राजनीतिक रणनीति की शिक्षा मिलती है। शिशुपाल कोई छोटा-मोटा राजा नहीं था जिसे मारना और मारकर शांत बैठ पाना आसान हो। निन्यानवे अपराध क्षमा करना कृष्ण की एक सोची समझी रणनीति थी जिसमें छिपे हुए संदेश को समझना बहुत आवश्यक है। निन्यानवे अपराधों तक कृष्ण ने शक्ति और समर्थन की प्रतीक्षा की और जब सभी यह चाहने लगे कि अब तो शिशुपाल ने अति कर दी है, तब कृष्ण ने उसे मारा। शिशुपाल के वध को सभी ने सही माना। इसीलिए शिशुपाल वध को मृत्युदण्ड की मान्यता मिली। &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{बाँयाबक्सा|पाठ=शाप देना भी जैसे ख़ुद ही शापित हो जाना है। पौराणिक कथाओं में अनेक उदाहरण ऐसे हैं जब शाप देने वाले को शाप देते ही तुरंत पछतावा हुआ और उसने अपने शाप से मुक्त होने का उपाय भी उसी क्षण बता दिया।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        प्रतिज्ञा, शपथ, वचन आदि सारी बातें मनुष्य के कमज़ोर पक्ष को उजागर करती हैं। कहीं सुना है कि किसी मां को यह प्रतिज्ञा दिलाई जाती हो कि वह अपने बच्चे को अवश्य पालेगी ? ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं होती क्योंकि यह प्रकृति की एक सामान्य प्रक्रिया है। वचनों की प्रक्रिया तो मनुष्य निर्मित नियमों को मानने में लागू होती है, जैसे विवाह संस्था, नौकरी, न्यायप्रक्रिया आदि। हिन्दू विवाह में पति पत्नी द्वारा सात वचन निभाने की प्रक्रिया होती है क्योंकि यह उतना अटूट रिश्ता नहीं है जितना माता और संतान का। इसलिए वचन निबाहने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।&lt;br /&gt;
        वास्तविक स्थिति यह है कि जब हम कहते हैं कि यह मेरा निश्चय है या ऐसा मैंने तय किया है तो हम स्वयं को विश्वास दिला रहे होते हैं कि हम 'यह' कर सकते हैं। ये सारे निश्चय होते हैं- पढ़ने, डाइटिंग, कसरत, आदि जैसे किसी ऐसे कार्य के लिए जो सामान्यत: हमारी रुचि के नहीं है। निश्चय ही असामान्य परिस्थितियों के लिए बनी हैं ये प्रतिज्ञाएँ।&lt;br /&gt;
        शाप देना भी जैसे ख़ुद ही शापित हो जाना है। पौराणिक कथाओं में अनेक उदाहरण ऐसे हैं जब शाप देने वाले को शाप देते ही तुरंत पछतावा हुआ और उसने अपने शाप से मुक्त होने का उपाय भी उसी क्षण बता दिया। किसी भी कमज़ोर व्यक्ति के आकस्मिक क्रोध की परिणति ही शाप है। शाप देने वाले की मानसिकता भी लगभग वही है जो प्रतिज्ञा करने वाले की। शाप वही देता है जो प्रत्यक्ष रूप से प्रतिशोध लेने में सक्षम नहीं होता। जो सक्षम होगा वह तो तुरंत ही बदला ले लेगा।   &lt;br /&gt;
        संतुलित मनुष्य सहज रूप से जीवन जीता है। प्रतिज्ञा, शाप, वचन, निरर्थक मर्यादा, कोरे आदर्श, आदि एक बुद्धिमान और संतुलित मनुष्य के जीवन में कोई स्थान नहीं रखते। सहजता से जिया जीवन ही श्रेष्ठतम जीवन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B8%E0%A4%AE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%E0%A4%93%E0%A4%B2%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1580</id>
		<title>मौसम है ओलम्पिकाना -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T14:29:07Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;मौसम है ओलम्पिकाना&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Olympicana.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        ओलम्पिक समिति के सदस्य 'मिस्टर लुट्टनवाला' गाना गुनगुना रहे हैं- &lt;br /&gt;
मौसम है ओलम्पिकाना&lt;br /&gt;
ऐ दिल कहीं से कोई मॅडल 'ना' जीत लाना&lt;br /&gt;
&amp;quot;अजी सुनिए तो सही !  ज़रा इधर आइए...&amp;quot; 'सुनिए जी' से 'सुनती हो' ने कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या हो गया ?&amp;quot; लुट्टनवाला बोले।&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओलम्पिक शुरू होने वाले हैं... आपने कुछ तैयारी भी की है कि पिछली बार की तरह सब सत्यानाश ही करवाएँगे&amp;quot; मिसेज़ लुट्टनवाला ने ताना दिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम तो मुझे कुछ समझती ही नहीं हो ना... अरे! पिछली बार की बात और थी, वो चीन का मामला था... इस बार देखना यूरोप में क्या कमाल करता हूँ... लंदन की बात ही कुछ और  है&amp;quot; लुट्टनवाला ने गर्व से घोषणा की।&lt;br /&gt;
&amp;quot;देखो जी इस बार मैं सिर्फ़ उन्हीं रिश्तेदारों को लंदन ले जाऊँगी जिन्होंने पिंकी की शादी में गोल्ड के गिफ़्ट दिए थे... पिछली बार की तरह नहीं करना है कि जो भी मिला उसी को न्यौता दे दिया कि चल ओलम्पिक में&amp;quot; मिसेज़ लुट्टनवाला बोलीं।&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम हर बार अपने ही रिश्तेदारों को ले जाती हो... जितने ज़्यादा तुम रिश्तेदार ले जाओगी, उतने ही ज़्यादा खिलाड़ी भी तो ले जाने पड़ेंगे... हरेक रिश्तेदार के लिए खिलाड़ी भी तो बढ़ाने पड़ते हैं। अब ज़्यादा खिलाड़ी जाएंगे तो मॅडल भी ज़्यादा आएंगे... मॅडल ज़्यादा आएँगे तो सरकार सोचेगी कि ओलम्पिक में खिलाड़ी मॅडल भी जीत सकते हैं... इससे हमारा तो चौपट ही होना है ना... अभी तो सरकार यह सोचती है कि ओलम्पिक में मॅडल-वॅडल तो मिलने नहीं है, इसलिए खिलाड़ी पर क्या बेकार खर्चा करना। इससे अच्छा तो सरकारी अधिकारी, कोच और मंत्रियों को भेजा जाए... कम से कम दूसरे देशों के कल्चर की जानकारी तो हो जाती है... तुम नहीं समझोगी, ये सरकारी बातें हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हाँ एक बात तो बताना भूल गई कि पूनम की सास की एक सहेली है... उसका दामाद आजकल कुछ कर नहीं रहा है, बड़ा अपसॅट रहता है आजकल... अगर उसे खिलाड़ी बना कर ओलम्पिक में ले चलें तो...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;इतना आसान समझ रखा है तुमने ! ऐसे कैसे किसी को भी खिलाड़ी बना कर ले जाऊँ ? तुम्हें मालूम भी है कि ओलम्पिक में जाने के लिए कितनी मेहनत होती है ?&amp;quot; लुट्टनवाला दहाड़े&lt;br /&gt;
&amp;quot;अब मुझे क्या पता तुम बताओगे तभी तो पता चलेगा... &amp;quot; मिसेज़ लुट्टनवाला ने फुसलाते हुए पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;देखो एक तो खिलाड़ी वो हैं जो दिन-रात प्रॅक्टिस करते हैं। अपनी ट्रेनिंग ख़र्च ख़ुद ही उठाते हैं और मॅडल भी ले ही आते हैं, दूसरे वो हैं जिन्हें हम तैयार करते हैं। हमारे वाले खिलाड़ी ही असली खिलाड़ी हैं जो बेचारे न जाने कितने इंस्ट्रॅक्टरों, कोचों और मंत्रियों के चमचों को सॅट करके हमारे पास आते हैं, तब कहीं जाकर हम उनको 'शपथ' दिलाते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कैसी शपथ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे यही मॅडल जीतने की शपथ... कि मैं सत्यनिष्ठा से शपथ लेता हूँ कि किसी प्रकार का कोई मॅडल नहीं जीतूँगा, सोने चाँदी की चमक देखकर मेरा मन नहीं डोलेगा। मैं ओलम्पिक में अपने देश भारत के लिए नहीं बल्कि भारत-सरकार के बाबुओं, राजकर्मचारियों, खेल-प्रशिक्षकों और मंत्रियों के विश्व-भ्रमण और जेब-भरण के लिए खेलूंगा।...बस यही तो छोटी सी ही शपथ है कोई ज़्यादा लम्बी चौड़ी शपथ नहीं है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छाऽऽऽ !  तो ये है वो शपथ जो सीधे ओलम्पिक में पहुँचा देती है&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे शपथ तो हम दिला देते हैं लेकिन फिर भी कुछ खिलाड़ी नालायक़ निकल जाते हैं... विदेश में जाकर न जाने क्या हो जाता है इनको, कभी-कभी शपथ को भूलकर सोने-चाँदी के मॅडलों पर ध्यान लगा देते हैं। वैसे तो मैं ख़ूब समझाता हूँ कि कितने भी मॅडल जीत लो, बुढ़ापे में मरना तो तुम्हें भूखा ही है... बाद में इन्हीं मॅडल को बेचकर काम चलाते हैं... एक-आध तो डाकू भी बन गया...अब तुम ही बताओ कि कहाँ तक समझाऊँ इन्हें, ये नई जॅनरेशन के लोग नहीं मानते हैं हमारी बात&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;चलिए छोड़िए, लंदन के लिए सामान की पॅकिंग भी तो करनी है... और शॉपिंग की लिस्ट बनानी है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        अब आइए ज़रा ओलम्पिक के हालात भी देखें-&lt;br /&gt;
        आपने अनेक खेल आयोजन ऐसे देखे होंगे जिनमें कुर्सियाँ ख़ाली पड़ी रहती हैं बावजूद इसके कि वह खेल काफ़ी लोकप्रिय होता है। इस बार ओलम्पिक में भी यही हो रहा है। आप जानते हैं इसका कारण क्या है ? इसका कारण है ओलम्पिक समिति द्वारा बाँटे गए मुफ़्त टिकिट। इन टिकिटों को प्राप्त करने वाले लोग बहुत कम ही खेलों को देखने जाते हैं केवल परम्परा के रूप में सम्मानार्थ इन्हें टिकिट दी जाती हैं। यदि आप ऐसे किसी आयोजन का टिकिट ख़रीदना चाहें तो टिकिट खिड़की और इंटरनेट पर टिकिट नहीं मिलेगा बल्कि वहाँ सूचित किया जाएगा कि टिकिट बिक चुके हैं। टी.वी. पर आप देखेंगे कि कुर्सियाँ ख़ाली पड़ी हैं। इस अजीब स्थिति का हल अभी तक आयोजकों को नहीं मिला है। ख़ैर हम ज़रा अपने देश के खेलों और खिलाड़ियों की समस्या पर भी कुछ बात कर लें।&lt;br /&gt;
        हमारे देश में खेल और खिलाड़ियों की उपेक्षा करने की एक पुरानी परंपरा है। इस परंपरा की जड़ में कहीं न कहीं भारत का मौसम और प्रकृति भी है। आइए इस पर चर्चा करें।-&lt;br /&gt;
        खेलों के लिए चाहिए मज़बूत शरीर और मज़बूत शरीर जिन चीज़ों से बनता है उनमें मांसपेशियाँ और हड्डियों की मुख्य भूमिका है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि भारतवासियों की हड्डियाँ उतनी चौड़ी, मज़बूत नहीं हैं जितनी कि यूरोप, अमरीका और अफ़्रीका के निवासियों की मानी जाती हैं। मनुष्य का विकास जब सभ्य-मनुष्य के रूप में हो रहा था तो ठंडे देशों में जन-जीवन कठिन था। भोजन के लिए जानवरों का शिकार करना अनिवार्य था। ये जानवर भी कभी-कभी भारी भरकम होते थे और इनका शिकार करना अकेले के वश की बात नहीं थी। इसके लिए 'योजना' और 'दल' बनाने पड़ते थे, तब कहीं जाकर भालू और मॅमथ जैसे जानवर क़ाबू में आते थे। इस भाग-दौड़ से हड्डियाँ और मांसपेशियां मज़बूत होती गईं, साथ ही शारीरिक बल भी बढ़ता गया। जानवर मारा जाता था और पका या अधपका खाया जाता था। इस भोजन को अधिक समय तक संभाल कर रखना संभव नहीं था तो सामूहिक भोज जैसा आयोजन होता था। इन क्रिया-कलापों से 'टीम-भावना' की पद्धति भी विकसित होने लगी। झगड़े तो तब शुरू हुए जब जानवर पालना शुरू हो गया और जानवरों की स्थिति एक संपत्ति के रुप में हो गई।&lt;br /&gt;
        भारत में शिकार करके ही भोजन प्राप्त करना अनिवार्य नहीं था। अनेक फल, सब्ज़ी और कन्दमूल से भारत की भूमि संपन्न थी। बाद में खेती करना भी यहाँ आसान ही रहा। तरह-तरह की खेती के लिए उपयोगी तीनों मौसम (गर्मी, सर्दी और बरसात) यहाँ उपलब्ध थे। हड़प्पा से प्राप्त, सिंधु सभ्यता के समय के अवशेषों में, जो भाले मिले हैं वे किसी जानवर का शिकार करने के लिए उपयोगी नहीं हैं, जिसका कारण इन भालों का बेहद कमज़ोर होना है। ये भाले मात्र धार्मिक अनुष्ठानों को आयोजित करने में प्रयुक्त होते थे न कि किसी जानवर का शिकार करने में। इन बातों पर ग़ौर करें तो हमें समझ में आता है कि क्यों औसत भारतीयों की क़द-काठी बड़ी नहीं होती। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को यदि शामिल न किया जाय तो भारतीय मनुष्य की औसत ऊँचाई (क़द) एक से दो इंच तक कम हो जाती है। यही स्थिति सीने की नाप की भी है। &lt;br /&gt;
        भारत की टीमें जब खेलती हैं तो बार-बार टीम भावना की कमी की बात उठती है। 'टीम के लिए नहीं अपने लिए खेलने' के आरोप हमारे खिलाड़ियों पर अक्सर लगते रहते हैं। आख़िर करना क्या चाहिए इसे सुधारने के लिए ? इसका मात्र एक उपाय है- स्कूलों और कॉलेजों में अनिवार्य शारीरिक शिक्षा। इस शारीरिक शिक्षा के अंक मूल परीक्षा के अंकों में जोड़े जाएँ। साथ ही कम से कम तीन वर्ष की सैनिक शिक्षा भी अनिवार्य होनी चाहिए। इसके बाद ही विद्यार्थी अपना जीवन प्रारम्भ करे। आजकल जो स्थिति है उसको देखें तो शिक्षण संस्थानों में जो भी छात्र खेलकूद में भाग लेते हैं उन्हें कोई पदक, कप, शील्ड या प्रमाणपत्र पकड़ा दिया जाता है। कितनी कम्पनी ऐसी हैं जो ये पदक और प्रमाणपत्र देखकर नौकरी देती हैं ? कोई देखता भी नहीं है इनकी तरफ़ बल्कि हम ख़ुद ही देखना भूल जाते हैं। 30-40 साल पहले शिक्षण संस्थानों में एन.सी.सी. और स्काउट का प्रशिक्षण हुआ करता था लेकिन तब भी यह अनिवार्य नहीं था अब तो इतना भी नहीं होता। &lt;br /&gt;
        ओलम्पिक में अपनी स्थिति को देखें तो खाशाबा दादासाहेब जाधव को पहला व्यक्तिगत पदक (कांस्य) 1952 में मिला। उसके बाद लिएंडर पेस, कर्णम मल्लेश्वरी, राजवर्धन सिंह राठौर और अभिनव बिन्द्रा का नाम आता है। बिन्द्रा ने स्वर्ण जीता और बाक़ी सबने कांस्य जीते। इनके अलावा भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीते जिसमें मेजर ध्यानचंद जी का महान योगदान था। 1980 के बाद भारतीय हॉकी ओलम्पिक में दिखाई नहीं दी।&lt;br /&gt;
        आज भारत एक महाशक्ति बन चुका है। दुनिया का कोई देश ऐसा नहीं है जिससे संबंध बनाए रखने के लिए भारत बाध्य हो। जबकि अमरीका जैसे देश भी अब भारत से संबंध मधुर रखने की अनिवार्यता को स्वीकार चुके हैं। अब ज़रूरत इस बात की है कि भारत, विज्ञान और खेल के क्षेत्र में भी विश्व भर में अपना लोहा मनवाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%A4_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1579</id>
		<title>शर्मदार की मौत -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T14:24:08Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        न जाने कितनी पुरानी बात है कि आचार्य विद्याधर नाम के एक शिक्षक अपना गुरुकुल नगरों की भीड़-भाड़ से दूर एकांत में चलाते थे। दूर-दूर से अनेक धनाढ्यों और निर्धनों के बच्चे उनके यहाँ शिक्षा लेने आते थे। राज्य के राजा का पुत्र भी उनसे गुरुकुल में ही रहकर शिक्षा ले रहा था। आचार्य किसी छात्र से ग़लती या लापरवाही होने पर उनको मारते-पीटते नहीं थे लेकिन शारीरिक श्रम करने का दण्ड अवश्य देते थे, जैसे खुरपी से क्यारियाँ बनवाना, लम्बी-लम्बी दौड़ लगवाना या आश्रम के लिए भोजन बनवाने और सफाई आदि में सहायता देना। राजा का बेटा भी इस प्रकार के दण्ड का भागी बनता था। कई वर्ष व्यतीत हो जाने के उपरांत छात्रों को अपने परिवार से मिलने की अनुमति दी जाती थी, जिससे कि छात्र अपने परिवारीजनों के साथ भी रह सके। तीन वर्ष के उपरांत राजकुमार यशकीर्ति को भी अपने राजमहल भेज दिया गया। राजमहल में रानी ने अपने पुत्र से उसका हालचाल पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम गुरुकुल में कैसा जीवन बिता रहे हो बेटा ! तुम्हारा मन लग जाता है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;और सब कुछ तो ठीक है माँ, लेकिन मुझे दूसरे छात्रों के अनुपात में चार गुना दंड दिया जाता है। जबकि दूसरे छात्रों में से कोई भी राजकुमार नहीं है। सभी हमारे राज्य की प्रजा ही हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि जैसे ही आचार्य विद्याधर को मेरी किसी भूल का पता चलता है, तो वे मुझे दूसरे छात्रों की अपेक्षा दोगुना, तीन गुना और कभी-कभी चार गुना तक दंड देते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यह सुनकर रानी को क्रोध आ गया और तुरंत आचार्य को गुरुकुल से बुलवाया गया। राजा और रानी एक साथ बैठ कर आचार्य से पूछताछ करने लगे-&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या यह सही बात है आचार्य कि आप राजकुमार को दूसरे छात्रों की अपेक्षा अधिक दंड देते हैं ?&amp;quot; रानी ने आचार्य से पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;जी हाँ! यह सच है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन ऐसा क्यों ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;इसका कारण यह है कि राजकुमार के अलावा जो दूसरे छात्र हैं, वह सभी पढ़ लिख कर जिन ज़िम्मेदारियों को निभायेगें वे सामान्य ज़िम्मेदारियाँ होंगीं और उनके द्वारा हुई भूलों का असर समाज के बहुत छोटे हिस्से पर होगा। इस तरह की भूलों को सुधारने के लिए राज्य में कई अधिकारी नियुक्त हैं। राजकुमार यशकीर्ति बड़े होकर महाराज की जगह लेंगे और हमारे राज्य के महाराजा बनेंगे। हमारे राज्य में सबसे बड़ा पद महाराजा का ही है।&lt;br /&gt;
यदि कोई भूल या लापरवाही महाराजा से होती है तो उसका असर पूरे राज्य पर पड़ेगा। इस तरह की भूल को सुधारने के लिए महाराज से अधिक शक्तिशाली हमारे राज्य में तो कोई नहीं है। फिर उस भूल को कौन सुधारेगा? यही सोचकर मैं राजकुमार की भूलों और लापरवाहियों पर राजकुमार को औरों की अपेक्षा अधिक दंड देता हूँ, जिससे हमारे राज्य को एक योग्य और न्यायप्रिय राजा मिल सके।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप सही कहते हैं आचार्य, आप स्वतंत्र रूप से इच्छानुसार राजकुमार को शिक्षा दीजिए, साथ ही मैं आपको अपने राज्य का मंत्री भी नियुक्त करता हूँ।&amp;quot; राजा ने कहा&lt;br /&gt;
        आचार्य विद्याधर को राज्य का मंत्री नियुक्त कर दिया गया। एक बार दरबार में तीन व्यक्ति अपराधी के रूप में लाये गये। संयोग की बात यह थी कि तीनों ने बिल्कुल एक जैसा ही अपराध किया था। आचार्य ने इस मुक़दमे को बहुत ध्यान से सुना और तीनों अपराधियों को तीन तरह की सज़ा सुनायी। आचार्य विद्याधर ने एक के लिए सज़ा सुनाते हुए कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इसको ले जाओ और चौराहे पर ले जाकर खम्बे से बाँध दो। इसका मुँह काला करके इसे पच्चीस कोड़े मारकर छोड़ दो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दूसरे के लिए कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इसको रात भर जेल में बंद रखो और सुबह छोड़ दो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
और तीसरे से आचार्य ने स्वयं कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाशय, मुझे आप जैसे व्यक्ति से इस तरह का अपराध करने की उम्मीद नहीं थी। अब आप जा सकते हैं।&amp;quot; &lt;br /&gt;
राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने आचार्य से पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आचार्य, आपने एक ही अपराध की तीन सज़ाएँ सुनाई, इसके पीछे क्या कारण है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
विद्याधर ने कहा-&lt;br /&gt;
        &amp;quot;महाराज! इसका उत्तर आपको कल मिल जाएगा। इन तीनों अपराधियों के सम्बंध में पूरा ब्यौरा पता करके मैं आपको कल दे दूँगा। इससे आपको अपने प्रश्न का उत्तर भी मिल जाएगा। अगले दिन आचार्य विद्याधर ने राजा को प्रश्न का उत्तर दिया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज, मैंने उन तीनों अपराधियों के सम्बंध में पता किया है। जिस अपराधी को मुँह काला करके चौराहे पर कोड़े लगवाये गये थे, वह अब भी शराब पीकर जुआ खेल रहा है, उस को अपने अपराध और दंड से किसी प्रकार की कोई शर्मिंदगी नहीं है। दूसरा अपराधी, जिसे एक रात जेल में रखा गया था, उसे सज़ा से इतनी शर्मिंदगी हुई कि वह सदैव के लिए राज्य छोड़कर चला गया। तीसरा अपराधी जिससे मैंने सिर्फ इतना कहा था कि आप जैसे व्यक्ति से मुझे ऐसे अपराध की उम्मीद नहीं थी, उसे इतनी शर्मिंदगी हुई कि उसने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली।&amp;quot; &lt;br /&gt;
राजा ने पूछा- &amp;quot;लेकिन आपको यह कैसे पता चला आचार्य कि तीनों को अलग अलग सज़ा  दी  जानी चाहिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;महाराज! हमारा उद्देश्य अपराध को समाप्त करना है न कि अपराधी को दंडित करना। प्रत्येक मनुष्य की प्रकृति, आचरण, निष्ठा आदि ऐसे गुण हैं जिनसे वह पहचाना जाता है। जब मैंने इन तीनों अपराधियों की दिनचर्या, आचरण, शिक्षा, पृष्ठभूमि आदि को लेकर कुछ प्रश्न किये तो मुझे मालूम हो गया था कि किस व्यक्ति की क्या प्रकृति है और मैंने यही समझ कर उन्हें भिन्न-भिन्न दंड दिये और उन दंडों का असर भी भिन्न-भिन्न ही हुआ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        आइये अब वापस चलते हैं...&lt;br /&gt;
मनुष्य और जानवर में सामान्य रूप से कुछ अंतर माने जाते हैं। वे हैं- &lt;br /&gt;
हँसना, सामान्यत: जानवर हँस नहीं सकते। &lt;br /&gt;
दूसरा अंतर है अँगूठे का इस्तेमाल। जिस तरह मनुष्य अपने अँगूठे और तर्जनी से पॅन-पॅन्सिल पकड़ कर लिखने का काम कर सकता है इस प्रकार कोई जानवर अँगूठे के साथ तर्जनी का इस्तेमाल करके कोई वस्तु नहीं पकड़ सकता। &lt;br /&gt;
तीसरा अंतर है तर्कशक्ति। जानवर अपनी बुद्धि का प्रयोग तार्किक धरातल पर नहीं कर सकते। इसीलिए जानवर को दो प्रकार से ही शिक्षित किया जा सकता है- डरा कर और भोजन के लालच से किंतु मनुष्य के लिए एक तीसरा तरीक़ा भी प्रयोग में लाया गया। वह था प्रेम द्वारा सिखाना। तीसरा याने प्रेम से सीखने वाला तरीक़ा सबसे अधिक सहज और प्रभावशाली होता है। &lt;br /&gt;
        मनुष्य और जानवर में सबसे बड़ा फ़र्क़ यह है कि मनुष्य प्यार की भाषा को समझ कर अपने आचार-व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है और स्वयं को अनुशासित कर सकता है जो कि जानवर नहीं कर सकता। क्या सभी मनुष्य प्यार से सीख लेते हैं ? नहीं ऐसा नहीं है। हरेक मनुष्य ऐसा नहीं कर पाता। इसीलिए नियम और दण्ड विधान बने हैं और सख़्ती से ही लागू किए जाने पर इनका पालन होता है।  &lt;br /&gt;
        जो जितना शर्मदार है उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है। जब पानी का जहाज़ डूबता है तो जहाज़ के कप्तान के ज़िम्मेदारी होती है कि वह सभी यात्रियों को बचाए  यदि वह सभी यात्रियों को न बचा पाये तो उसे जहाज़ के साथ ही डूबना होता है। कप्तान इसीलिए कप्तान होता है कि वह ज़िम्मेदारी वहन करता है। पुराने समय में दो जहाज़ों के डूबने की घटना प्रसिद्ध हैं। एक इंग्लैण्ड का जहाज़ डूबा तो उन्होंने  बूढ़े, बच्चे और स्त्रियों को पहले बचाया और जवान आदमी जहाज़ के साथ डूब गए। इस घटना की पूरे विश्व में प्रशंसा हुई। दूसरी घटना फ्रांस के जहाज़ के डूबने की है जिसमें जवान लोगों ने ख़ुद को बचाया और बूढ़े और स्त्रियों को डूब जाने दिया। इस घटना की पूरे विश्व में निंदा हुई। &lt;br /&gt;
        आज-कल हालात ही कुछ अजब हैं, जिसे देखो वही ज़िम्मेदारी से भाग रहा है। पुराने दिनों को याद करें तो- आंध्र प्रदेश के महबूब नगर की एक रेल दुर्घटना (सन्‌ 1956) में 112 लोग मारे गए तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने इस दुर्घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुए तुरंत इस्तीफ़ा दे दिया लेकिन प्रधान मंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने इसे स्वीकार नहीं किया। दोबारा रेल दुर्घटना तमिलनाडु में हुई तो शास्त्री जी ने फिर त्यागपत्र दे दिया जिसे प्रधान मंत्री ने सदन में यह बताकर स्वीकार कर लिया कि ग़लती शास्त्री जी की नहीं है लेकिन सदन में एक ज़िम्मेदार मंत्री का उदाहरण बनाने के लिए यह इस्तीफ़ा स्वीकार किया जाता है।&lt;br /&gt;
एक और उदाहरण देखें-&lt;br /&gt;
        एक बार वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु जी अपनी खोज का प्रदर्शन कर रहे थे। जिसमें उन्हें साबित करना था कि पेड़-पौधों हमारी तरह ही जीवित हैं। इस प्रदर्शन में उन्हें ज़हर की जगह चीनी पीस कर दे दी गई। बसु ने पौधे पर ज़हर का प्रभाव दिखाने के लिए पौधे को चीरा लगा कर उसमें ज़हर भर दिया। पौधे पर कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने यह कहते हुए उसे खा लिया कि जो ज़हर पौधे पर असर विहीन है वह मुझे भी नहीं मार सकता। उनके विश्वास और अपने किए हुए के प्रति ज़िम्मेदारी के अहसास ने ही उनसे ऐसा करवाया।   &lt;br /&gt;
भारत के पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब कहते हैं कि किसी भी टीम का नेता वह है जो सफलता का श्रेय अपनी टीम को दे और असफलता की ज़िम्मेदारी ख़ुद अपने ऊपर ले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%96_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1578</id>
		<title>मानसून का शंख -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%96_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1578"/>
				<updated>2017-05-21T14:21:43Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;मानसून का शंख&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Shiv-shanker.jpg|right|300px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;आपको कुछ पता भी है कि दुनिया में क्या हो रहा है, अरे! दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी और एक हमारे ये हैं... भोले भंडारी... अरे महाराज समाधि लगाये ही बैठे रहोगे या कुछ मेरी भी सुनोगे ?&amp;quot; कैलास पर्वत पर पार्वती मैया ग़ुस्से से भन्ना रही थीं। शंकर जी ने ध्यान भंग करना ही सही समझा और बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम्हारी ही तो सुनता हूँ भागवान... दूसरे देवता तो चार-चार... छह-छह ब्याह करके बैठे हैं और मैं तो सिर्फ़ तुम्हारी ही माला जपता रहता हूँ... अब हुआ क्या जो नंदी की तरह सींग समेत लड़ रही हो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;मेरे अलावा कोई दूसरी इस कमबख्त नंदी पर बैठ कर घूमने को तैयार भी तो नहीं होगी... बताओ, हद हो गई... भला नंदी भी कोई सवारी हुई... ज़रा किसी दूसरी देवी को बिठा कर तो देखो नंदी पर... लक्ष्मी जी होतीं तो दो दिन में भाग जातीं... वो तो मैं ही हूँ जो तुम्हारे भूत-प्रेतों के साथ निभा रही हूँ।&amp;quot; अब तक साड़ी कमर में खोंसी जा चुकी थी। नंदी की आँखों में उदासी छा गई थी, दोनों कान लटक गए और गर्दन झुक गई... भगवान शिव शंकर इस मामले की नज़ाकत को समझ कर पूरी तरह से आत्मसमर्पण करके बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;चलो ठीक, बेचारे नंदी को क्यों घसीट रही हो... अब बता भी दो,  क्या बात है ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;बात... बात तो कुछ नहीं है !  मैं तो बस इतना चाहती हूँ कि जैसे दूसरे भगवानों का सम्मान होता है, ऐसे ही आपका भी होना चाहिए... मुझसे यह नहीं बर्दाश्त होता कि सब आपको भोलेबाबा-भोलेबाबा कहकर बहकाते रहें... बस कह दिया मैंने... हाँ नईं तो...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आख़िर तुम चाहती क्या हो... ये तो बताओ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;देखो जी ! जब तुम शंख बजाते हो, तभी तो ये इंद्र देवता बारिश करता है... है कि नईं...अरे कभी मना भी कर दिया करो कि भैया ! मैं नहीं बजा रहा शंख... अब आप कान खोल कर सुन लीजिए, बारह साल तक शंख मत बजाना... जब तक मैं नहीं कहूँ, तब तक नहीं... आई समझ में या मुझे भी तांडव करके दिखाना पड़ेगा&amp;quot; पार्वती मैया ने अध्यादेश जारी कर दिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं समझ गया।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या समझ गए ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;यही कि सुबह नारद आया था...&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;तो ?... नारद से क्या मतलब ?... वो तो सिर्फ़ इतना ही बता रहा था कि जो रुतबा दूसरे भगवानों का होता है... वो आपका क्यों नहीं है&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;चलो ठीक है... जैसे तुम कहो... अब मैं बारह साल तक शंख नहीं बजाऊँगा... या फिर जब तुम कहोगी, तब ही बजाऊँगा... अब तो शांत हो जाओ भगवती।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अब लौटें अपने देश में...&lt;br /&gt;
        &amp;quot;सब लोग ध्यान से सुनो... अब बारह साल तक बारिश नहीं होगी... भोलेबाबा याने शंकर भगवान को किसी ने बहका दिया है तो वो शंख नहीं बजाएँगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
गाँव की चौपाल पर, छोटे पहलवान ने ये घोषणा सुनी और अपने घर से हल-बैल लेकर सीधे जा पहुँचा खेत में, और हल चलाने लगा। उधर पार्वती जी को चैन नहीं पड़ रहा था कि देखें तो सही कि पृथ्वी पर हो क्या रहा है ? इसलिए शंकर-पार्वती धरती पर विचरण करने लगे। संयोग से छोटे पहलवान के गाँव पहुँच गए तो देखा कि छोटे तो हल चला रहा है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लगता है बेचारे को पता नहीं है कि 12 साल बरसात नहीं होगी... आइए इसे बता दें...&amp;quot; पार्वती जी ने शंकर जी से कहा&lt;br /&gt;
&amp;quot;रहने दो - रहने दो इसे मत छेड़ो... ये भारत का किसान है... इससे पंगा लेना ठीक नहीं है... तुम नहीं जानती इनको...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं, मैं तो इससे बात करूँगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
इतना कहकर, सामान्य नर-नारी के वेश में दोनों छोटे के पास पहुँचे।&lt;br /&gt;
&amp;quot;बरसात तो बारह वर्ष तक नहीं होगी और तुम हल चला रहे हो ? ऐसा लगता है कि तुमको ये बात मालूम नहीं है !&amp;quot; पार्वती ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुझे पता है कि बारह वर्ष तक बारिश नहीं होगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तो फिर ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अजी, बात ये है बहन जी कि बारह साल बाद बारिश होगी और इन बारह सालों में अगर मैं हल चलाना भूल गया तो ?... वैसे महादेव जी भी बारह साल बाद, शंख बजा पाएँगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है... लेकिन कोई बात नहीं है, किसी और देवी-देवता को दे दी जाएगी शंख बजाने की ज़िम्मेदारी... क्यों बहन जी ठीक है ना... ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
शंकर जी भी खड़े-खड़े सुन रहे थे। पार्वती जी उन्हें एक तरफ़ ले जा कर बोली&lt;br /&gt;
&amp;quot;अजी मैं तो कहती हूँ ज़रा शंख बजा कर देखना तो... मुझे तो लगता है ये किसान सही कह रहा है !&amp;quot;&lt;br /&gt;
महादेव मुस्कुराए और शंख बजा दिया... बस फिर क्या था... झमा-झम बरसात होने लगी।&lt;br /&gt;
        भारत का ही नहीं बल्कि विश्व के प्रत्येक देश का किसान, यदि भगवान नहीं है तो भगवान से कम भी नहीं है। भारत के किसान की परिस्थितियाँ बहुत विषम हैं, जिनके बारे में जानकारी हमें अख़बार, पत्रिका और टीवी पर मिलती रहती है। सामान्यत: किसान का एक बेटा खेत में होता है तो दूसरा सीमाओं पर तैनात होता है, देश की रक्षा के लिए।&lt;br /&gt;
        विश्व का परिदृश्य देखें तो कृषि क्षेत्र में भारत दूसरे स्थान पर है (कुल उत्पाद में)। यदि प्रति हेक्टेयर उत्पादन की बात करें तो हालात बहुत चिंताजनक हैं। किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उत्पादन पर नज़र डालें तो भारत का स्थान लगभग 83-84 वाँ है। इसमें अमरीका 11 वें स्थान पर और जापान 15 वें स्थान पर है। इसे सरल भाषा में कहें तो जितनी भूमि में हम जिस मात्रा में अन्न पैदा कर रहे हैं, उतनी ही भूमि में कुछ देश चार गुणे से अधिक उत्पादन कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
        कृषि क्षेत्रफल के लिए भी हमारी जागरूकता नहीं के बराबर है। देश के कुल क्षेत्रफल का 50% से भी कम कृषि उपयोग में आता है, जो कि प्रतिदिन बढ़ने के बजाय कम होता जा रहा है। इज़राइल ने समुद्री दलदल को सुखा-सुखा कर उसे खेती के योग्य बना लिया है और कई किलोमीटर तक समुद्र में घुस गया है। जबकि हमारे यहाँ उल्टा हो रहा है। हम कृषि योग्य भूमि को कंक्रीट के जंगल में बदल रहे हैं। उपजाऊ भूमि पर बनती अट्टालिकाएँ और सड़कें कृषि के लिए स्पष्ट ख़तरा है। &lt;br /&gt;
        इस 'तथाकथित विकास' के पीछे कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन पर हमारी निगाह नहीं जा पाती, जैसे कि 'इकॉनमिक हिट-मॅन'। वैसे तो हिट-मॅन उनको कहा जाता है जो किसी की जान लेने के कार्य को व्यवसाय की तरह करते हैं और भाड़े पर उपलब्ध होते हैं। लेकिन 'इकॉनमिक हिट-मॅन' उनसे ज़्यादा ख़तरनाक साबित हुए हैं। इकॉनमिक हिट-मॅन सबसे पहले पिछड़े देशों या प्रदेशों के मुख्य व्यक्ति से संपर्क करके उन्हें एक योजनाबद्ध विकास का लालच देते हैं। यह एक ऐसे विकास का प्रारूप होता है जिसमें ऑयल रिफ़ायनरी, बिजली-घर, जल-संसाधन सयंत्र, ऊँची अट्टालिकाओं के 'कॉरपोरेट कॉम्पलॅक्स', शॉपिंग मॉल, ऍक्सप्रॅस वे, फ़्लाईओवर, मॅट्रो, टनल वे, सबवे, अम्युज़मॅन्ट पार्क आदि-आदि एक सुनहरे सपनों जैसी योजनाएँ होती हैं। शहरों का आधुनिकीकरण और नये शहर बनाना इनका मुख्य मुद्दा होता है। &lt;br /&gt;
        इस चकाचौंध से भरे आकर्षक प्रस्ताव को भला तीसरी दुनिया का कौन से विकासशील देश या प्रदेश का मुखिया स्वीकार नहीं करेगा ? विकासशील और पिछड़े देशों और प्रदेशों के विकास के लिए दुनिया में कुछ संस्थाएँ कार्यरत हैं, जैसे कि विश्व बॅन्क, यू.ऍस-एड (USAID) आदि। इसी तरह की संस्थाओं से इन देशों या प्रदेशों को ऋण के रूप में पैसा दिलवाया जाता है और लगभग सभी ठेकों को पूर्व निर्धारित कम्पनियों को दिया जाता है। साथ ही उस देश या प्रदेश के मुखिया को रिश्वत  के रूप में मोटी रक़म दे दी जाती है। किसान की उपजाऊ ज़मीन का अधिगृहण किया जाता है। मुआवज़े के पैसे को किसान ऐश-आराम में उड़ा देते हैं और बेरोज़गार हो जाते हैं।&lt;br /&gt;
        सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि पूरे विश्व में केवल वही देश शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और विकसित हो पाए हैं, जिस देश के किसान समृद्ध, स्वस्थ और पढ़े-लिखे हैं। जैसे- जापान, इज़राइल, नीदरलैण्ड, फ्रांस, जर्मनी आदि।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1577</id>
		<title>कहता है जुगाड़ सारा ज़माना -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T14:16:25Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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        आज 'अंतर-राष्ट्रीय जुगाड़ दिवस' है ! ... और अगर नहीं है, तो होना चाहिए। इसके साथ ही कुछ ऐसा जुगाड़ भी किया जाना चाहिए, जिससे कि एक जुगाड़ मंत्रालय का जुगाड़ हो जाये। जुगाड़ मंत्रालय की ज़रूरत हमारे देश को किसी भी अन्य मंत्रालय से अधिक है... &lt;br /&gt;
        एक बार एक अंग्रेज़ भारत के दौरे पर आ रहा था। वह जिस कम्पनी में काम करता था, उसके बॉस ने उसे समझाया- &lt;br /&gt;
&amp;quot;देखो डेविड ! तुम ताजमहल देखने इंडिया जा रहे हो लेकिन इंडिया की गलियों में इधर-उधर मत घूमना और इन गलियों में कुछ भी खाना-पीना मत। ख़ासतौर से ये मथुरा, आगरा, बनारस... इनकी गलियों में ज़्यादा घूमने-फिरने की और कुछ भी खाने-पीने की ज़रूरत नहीं है, समझे !&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन सर ! बात क्या है, ऐसा क्यों ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;बस बता दिया, बहस करने की ज़रूरत नहीं है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ख़ैर डेविड भारत आया और कुछ दिन यहाँ रहा और वापस लौट गया। वापस लौटकर उसने अपने बॉस के सामने एक पैकेट रखा और उससे कहा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;सर ! ये देखिए, ये एक बहुत बड़ा 'पज़ल' लाया हूँ, मैं आपके लिए।...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओह ! इसका मतलब है तुमने मेरी बात नहीं मानी और तुम गलियों में घूमे ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;यस सर। बहुत अच्छा लगा... खाने की चीज़े तो कमाल थीं...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुमने वहाँ ख़ूब खाया भी होगा ? है ना ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;यस सर!&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ठीक है, तुम इस पैकेट में कोई न कोई खाने की चीज़ ही लाए होगे ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;यस सर !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर ! इसे जलेबी कहते हैं।&amp;quot; डेविड ने एक डिब्बा मेज़ पर रख दिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओ.के. ! और अब तुम ये जानना चाहोगे कि इस जलेबी के अन्दर रस कैसे आया?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;यस सर ! लेकिन आपको कैसे मालूम ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ठहर जाओ। मैं तुम्हें कुछ दिखाता हूँ।&amp;quot; बॉस ने अपने फ़्रिज में से एक समोसा और एक रसगुल्ला निकाल कर मेज़ पर रख दिया और बोला- &lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं पिछले साल इंडिया गया था। वहाँ से मैं ये रसगुल्ला और समोसा लेकर आया। अब तुम मुझे बताओ कि इस रसगुल्ले के अन्दर रस कैसे आया और इस समोसे के अन्दर आलू कैसे आया? अब तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी यही सोचते हुए निकलेगी कि जलेबी में रस कैसे घुसा...मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि इंडिया जा रहे हो तो चुपचाप ताजमहल देखकर वापस आ जाना। लेकिन तुम नहीं माने।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर, मैंने ये इंडिया में भी पूछा था कि ये कैसे होता है? तो उन्होंने एक कोई टेक्नीक का नाम लिया... क्या नाम लिया था...?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;उस टेक्नीक का नाम है 'जुगाड़'... यही है ना ?&amp;quot; बॉस ने बुझे स्वर में कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;यस सर, यस सर ! बिल्कुल ठीक है... लेकिन आप को कैसे मालूम ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे यार ! सब जानते हैं कि इंडिया में जुगाड़ टेक्नीक यूज़ होती है, लेकिन ये टेक्नीक है क्या ? और हम कैसे इसे सीख सकते हैं ? ये पता नहीं चल पा रहा है... इस 'जुगाड़' की वजह से ही हम परेशान हैं। भारत ये जुगाड़ टेक्नोलॉजी, वर्ल्ड में किसी को नहीं देता। जबकि उन्होंने कोई पेटेन्ट भी नहीं करा रखा है और उनका सारा विकास इसी टेक्नोलॉजी पर आधारित होता है। जब भी हम कोई नई टेक्नोलॉजी लाते हैं, वो हमारी टेक्नोलॉजी को इस जुगाड़ से फ़ेल कर देते हैं।&amp;quot; &lt;br /&gt;
फिर डेविड और उसका बॉस हमारी 'जुगाड़ तकनीक' को हासिल करने का जुगाड़ करने के गुन्ताड़े में लग गए... &lt;br /&gt;
आइए अब वापस चलें... &lt;br /&gt;
        'जुगाड़' शब्द की उत्पत्ति के पीछे शब्द है 'युक्ति', जिसका प्रचलित रूप है जुगत और जुगत का क्षेत्रीय रूप है 'जुगाड़' (विशेषकर हरियाणा और पंजाब में)। कभी-कभी मुझे लगता है कि आदिकाल में एक ऋषि हुए होंगे, जिनका नाम था 'जुगाड़ ऋषि'। ये जुगाड़ ऋषि अपनी करामाती बुद्धि से भारत को अपनी तकनीक, एक मन्त्र दे गये हैं 'जुगाड़'। यहाँ तक कि भारतकोश के कार्यालय में भी मैं अक़्सर इस शब्द को सुनता रहता हूँ। कभी पूछता हूँ कि ये प्रोग्रामिंग कैसे की? तो जवाब मिलता है कि 'सर ! ये जुगाड़ से किया है'।&lt;br /&gt;
        जुगाड़ ऋषि का मन्त्र गांव-गांव में अपनाया जाता है। तमाम तरह के जुगाड़ किये जाते थे। खोजें की जाती थीं। बहुत से जुगाड़ अद्भुत होते थे, जो अक्सर गांव में और छोटे शहरों में देखने को मिलते थे लेकिन धीरे-धीरे ये चलन कम होता चला जा रहा है। इसकी आज बहुत ज़रूरत है। अनेक किस्म के जुगाड़ होते थे, उनमें कोई न कोई एक जुगाड़ ऐसा होता था, जो वास्तव में एक वैज्ञानिक खोज के रूप में विकसित हो सकता था।&lt;br /&gt;
        आजकल पढ़ाई का तरीक़ा बदल रहा है। नई पीढ़ी की रुचि विज्ञान और कला में कम है। ज़्यादातर छात्र इस तरह के विषय चुन रहे हैं जो व्यापार से और पैसा कमाने से संबंधित हैं। इसलिए 'जुगाड़' करने वाली प्रतिभा कम हो रही है। असल में जुगाड़ करने के लिए ख़ाली वक़्त भी चाहिए। यह कहावत कि 'ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर' सही नहीं है, इसे होना चाहिए 'ख़ाली दिमाग़ जुगाड़ का घर'। &lt;br /&gt;
        शायद शुरुआती जुगाड़, महात्मा गांधी ने बनाया था। उन्हें एक 'फ़ोर्ड कार' उपहार में मिली। गांधी जी ने कार के आगे बैल लगवा दिए और उसका नाम रख दिया 'ऑक्स-फ़ोर्ड'। इसके बाद तो हरियाणा-पंजाब से प्रसिद्धि प्राप्त करता हुआ 'जुगाड़' लगभग पूरे भारत में चलने लगा।&lt;br /&gt;
जुगाड़ के लिए एक किस्सा और मशहूर है-&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jugad-3.jpg|left|200px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        किसी गाँव की बात है कि अधेड़ उम्र में आकर, छोटे पहलवान की पत्नी स्वर्ग सिधार गई। छोटे पहलवान अकेले रह गए लेकिन बेटे बहू के घर में होने से संतोष कर लिया। एक दिन की बात है शाम के समय छोटे पहलवान खेत से लौटे तो उन्होंने बेटे की बहू से मूँग की दाल बनाने के लिए कहा। बहू ने अपने पति से कहलवा भेजा कि 'अब रात के समय मूँग की दाल कहाँ से आएगी, इसलिए जो कुछ बना है, वही खा लें'।&lt;br /&gt;
पहलवान को बात अखर गई। उन्होंने अपने दोस्त की रिश्तेदारी में से एक ग़रीब विधवा से शादी कर ली। जब कुछ दिन बीत गए तो एक शाम को छोटे पहलवान ने चुपचाप रसोई में जाकर यह देख लिया कि मूँग की दाल बिल्कुल नहीं है। जब रात हो गई तो बाहर चौक में आकर अपने बेटे के साथ बैठ कर चाँदनी रात में गपशप करने लगे। कुछ देर और गुज़र गई तो अपनी पत्नी को आवाज़ देकर बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;अजी सुनती हो ! ज़रा मूँग की दाल खाने का मन कर रहा है... फुलके और मूँग की दाल बना लो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अभी लायी... आप हाथ मुँह धोकर तैयार हो जाइये, बेटे से ज़रा हुक्का तो लगवाइये... अभी लाती हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मुश्किल से आधा घंटा गुजरा होगा, छोटे पहलवान और उनका बेटा देशी घी में छौंकी हुई मूँग की दाल के साथ फुलकों का आनंद ले रहे थे। छोटे पहलवान ने खाना खाकर हुक्का गुड़गुड़ाते हुए अपनी पत्नी से पूछा- &amp;quot;एक बात बताओ ... कि रसोई में तो मूंग की दाल थी ही नहीं, दुकानें भी सब बंद हो चुकीं, आस-पड़ोस वाले भी सब सो चुके, फिर यह मूँग की दाल आयी कहाँ से ? &lt;br /&gt;
श्रीमती जी ने सकुचाते हुए जवाब दिया- &amp;quot;अजी, हमारे यहाँ इसे जुगाड़ कहते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन यह जुगाड़ किया कैसे ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
पत्नी ने हँसकर कहा, &amp;quot;घर में मूँग की दाल की बड़ी रक्खी थीं, मैंने उनको कूटकर पाँच मिनट पानी में भिगो दिया और फिर घी और ज़ीरे का छौंक लगाकर मूँग की दाल बन गयी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        वास्तव में यह सही बात है कि भारत की गृहणी और माँ परिवार को अपनी अद्‌भुत 'जुगाड़ क्षमता' से चलाती है। कुछ साल पहले एक सर्वे में यह रिपोर्ट दी थी कि विषमतम परिस्थितियों में, जिन्होंने कुशल प्रदर्शन किया है, उनमें मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग की भारतीय गृहणियाँ और भारतीय ट्रक ड्राइवर विश्व में श्रेष्ठ स्थान पर हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%A8_%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1576</id>
		<title>विज्ञापन लोक -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T14:11:15Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;विज्ञापन लोक&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vigyapan-lok.png|right|200px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        हमें पता नहीं है कि जीने से पहले और मरने के बाद हमारा क्या होता है ? यह भी कुछ निश्चित पता नहीं है हम किस लोक से आते हैं और किस लोक को जाते हैं, लेकिन इतना अवश्य निश्चित है कि हम जिस लोक में रह रहे हैं,  इसे ‘इहलोक’ कहते थे। आप इस 'थे' से चौंके होंगे ? कारण यह है कि पहले यह 'इहलोक' था और अब यह 'विज्ञापन-लोक' है और आपको 'उपभोक्ता' का चोला पहनकर इस विज्ञापन-लोक में रहना है। विज्ञापन एजेन्सियाँ हमारी चित्रगुप्त हैं और उनके द्वारा लिखा गया जीवन ही हम जीते हैं।&lt;br /&gt;
        जैसे नेताओं को हम वोटर और वकीलों को हम क्लाइंट दिखाई देते हैं, वैसे ही विज्ञापन एजेंसियों और विक्रेता को हम ग्राहक और उपभोक्ता दिखाई देते हैं। हरेक दुकानदार मरने से पहले अपनी औलाद को वसीयत के साथ साथ एक नसीहत भी देकर मरता है-  &lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरे बच्चों हमेशा ध्यान रखना कि मौत और ग्राहक का क्या पता कब आ जाये।&amp;quot; &lt;br /&gt;
जब हम ग्राहक बनकर किसी दुकान पर जाते हैं तो दुकानदार जो हमसे बहुत अच्छा व्यवहार करता है उसका मतलब आप लगा सकते हैं कि वो हमें अपने बाप की नसीहत के हिसाब से हमें 'क्या' समझ रहा होता है।&lt;br /&gt;
ख़ैर... &lt;br /&gt;
        एक उपभोक्ता यूँही उपभोक्ता नहीं बनता, बल्कि उसे पहले ग्राहक बनने का संकल्प करके 'विज्ञापन-लोक' में अपनी जगह बनानी पड़ती है। हज़ारों विज्ञापनों से गुज़र कर, ग्राहक बनते ही लोग उसे उपभोक्ता बनाने का मिशन शुरू कर देते हैं। कितना भी चालाक ग्राहक हो, उसे बेचारा और मासूम उपभोक्ता बनना ही पड़ता है।&lt;br /&gt;
जब आप ग्राहक होते हैं, तब तो आप आदर के पात्र होते हैं, लोग आपको हाथों-हाथ लेते हैं-&lt;br /&gt;
&amp;quot;यस सर ! कॅन आई हॅल्प यू ?&amp;quot; जैसी बातें सुनने को मिलती हैं।&lt;br /&gt;
जब उपभोक्ता बन जाते हैं याने कि आप 'सामान' ख़रीद चुके होते हैं और कोई शिकायत लेकर दुकान पर वापस जाते हैं, तो फिर आपको जो सुनने को मिलता है, वह ये है-&lt;br /&gt;
&amp;quot;एक मिनट भाई... ज़रा ग्राहक को भी तो देख लूँ... आपने हमारी शॉप से ही ली थी क्या ?... ये तो सर्विस सेन्टर पर दिखाइये... अब काम नहीं कर रही तो हम क्या करें, हमारे घर में तो बनती नहीं... गारंटी तो कम्पनी देती है भैया ! कम्पनी में दिखाइए...&amp;quot;&lt;br /&gt;
        क्या हर उपभोक्ता मासूम और बेचारा होता है ? नहीं, कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने इस सच को बदल दिया है कि उपभोक्ता निरा भोंदू ही होता है। इसके लिए कौन-कौन सी पैंतरेबाज़ी से गुज़रना होता है, यह वही बता सकते हैं जिन्होंने कन्ज़्यूमर कोर्ट में अपना अस्थाई निवास बना लिया हो। &lt;br /&gt;
जब इतनी आफ़त है तो उपभोक्ता बनना ही क्यों ? लेकिन नहीं, जब 21वीं सदी में ग़लती से जन्म ले ही लिया है तो फिर उपभोक्ता बनना ही एक ऐसी घटना है, जो हमारे नसीब में हर हाल में बार-बार लगातार घटनी ही है।&lt;br /&gt;
        एक यात्रा पर गया तो फ़्लाइट में सामान गुम हो गया और सोचा कि कुछ ज़रूरत की चीज़ें ख़रीद ली जाएँ...&lt;br /&gt;
&amp;quot;कहाँ जा रहे हो ?&amp;quot; दोस्त ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;ज़रा कुछ चीज़ें ख़रीद लाऊँ, जैसे टूथब्रश, पेस्ट शॅम्पू वग़ैरा...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ठहरो, मैं साथ चलता हूँ। तुम्हारे बस का नहीं है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या मतलब कि मेरे बस का नहीं है ? ये भी कोई ऐसा सामान है, जिसे ख़रीदने के लिए कोई ख़ासियत चाहिए... हुँह ?&amp;quot; मैंने अकड़ कर कहा&lt;br /&gt;
&amp;quot;ऐसा है भैया ! तुम बाज़ार-वाज़ार तो जाते हो नहीं... तुम्हें पता ही नहीं है कि दुनिया में क्या चल रहा है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;वाह ! मैं 'भारतकोश' चला रहा हूँ और मुझे ये नहीं पता कि दुनिया में क्या चल रहा है ?&amp;quot; मैं और ज़्यादा अकड़ गया&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम्हारी मर्ज़ी...&amp;quot;&lt;br /&gt;
        मैं बहुत आत्मविश्वास के साथ पास की दुकान पर पहुँचा और यह सोचने लगा कि किस तरह की मुद्रा और हाव-भाव का प्रदर्शन करूँ कि दुकानदार मुझे एक बहुत अनुभवी ग्राहक मान ले...वो बात अलग है कि असल में असमंजस की हालत ऐसी थी, जैसी कि न्यूटन की पेड़ से सेब टपकने के बाद रही होगी। मैं यह सब सोच ही रहा था कि दुकानदार ने पूछ लिया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;हाँ सर ! क्या चाहिए ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ज़रा एक टूथपेस्ट देना&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कौन सा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कोई भी...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्मॉल या लार्ज&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;छोटा दे दो&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कौन सा फ़्लोराइड वाला या नॉर्मल ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नॉर्मल&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;झाग वाला या नार्मल&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नॉर्मल&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सेन्सटिव दाँतों के लिए या नॉर्मल दाँतों के लिए ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नॉर्मल दाँतों के लिए&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सॉल्ट वाला या नॉर्मल ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नॉर्मल&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;शुगर फ़्री या नॉर्मल ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नॉर्मल&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओ. के.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;एक टूथब्रश भी दे दो&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कौन सा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कोई भी...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कौन सा सॉफ़्ट, मीडियम या हार्ड ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मीडियम&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अनईविन ब्रिसल्स वाला या नॉर्मल ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नॉर्मल&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;विद टंग क्लीनर या नार्मल ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नार्मल&amp;quot;&lt;br /&gt;
मैं उसके सवाल के जवाब बड़ी ही लापरवाही से देने का अभिनय कर रहा था कि कहीं ये राज़ न खुल जाय कि मैंने कभी ऐसी चीज़ों की ख़रीदारी नहीं की। मैंने ख़रीददारी जारी रखते हुए कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;एक शॅम्पू भी देना&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कौन सा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कोई भी...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ड्राई हेयर के लिए या नार्मल&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कौन-कौन से हैं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
इतना कहते ही वो मुस्कुरा गया और बड़े अपनेपन से बोला-&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर! आप कभी बाज़ार नहीं जाते हैं ना... नौकर ही करते होंगे ख़रीददारी... आपके बाल बहुत सॉफ़्ट हैं, आपको मैं अपने हिसाब से ही शॅम्पू देता हूँ...&amp;quot;&lt;br /&gt;
मेरी सारी हेकड़ी हवा हो गई थी। मैंने पलटकर देखा तो मेरे मित्रवर खड़े मुस्कुरा रहे थे।&lt;br /&gt;
&amp;quot;हो गई शॉपिंग चौधरी सा'ब... अब चलें...&amp;quot;&lt;br /&gt;
वापस पहुँचे तो टी.वी पर विज्ञापन चल रहा था...&lt;br /&gt;
'विटामिन ए और के युक्त... प्रोटीन से भरपूर... '&lt;br /&gt;
मैंने समझा, कोई स्वास्थ्य से संबंधित खाने की दवाई है, वो निकला शॅम्पू...&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये तो शॅम्पू का विज्ञापन था ?... ऐसा लगा जैसे कोई स्वास्थ्यवर्धक दवाई है... खाने के लिए... ?&amp;quot; मैंने कहा&lt;br /&gt;
&amp;quot;गंजों के शहर में कंघा और अंधों के शहर में शीशा बेचना ही विज्ञापन का मूल मंत्र है&amp;quot; मित्र ने फ़रमाया&lt;br /&gt;
आइए वापस चलते हैं...&lt;br /&gt;
        एक लडके ने कुछ साल पहले एक मशहूर टूथपेस्ट कंपनी में संपर्क किया और कहा- &amp;quot;यदि आप मुझे मुनाफ़े का उचित प्रतिशत देने को तैयार हैं, तो मैं बिना ख़र्च आपके टूथपेस्ट की बिक्री को 15 से 25 प्रतिशत तक बढ़ा सकता हूँ।&amp;quot; बात तय हो गई और कमीशन का प्रतिशत भी, तब लड़के ने कम्पनी वालों से कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप अपने टूथपेस्ट की ट्यूब के छेद को बड़ा कर दीजिए... बिक्री बढ़ जाएगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
सिर्फ़ इतना ही करने से, उस टूथपेस्ट की बिक्री रातों-रात डेढ़ गुनी बढ़ गई। आज से क़रीब 25 साल पहले टूथपेस्ट की ट्यूब का छेद आज के मुक़ाबले मुश्किल से आधा ही होता था।&lt;br /&gt;
डॉक्टर की क्या राय रहती है इन उत्पादों के संबंध में-&lt;br /&gt;
&amp;quot;डॉक्टर सा'ब ! कौन सा टूथपेस्ट इस्तेमाल करना चाहिए मुझे ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अगर आपके दाँत स्वस्थ हैं, तो जिस किसी टूथपेस्ट का स्वाद आपको पसंद हो, वही इस्तेमाल करें&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;और अगर कुछ गड़बड़ है, तो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
यदि दाँतों में कुछ ख़राबी है, तो डॉक्टर ऐसा टूथपेस्ट लिखते हैं, जो सिर्फ़ दवाई की दुकानों पर ही मिलता है।&lt;br /&gt;
अब ' टूथब्रश'&lt;br /&gt;
&amp;quot;डॉक्टर सा'ब ! कौन सा टूथब्रश इस्तेमाल करना चाहिए मुझे ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जो कि आपको सुविधाजनक लगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अब शॅम्पू&lt;br /&gt;
&amp;quot;डॉक्टर सा'ब ! कौन सा शॅम्पू इस्तेमाल करना चाहिए मुझे ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जिसकी ख़ुश्बू आपको पसंद हो...&amp;quot;&lt;br /&gt;
ये था डॉक्टर का जवाब और यदि आपको बालों से संबंधित कोई समस्या है, तो डॉक्टर आपको ऐसा शॅम्पू या दवाई देगा जो सिर्फ़ दवाई की दुकान पर ही मिलेगी।&lt;br /&gt;
ठीक इसी तरह की बात और भी बहुत से उत्पादों के संबंध में है, जिनके कि हम विज्ञापन देखते-देखते बीच में थोड़ी बहुत फ़िल्म या सीरियल भी देख लेते हैं।&lt;br /&gt;
        सामान्यत: डेली सोप या 'सोप ओपेरा ' (सही है 'सोप ऑप्रा ') आदि ही कहा जाता है, इन विज्ञापनों से 'ग्रसित'  धारावाहिकों को, इनकी शुरुआत तब हुई जब साबुन कम्पनी ने ऐसे नाटकों को प्रायोजित करना शुरू किया। ये रही होगी, क़रीब 1950 के आसपास की बात, जब अमरीका में यह शुरूआत हुई। 'ऑप्रा' शब्द लैटिन भाषा के शब्द 'ऑपस' से बना है, जिसका अर्थ है 'कोई कार्य', विशेषकर संगीत आदि से संबंधित और इस शब्द को संस्कृत शब्द उपाय, उपक्रम या उपासा आदि से भी जोड़ा जा सकता है।&lt;br /&gt;
        साबुन का विज्ञापन तो शुरू-शुरू में एनी बेसेन्ट, रवीन्द्रनाथ टैगोर और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने भी किया। ये विज्ञापन स्वराज को ध्यान में रखते हुए थे और गॉदरेज कम्पनी के साबुन के थे। गुरु रवीन्द्रनाथ ने अख़बार में यह विज्ञापन दिया- &amp;quot;I know of no foreign soap better than Godrej, and I have made it a point to use Godrej soaps.&amp;quot; बाद में अनेक नेताओं विज्ञापन दिए, जैसे जयप्रकाश नारायण ने 'नीम टूथपेस्ट' की वकालत की, तो टी.एन. शेषन ने 'सफल' की सब्ज़ियों की... &lt;br /&gt;
ख़ैर...&lt;br /&gt;
        बाद में हालात कुछ बदल गए, राज्य सभा और लोक सभा के सांसद जो फ़िल्म के क्षेत्र से आए हैं, सभी विज्ञापनों में भाग लेते हैं, जिसकी दलील ये है कि वे यह विज्ञापन एक कलाकार की हैसियत से कर रहे हैं न कि सांसद की। क्या ये मुमकिन है कि एक ही व्यक्ति, एक साथ दो व्यक्तियों की तरह व्यवहार करे। ऐसे में कुछ उत्साही सांसद सर ठंडा रखने से लेकर घुटने ठीक करने तक का तेल बेचते हैं, पानी साफ़ करने के फ़िल्टर से लेकर इंवर्टर तक के विज्ञापन करते हैं। दलील ये है कि ये उनका पेशा है। मेरे विचार से जिन्हें विज्ञापन देने हैं, उन्हें जन प्रतिनिधि नहीं होना चाहिए और जो जन प्रतिनिधि हैं, उन्हें व्यावसायिक विज्ञापन नहीं देने चाहिए...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%A8%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1575</id>
		<title>लक्ष्य और साधना -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%A8%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1575"/>
				<updated>2017-05-21T14:07:24Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;लक्ष्य और साधना&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Anti.jpg|right|300px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        एक वीरान इलाक़े से छोटे पहलवान गुज़र रहा था। अचानक चार लठैतों ने घेर लिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;जो कुछ है निकाल दे... जल्दी!&amp;quot; &lt;br /&gt;
छोटे ने कहना नहीं माना, बस होने लगा घमासान। धुँआधार झगड़ा हुआ। पहलवान आकाश पाताल एक करवाने के बाद ही क़ाबू में आया। छोटे ने अपनी अंटी कसके मुट्ठी में दबा रखी थी, जो खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी। आख़िर जैसे-तैसे अंटी खुली और अंटी से निकली सिर्फ़ एक चवन्नी!&lt;br /&gt;
&amp;quot;एक चवन्नी ? वो भी सरकार ने अब बन्द कर दी है !&amp;quot; एक बोला। &lt;br /&gt;
&amp;quot;इतनी कोशिश करके तो ओलम्पिक में मैडल मिल जाता...और ये चवन्नी के पीछे लड़ रहा था ?&amp;quot; -दूसरा बोला।&lt;br /&gt;
चारों डक़ैत और छोटे पहलवान थक कर पस्त हो चुके थे। &lt;br /&gt;
&amp;quot;यार बीड़ी ही निकाल लो&amp;quot; एक डक़ैत बोला। &lt;br /&gt;
छोटे पहलवान ने बड़े सम्मान के साथ जेब से बीड़ी निकाल कर पेश की। अब सीन बदल चुका था...सबकी आपस में जान पहचान हो जाने पर एक डक़ैत ने पूछा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम्हारे पास सिर्फ़ एक चवन्नी थी और तुम इतनी भयानक लड़ाई लड़ रहे थे?&amp;quot; &lt;br /&gt;
इस पर छोटे ने अपने जूते में छुपाया हुआ हज़ार का नोट निकाल कर दिखाया&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये देखो!&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे! तुमको डर नहीं लग रहा कि हम तुमसे ये नोट छीन लेंगे?&lt;br /&gt;
&amp;quot;सवाल ही नहीं उठता!&amp;quot; छोटे ने विश्वास के साथ कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्यों ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;देखो गुरु! तुम समझ गये हो कि जब मैं चवन्नी के लिए तुम चारों से इतना भीषण युद्ध कर सकता हूँ, तो फिर हज़ार रुपये के लिए तो पूरी बटालियन से लड़ जाऊँगा। इसलिए तुमको नोट दिखाने में कोई समस्या नहीं है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        छोटे पहलवान का लक्ष्य था अपनी अंटी की सुरक्षा करना। इससे कोई मतलब नहीं था कि अंटी में चवन्नी है या हज़ार रुपए और इस लक्ष्य के लिए उसने भीषण लड़ाई लड़ी। इस बार मैंने 'लक्ष्य' और 'साधना' पर कुछ लिखने की कोशिश की है... &lt;br /&gt;
        स्वामी विवेकानंद अक्सर देश-विदेश के दौरे पर रहते थे। जगह-जगह पर उनके भाषण हुआ करते थे। 14-15 वर्ष की कच्ची उम्र के नरेन (विवेकानंद का बचपन का नाम) पर, 1876-78 के समय भारत में पड़े भीषण अकाल का गहरा असर पड़ा। बाद में भी वर्षों तक अकाल की विभीषिका भारत में अपनी काली छाया से बर्बादी करती रही। विवेकानंद अकाल के समय ध्यान और प्रवचन छोड़ कर अकालग्रस्त लोगों की सहायता करने में लग जाते थे और दिन-रात उसमें लगे रहते थे। एक बार, उनके सम्पर्क के लोगों को एतराज़ हुआ, जिनमें से कुछ सन्न्यासी भी थे। वो चार-पांच लोग उनके पास आये और उनमें से एक नौजवान सन्न्यासी ने उनसे कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये आप क्या कर रहे हैं ? स्वामी जी ! ना तो ये आपका लक्ष्य है और ना ही आपका कार्य। आपका लक्ष्य है भारत की संस्कृति से सम्बन्धित प्रवचन देना। सारे देश-दुनिया में उसे फैलाना और लोगों को जागृत करना। आपने तो ध्यान करना भी बंद कर दिया है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छा ठीक है... आज ध्यान ही करते हैं... तुम सही कह रहो हो, ध्यान करना आवश्यक है।&amp;quot; विवेकानन्द जी ने कहा&lt;br /&gt;
जब सब ध्यानमग्न हो गए तो स्वामी जी ने एक पास में रखा हुआ डंडा उठाया और एक डंडा उस नौजवान सन्न्यासी की पीठ पर मारा, जब उसने आँखें खोली तो दो-तीन डण्डे और जमा दिए। वह एकदम उत्तेजित और परेशान हो गया। उसके साथ में जो तीन-चार लोग थे, वह भी एकदम से चौंक गए। वो खड़े हुए और कहने लगे-&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये आप क्या रहे हैं ? आपने इस तरह से क्यों पीटना शुरू कर दिया ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
इस पर स्वामी विवेकानंद ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या इन परिस्थिति में तुम ध्यान कर सकते हो ? जब मैंने डंडा उठाया तो तुम डंडे से ख़ुद को बचाने में लग गये। ठीक यही स्थिति मेरी है। जब मेरे देश में अकाल पड़ा हुआ है, लोग भूखो मर रहे हैं, यहाँ तक कि ग़रीब स्त्रियों ने अपने बच्चे बेच दिए, लोग भूख की वजह से अपने हाथ खा गये और तुम चाहते हो कि मैं अकाल राहत कार्य छोड़ कर ध्यान, योग और संस्कृति की बातें करूँ ? इस समय मेरा लक्ष्य, लोगों को अकाल से बचाना है और यही है सच्ची 'साधना'&amp;quot;&lt;br /&gt;
अपनी इन विलक्षणताओं के कारण ही स्वामी विवेकानन्द को आज सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।&lt;br /&gt;
        साधक, साधना और साध्य; इन तीनों में क्या महत्त्वपूर्ण है ? लक्ष्य क्या होना चाहिए ? फल की इच्छा न करने के लिए गीता में क्यों लिखा है ?&lt;br /&gt;
साध्य वह लक्ष्य है, जिसे आप प्राप्त करना चाहते हैं। साधना उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, जो कुछ आप कर रहे हैं, वो है। आपके क्रियान्वयन हैं, आपके प्रयास हैं और साधक, साधक आप हैं। क्या महत्त्वपूर्ण है इन तीनों में? हमेशा यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि सबसे महत्त्वपूर्ण साधना होती है। लक्ष्य महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण आप भी नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण है वह साधना। इस साधना के बल पर ही, आप कुछ रचना कर सकते हैं, कुछ ख़ास बन सकते हैं, महत्त्वपूर्ण बन सकते हैं। इसे समझा कैसे जाए?&lt;br /&gt;
एक कहावत है &amp;quot;या तो कुछ ऐसा करो कि लोग उस पर लिखें, या कुछ ऐसा लिखो कि लोग उसे पढ़ें&amp;quot;&amp;lt;/poem&amp;gt;{{दाँयाबक्सा|पाठ=जब सब ध्यानमग्न हो गए तो स्वामी जी ने एक पास में रखा हुआ डंडा उठाया और एक डंडा उस नौजवान सन्न्यासी की पीठ पर मारा, जब उसने आँखें खोली तो दो-तीन डण्डे और जमा दिए।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        वास्तविक लक्ष्य क्या होता है ? सचिन तेंदुलकर जब खेलने जाते हैं, तो क्या लक्ष्य होता है ? बढ़िया खेलना, देश को जिताना या 100-200 रन बनाना ? यदि देश को जिताना लक्ष्य होता है, तो ध्यान खेल में नहीं लग सकता, 100 रन बनाने का लक्ष्य रहे, तब भी ध्यान खेल में नहीं लगेगा, खेल पर ध्यान देने के लिए तो एकाग्रता से उस गेंद को देखना होता है, जो गेंदबाज़ के हाथ से छूटती है और सचिन के बल्ले तक आती है। गड़बड़ी कहाँ होती है ? जब रनों की संख्या 90 से ऊपर पहुँचती है। इस स्थिति में लक्ष्य 100 रन बनाने का हो जाता है और खेल से ध्यान हट जाता है, फिर गेंद नहीं स्कोर-बोर्ड दिमाग़ में ऊधम मचाने लगता है। इस 90 और 100 के बीच आउट होने की संभावना बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;
गीता का एक श्लोक है-&lt;br /&gt;
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।&lt;br /&gt;
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ &lt;br /&gt;
इस श्लोक का सीधा-सादा सा अर्थ है कि आपका लक्ष्य 'कर्म' होना चाहिए 'फल' नहीं।&lt;br /&gt;
        महाभारत के एक प्रसंग से हम सभी परिचित हैं, जिसमें द्रोणाचार्य ने एक चिड़िया, एक पक्षी की आँख भेदने के लिए सब पाण्डवों और कौरवों को बुलाया था। दूसरे राजकुमारों से भिन्न, अर्जुन ने कहा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरा ध्यान तो सिर्फ़ चिड़िया की आँख पर है और मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा।&amp;quot; &lt;br /&gt;
उस समय भी राजकुमारों को किसी परीक्षा में खरा उतरने के लिए पुरस्कृत किया जाता होगा। अर्जुन का ध्यान यदि परीक्षा की सफलता या उस पुरस्कार पर होता तो क्या निशाना सही लगता ? कोई आवश्यक नहीं है कि निशाना सही ही लगता।&lt;br /&gt;
अर्जुन का लक्ष्य था सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनना, इसलिए उसे चिड़िया की आँख ही दिखाई दे रही थी। यह सब घटा किस तरह होगा ? अर्जुन ने पूरी प्रक्रिया की... उसने अपने धनुष को उठाया होगा, फिर तूणीर में से एक बाण निकाला होगा, फिर धनुष पर रखा होगा, प्रत्यंचा खींची होगी, फिर लक्ष्य की ओर ध्यान दिया होगा, और तब बाण चलाया होगा। और उसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि उसने यह सब करने के लिए कितना अधिक अभ्यास किया होगा। इसके पीछे कितनी साधना छिपी हुई थी। केवल चिड़िया की आँख देखने से ही निशाना नहीं लग जाता बल्कि सही बात यह है कि अर्जुन ने बाण से लक्ष्य-भेद का इतना अधिक अभ्यास कर लिया था कि वह निशाना लगाते समय केवल लक्ष्य को ही देखता था। &lt;br /&gt;
        इसी में एक प्रसंग और आता है कि अर्जुन ने एक बार रात में खाना खाते हुए ये सोचा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;अभ्यासवश जब मैं बिना देखे रात में खाना खा रहा हूँ। खाना खाना मेरे अभ्यास में है, इसलिए मैं बिना देखे ही थाली में से भोजन को हाथ से उठाता हूँ और मुँह तक ले जाता हूँ। कभी ऐसा नहीं होता कि भोजन आँख में, कान में या नाक में चला जाए, तो उसने सोचा कि रात में तीर चलाने का अभ्यास भी किया जा सकता है। इसलिए धनुष पर तीर रखने तक की प्रक्रिया के लिए अर्जुन को लक्ष्य से ध्यान हटाकर धनुष और बाण की ओर देखने की भी आवश्यकता नहीं थी। &lt;br /&gt;
        आपका लक्ष्य क्या है, यह सबसे महत्त्वपूर्ण है। यदि आप युद्ध में हैं, तो लक्ष्य दूसरे को हराना नहीं बल्कि ख़ुद जीतना होना चाहिए। यदि आपका लक्ष्य दूसरे को हारते हुए देखना है, तो आप योद्धा नहीं, एक साधारण से व्यक्ति हैं जो कि बदला लेना चाहता है। यदि ख़ुद को जीतते हुए देखना, आपका लक्ष्य है तो आप सचमुच योद्धा हैं और इतिहास आपको याद रखेगा। अब इसे ऐसे देखें-&lt;br /&gt;
        महात्मा गांधी और सरदार भगत सिंह का एक ही लक्ष्य था, लेकिन तरीक़े अलग थे। क्या था ये लक्ष्य ? अंग्रेज़ों को भारत से भगाना? नहीं ऐसा नहीं था। उनका लक्ष्य था, भारत को आज़ाद कराना... स्वतंत्रता। इन दोनों बातों में बड़ा फ़र्क़ है। एक सकारात्मक है और एक नकारात्मक। अंग्रेज़ों को भगाना नकारात्मक है और स्वतंत्रता पाना सकारात्मक। लक्ष्य वही है जो सकारात्मक हो। छात्र जीवन में इस प्रकार की बातें अक्सर हमारे सामने आती हैं। कुछ छात्र लक्ष्य बनाते हैं पास होने का, कुछ बनाते हैं बहुत अच्छे अंक लाने का और जो सर्वश्रेष्ठ होते हैं उनका लक्ष्य होता है 'ज्ञानार्जन'।&lt;br /&gt;
        सिर्फ़ डिग्रियों से नौकरी मिलने का ज़माना अब ख़त्म हो रहा है। आज स्थितियाँ ये हो गई हैं कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने डिग्रियाँ देखना बन्द कर दिया है। वो उस फ़ाइल को उठाकर भी नहीं देखते जो आप इंटरव्यू में अपने साथ ले जाते हैं। वो सिर्फ़ आपसे बात करते हैं और कुछ दिन आपको कुछ काम या कोई प्रोजेक्ट दे देते हैं, जो आपको पूरा करके लाना होता है। इससे आपकी योग्यता की पहचान हो जाती है और नौकरी मिल जाती है। ये तभी सम्भव है, जब आपकी साधना पूरी रही हो, आपने पढ़ाई अच्छे ढंग से की हो। जो पढ़ाई केवल नम्बर लाने के लिए नहीं, बल्कि ख़ुद की योग्यता और जानकारी बढ़ाने के लिए की गई हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%95_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1574</id>
		<title>लेकिन एक टेक और लेते हैं -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%95_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1574"/>
				<updated>2017-05-21T14:03:17Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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[[चित्र:Retake-1.jpg|right|300px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        साइलेन्स, लाइट्स, रोल साउन्ड, रोल कॅमरा ऍन्ड ऍक्शन... कट इट... शॉट ओके... लेकिन एक टेक और लेते हैं। &lt;br /&gt;
ये दुनिया है सिनेमा की, जो अब शतायु हो चुका है हमारे देश में...&lt;br /&gt;
क्या-क्या हो लिया इन सौ सालों में…?&lt;br /&gt;
        सिनेमा का सफ़र एक वैज्ञानिक आविष्कार से शुरू हुआ और मनोरंजन का साधन बनने के बाद आज संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गया है। जो लोग ये सोचते थे कि सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन के लिए ही है, वे ग़लत साबित हुए। जिस तरह साहित्य, कला, विज्ञान और संगीत की एक श्रेणी मनोरंजन ‘भी’ है, उसी तरह सिनेमा भी सिर्फ़ मनोरंजन 'ही' नहीं है।&lt;br /&gt;
        ख़ैर... सिनेमा ने वक़्त-वक़्त पर अनेक रूप रखे हैं। सिनेमा को नाम भी तमाम दिए गए, जैसे- कला फ़िल्म, समांतर सिनेमा, सार्थक सिनेमा, मसाला फ़िल्म आदि–आदि। लेकिन एक नाम बिल्कुल सही है, वो है ‘सार्थक सिनेमा’। जो फ़िल्म जिस उद्देश्य से बनी है, यदि वह पूरा हो रहा है तो वह फ़िल्म सार्थक फ़िल्म है। वही सफल सिनेमा है।&lt;br /&gt;
        शुरुआती दौर मूक फ़िल्मों का था। भारत में 1913 में दादा साहब फाल्के के भागीरथ प्रयासों से 'राजा हरिश्चंद्र' पहली फ़ीचर फ़िल्म रिलीज़ हुई। चार्ली चॅपलिन, जिन्हें विश्व सिनेमा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, ने एक से एक बेहतरीन फ़िल्म इस दौर में बनाईं जैसे- मॉर्डन टाइम्स, सिटी लाइट्स, गोल्ड रश, द किड आदि। इस दौर में रूसी निर्देशक सर्गेई आइसेंसटाइन की फ़िल्म 'बॅटलशिप पोटेम्किन' सन 1926 में आई। इस फ़िल्म का एक मशहूर दृश्य, जिसमें एक औरत अपने बच्चे को बग्घी में सीढ़ियों पर ले जा रही है, बहुत मशहूर हुआ। जिसको ‘डि पामा’ ने अपनी फ़िल्म ‘अनटचेबल’ (1987) में भी फ़िल्म के अंतिम दृश्य में इस्तेमाल करके आइंसटाइन को श्रद्धांजलि दी।&lt;br /&gt;
        1931 में 'आलम आरा' के रिलीज़ होने से 'सवाक' याने बोलती हुई फ़िल्मों का दौर शुरू हो गया था। टॉकीज़ के शुरुआती दौर में, अशोक कुमार और देविका रानी अभिनीत 'अछूत कन्या' (1936) ने अपनी अच्छी पहचान बनाई। यह द्वितीय विश्वयुद्ध का समय था। इस समय 'चार्ली चॅपलिन' की फ़िल्म 'द ग्रेट डिक्टेटर' आई। इस फ़िल्म में उन्होंने मानवता पर एक बेहतरीन भाषण दिया है। चार्ली चॅपलिन को जगह-जगह इस भाषण के लिए बुलाया जाता था जिससे कि लोग मानवता का पाठ सीखें। 5-6 मिनट के इस भाषण को बोलने में चॅपलिन को कई बार बीच में ही पानी पीना पड़ा क्योंकि भाषण इतना भावुकता से भरा था कि गला अवरुद्ध हो जाता था। जनता पर इसका बहुत गहरा असर पड़ा। आज भी यह भाषण यादगार है। &lt;br /&gt;
        1939 में ‘गॉन विद द विंड’ ने क्लार्क गॅबल को बुलंदियों पर पहुँचा दिया। इस फ़िल्म ने लागत से सौ गुनी कमाई की। अब फ़िल्मों के लिए बजट कोई समस्या नहीं रह गई थी। बाद में ‘बेन-हर’ (1959) ने भी यह साबित कर दिखाया कि बहुत महंगी फ़िल्में यदि गुणवत्ता से बिना समझौता किए बनाई जाएं तो उनकी कमाई सिनेमा उद्योग को पूरी तरह स्थापित और मज़बूत करने में सहायक होती है। इटली और फ़्रांस ने बहुत उम्दा फ़िल्में विश्व को दी हैं। 1948 में इटली के वितोरियो दि सिका की ‘बाइस्किल थीव्स’ एक बेहतरीन फ़िल्म साबित हुई। सारी दुनिया में इसकी सराहना हुई और फ़िल्मों को केवल मनोरंजन का साधन न मानते हुए संस्कृति और समाज के दर्पण के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। &lt;br /&gt;
        प्यार-मुहब्बत के विषय पर हॉलीवुड में 'कासाब्लान्का' (1942) फ़िल्म को एक अधूरी प्रेम कहानी की बेजोड़ प्रस्तुति माना गया। इस फ़िल्म ने इंग्रिड बर्गमॅन को अभिनेत्री के रूप में सिनेमा-आकाश के शिखर पर पहुँचा दिया। इंग्रिड बर्गमॅन ने ढलती उम्र में इंगार बर्गमॅन की स्वीडिश फ़िल्म 'ऑटम सोनाटा' (1978) में भी उत्कृष्ट अभिनय किया। यह फ़िल्म दो व्यक्तियों के परस्पर संवाद, अंतर्द्वंद, पश्चाताप, आत्मस्वीकृति, आरोप-प्रत्यारोप का सजीवतम चित्रण थी। इसी दौर में वहीदा रहमान अभिनीत 'ख़ामोशी' (1969) आई, जिसने वहीदा रहमान को भारत की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बना दिया। वहीदा रहमान के अभिनय की ऊँचाई हम 'प्यासा' में देख चुके थे। &lt;br /&gt;
        'प्यासा' (1957) गुरुदत्त ने बनाई थी। गुरुदत्त सिनेमा जगत में लाइटिंग इफ़ॅक्ट के लिए विश्वविख्यात हैं। साथ ही उनके द्वारा किए गए 'सॉंग पिक्चराइज़ेशन' भी कमाल के हैं। सॉंग पिक्चराइज़ेशन के लिए विजय आनंद बॉलीवुड सिनेमा में सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। उन्होंने फ़िल्म निर्देशन में जो प्रयोग किए हैं, वो ग़ज़ब हैं। 'गाइड' का गाना 'आज फिर जीने की तमन्ना है' मुखड़े की बजाय अंतरे से शुरू है और 'ज्यूल थीफ़' (1967) का गाना 'होठों पे ऐसी बात मैं दबा के चली आई' में विजय आनंद का निर्देशन और वैजयंती माला का नृत्य अभी तक बेजोड़ माना जाता है।&lt;br /&gt;
        यश चौपड़ा ने प्रेम त्रिकोण को अपना प्रिय विषय बना लिया तो ऋषिकेश मुखर्जी ने स्वस्थ कॉमेडी को। ऋषिकेश मुखर्जी ने फ़िल्म सम्पादन से अपनी शुरुआत की थी। दोनों ने ही विदेशी फ़िल्मों की नक़ल करने के बजाय अधिकतर भारतीय मौलिक कहानियों को चुना।  &lt;br /&gt;
        1954 में जापानी फ़िल्म 'द सेवन समुराई' बनी, जो 'अकीरा कुरोसावा' ने बनाई। जापान के अकीरा कुरोसावा 'विश्व सिनेमा जगत के पितामह' कहे जाते हैं। विश्व की श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिनी जाने वाली इस फ़िल्म को आधार बना कर अनेक फ़िल्में बनी जिनमें एक रमेश सिप्पी की 'शोले' भी है। अल्पायु में ही स्वर्ग सिधारे जापान के महान कहानीकार 'रुनोसुके अकूतगावा' की दो कहानियों पर आधारित अद्भुत फ़िल्म, 'राशोमोन' बना कर कुरोसावा पहले ही ख्याति प्राप्त कर चुके थे। इस समय भारत में भी कई अच्छी फ़िल्में बनीं। सत्यजित राय, 'पाथेर पांचाली' (1955) बना रहे थे, जिसकी शूटिंग के लिए बार-बार पैसा ख़त्म हो जाता था लेकिन अपने पसंदीदा 40 एम.एम. लेन्स के साथ उन्होंने इस फ़िल्म से भारत में ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया में शोहरत पाई। हम भारतीयों को गर्व होना चाहिए कि कुरोसावा ने सत्यजित राय के लिए कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;सत्यजित राय के बिना सिनेमा जगत वैसा ही है जैसे सूरज-चाँद के बिना आसमान।&amp;quot; &lt;br /&gt;
        सत्यजित राय ने राजकपूर की 'मेरा नाम जोकर' के प्रथम भाग (बचपन वाला) को 10 महान फ़िल्मों में से बताया। राजकपूर अभिनीत 'जागते रहो' (1956) और महबूब ख़ान की 'मदर इंडिया' (1957) जैसी अच्छी फ़िल्में आईं। 1957 में ही एक और अच्छी फ़िल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ वी. शांताराम ने बनाई। ये सिनेमा 1980-90 तक आते-आते श्याम बेनेगल की 'अंकुर' और गोविन्द निहलानी की 'आक्रोश' भी हमें दिखा गया और 'रिचर्ड एटनबरो' की महात्मा गाँधी पर बनी उत्कृष्ट फ़िल्म 'गांधी' भी।   &lt;br /&gt;
        रहस्य-रोमांच और डर का विषय भी सिनेमा में ख़ूब चला। 'अल्फ़्रेड हिचकॉक' इसके विशेषज्ञ थे। उन्होंने तमाम फ़िल्में इसी विषय पर बनाईं जैसे- द 39 स्टेप्स, डायल एम फ़ॉर मर्डर, वर्टीगो आदि, लेकिन 'साइको' उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति थी। दुनिया भर में हिचकॉक की फ़िल्मों की और दृश्यों की नक़ल हुई।&lt;br /&gt;
        हॉलीवुड में 'वॅस्टर्न्स' (काउ बॉय कल्चर वाली फ़िल्में) का ज़ोर भी चल निकला। सरजो लियोने की 'वंस अपॉन ए टाइम इन द वॅस्ट' एक श्रेष्ठ फ़िल्म बनी। सरजो लियोने ने क्लिंट ईस्टवुड के साथ कई फ़िल्में बनाईं। इन फ़िल्मों में 'ऐन्न्यो मोरिकोने' के संगीत दिया और सारी दुनिया में प्रसिद्ध हुआ। 'नीनो रोटा' भी फ़िल्मों में लाजवाब संगीत दे रहे थे जिसका इस्तेमाल इटली के फ़िल्मकारों ने ख़ूब किया। &lt;br /&gt;
        फ़ॅदरिको फ़ॅलिनी ने 1963 में  8&amp;lt;sup&amp;gt;1&amp;lt;/sup&amp;gt;/&amp;lt;sub&amp;gt;2&amp;lt;/sub&amp;gt; फ़िल्म बनाई तो वह विश्व की दस सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में जगह पा गई। इस फ़िल्म में संगीत 'नीनो रोटा' ने ही दिया और फ़िल्म की पकड़ इतनी ज़बर्दस्त बनी कि हम फ़िल्म से ध्यान हटा ही नहीं सकते। फ़ोर्ड कॉपोला ने भी 'मारियो पुज़ो' के उपन्यास पर आधारित फ़िल्म 'द गॉडफ़ादर' के लिए 'नीनो रोटा' को ही चुना। फ़िल्मों में अच्छे संगीत की भूमिका अब प्रमुख हो गई। संगीत के बादशाह 'मोत्ज़ार्ट' पर माइलॉस फ़ोरमॅन ने 'अमादिउस' बनाई। वुल्फ़गॅन्ग अमादिउस मोत्ज़ार्ट और अन्तोनियो सॅलिरी की कहानी पर बनी यह फ़िल्म, फ़ोरमॅन के उस करिश्मे से बड़ा करिश्मा थी, जो वे 1975 में 'वन फ़्ल्यू ओवर द कुक्कूज़ नेस्ट' बना कर कर चुके थे। &lt;br /&gt;
        पचास के दशक में के.आसिफ़ ने मशहूर फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' शुरू की, जो क़रीब नौ साल का समय लेकर 1960 में प्रदर्शित हुई। यूँ तो मुग़ल-ए-आज़म से जुड़े हुए हज़ार अफ़साने हैं, लेकिन उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ का ठुमरी गाने का अंदाज़ सबसे रोचक है। इस फ़िल्म के संगीतकार नौशाद, के. आसिफ़ को लेकर बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ के घर पहुँचे और उनसे फ़िल्म में गाने के लिए कहा। बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने दोनों को टालने के लिए 25 हज़ार रुपये मांगे क्योंकि उस समय फ़िल्मों में गाना शास्त्रीय गायकों के लिए ओछी बात मानी जाती थी। के. आसिफ़ को चुटकी बजाकर बात करने की आदत थी, उन्होंने चॅक बुक निकालकर 10 हज़ार की रक़म लिखी और ख़ाँ साहब को चॅक थमा दिया और चुटकी बजाकर बोले &amp;quot;ये लीजिए एडवांस मैं आपको 25 हज़ार ही दूँगा।&amp;quot; पचास के दशक में फ़िल्मों में गाना गाने के हज़ार, दो हज़ार रुपये मिला करते थे।&lt;br /&gt;
        आख़िरकार बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुँचे। वहाँ उन्होंने औरों की तरह खड़े होकर गाने से मना कर दिया तो ज़मीन पर गद्दा, चांदनी और मसनद की व्यवस्था की गई। इतने पर भी ख़ाँ साहब गाने को राजी न हुए और उन्होंने पहले उस दृश्य को फ़िल्माने के लिए कहा, जिस पर कि उनकी ठुमरी चलनी थी। इसके बाद दिलीप कुमार और मधुबाला का वो दृश्य फ़िल्माया गया, जिसमें दिलीप कुमार, मधुबाला के चेहरे पर पंख से हल्के-हल्के से सहला रहे हैं। यह दृश्य स्टूडियो में पर्दे पर प्रोजेक्टर से चलाया गया और इसको देखते हुए ख़ाँ साहब ने अपनी मशहूर ठुमरी गायी। राग सोहणी में ‘प्रेम जोगन बनके’ ठुमरी, जितनी बार भी सुन लें, अच्छी ही लगती है। ठुमरी गा कर ख़ाँ साब बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;वैसे ये लड़का और ये लड़की हैं तो अच्छे...&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=1odcNKyfZJU गाइड का गाना 'आज फिर जीने की तमन्ना है' (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=jtn4am42kW4 ज्यूल थीफ़ का गाना 'होठों पर ऐसी बात' (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=LhHkDb6H5_c राशोमोन (Rashomon) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=27lMS76hGG0 गांधी (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=kvKXt3Surlk द गॉडफ़ादर का मुख्य पार्श्व संगीत (Godfather Theme Song)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=NG-Y1GYoGfE द गुड बैड एंड अग्ली का पार्श्व संगीत (The Good The Bad And The Ugly Theme)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=dUUx7zYGL28 ऑटम सोनाटा (Autumn Sonata)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=DZRjLceDl88 द थर्टी नाइन स्टेप्स (The 39 Steps)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=lGm1HcK00Cs&amp;amp;feature=fvst द सिटी लाइट्स (City Lights) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=WMraad_AuRQ मॉर्डन टाइम्स (Modern Times) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=K4Zo_XizA68 गोल्ड रश (Gold Rush) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=vdOmrcM8jJM&amp;amp;feature=watch-now-button&amp;amp;wide=1 द किड (The Kid) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=Y6FuYf7r46Y राजा हरिश्चंद्र (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=Si0dIOTYWNo बॅटलशिप पोटेम्किन (Battleship Potemkin) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=mkCx3xQ6XKQ&amp;amp;feature=related द ग्रेट डिक्टेटर (The Great Dictator)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=Iw6KokWMj3g&amp;amp;feature=fvst 'द ग्रेट डिक्टेटर' में चार्ली चॅपलिन का भाषण (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=VteAghaJias&amp;amp;ob=av3e 'ख़ामोशी' (यू ट्यूब विडियो)] &lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=53V1w0Jq8po&amp;amp;feature=watch-now-button&amp;amp;wide=1 प्यासा (यू ट्यूब विडियो)] &lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=Aob1I_Ifee0 ‘प्रेम जोगन बनके’ (यू ट्यूब विडियो)]  &lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B_%E0%A4%A4%E0%A5%8B_%E0%A4%95%E0%A4%B9_%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%87_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1573</id>
		<title>कुछ तो कह जाते -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T13:57:54Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;कुछ तो कह जाते&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Microphone01.jpg|border|right|300px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;हम नेता बनना चाहते हैं।&amp;quot; छोटे पहलवान ने अपनी पहचान वाले एक नेता जी से सकुचाने का हास्यास्पद उपक्रम करते हुए कहा। &lt;br /&gt;
नेताजी अपने 55 साला चेहरे पर इस तरह के भाव लाए जैसे किसी इंटर कॉलेज के टीचर से कोई प्राइमरी का सवाल पूछ लिया हो। वो बहुत ज़्यादा अपनापन ओढ़ कर बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;वाह ! तुम नेता बनना चाहते हो... इतनी सी बात... तो इस मामले में तो थोड़ी लम्बी बातचीत होगी... पास ही के कॉफ़ी हाउस में चलते हैं।&amp;quot; &lt;br /&gt;
कॉफ़ी हाउस पहुँच कर उन्होंने तीन कॉफ़ी और एक ठंडा पेय मंगाया। एक कॉफ़ी छोटे पहलवान को दे दी और एक ख़ुद पीने लगे बाक़ी जो एक कॉफ़ी और एक सॉफ़्ट ड्रिंक थी वो ऐसे ही मेज़ पर रखी रही।&lt;br /&gt;
&amp;quot;नेता तो तुम बन ही सकते हो लेकिन... हमारे देश में नेता बनने के लिए कुछ न कुछ गुण अवश्य होने चाहिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
छोटे पहलवान ने पूछा- 'जैसे ?'&lt;br /&gt;
उन्होंने कहा- &amp;quot;जैसे कि आप अच्छे वक्ता हों, आवाज़ बुलन्द हो। जिससे कि आपका लच्छेदार भाषण सुनने भीड़ इकट्ठी हो जाए, अगर भाषण देना नहीं आता हो तो बहुत ज़ोरदार नारे लगाना ही आता हो... नारों की आवाज़ बड़े-बड़े नेताओं को भावुक कर देती है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
उन्होंने धारा प्रवाह कहना शुरू किया-&lt;br /&gt;
या फिर&lt;br /&gt;
आप संगठन की क्षमता रखते हों तो आप एक संगठन खड़ा कर सकते हैं, हज़ारों लोग आपके साथ हो जायेंगे। संगठन नहीं कर सकते तो लड़वा दें। लड़वाने की कला राजनीति में कमाल के फ़ायदे दिलवाती है, औरों को लड़वाकर खुद फ़ायदा उठा लें।&lt;br /&gt;
या फिर&lt;br /&gt;
लड़ाना नहीं जानते तो झूठ बोलना आता हो। प्रभावशाली ढंग से गप्प मारना आता हो। अगर ये कला आप जानते हैं तो वारे-न्यारे समझिये। झूठ हर एक जगह काम आता है। गप्प मारने में मज़ा भी आता है और फ़ायदा भी बहुत होता है।&lt;br /&gt;
या फिर&lt;br /&gt;
आपके पास ख़र्च करने के लिए पैसा बहुत होना चाहिए। पैसे की चमक से और चाँदी के जूते की मार से ही कार्यकर्ता और दूसरे नेता आपके साथ आ जाएँगे। पैसे न हो तो आपको चापलूसी और चमचागिरी करने में महारथ हासिल हो, जिससे किसी बड़े नेता को आप अपनी चापलूसी से ही पटा लें। &lt;br /&gt;
या फिर&lt;br /&gt;
आप दिखने में बहुत सुन्दर-सलोने, चिकने-चुपड़े हों कि आपको देखते ही कुछ नेता आप पर रीझ जाएँ। ऐसे नेता आजकल बहुत पॉपूलर हो रहे हैं, अगर सुन्दर न हों तो फिर आप दिखने में भयंकर और डरावने हों, चेहरा रौबिला हो, बड़ी-बड़ी मूँछें हों, जिनको देखकर ही लोग आपसे दहशत खा जाएँ। &lt;br /&gt;
या फिर&lt;br /&gt;
शरीर लम्बा-चौड़ा हो, कोई रिटायर्ड पहलवान हों जिससे दूर से ही भीड़ में अलग दिखें। भीड़ में लोगों को कोहनी मार-मार कर आगे पहुँच जाएँ। इसे 'कोहनी-मार' राजनीति कहते हैं।&lt;br /&gt;
या फिर &lt;br /&gt;
ताक़त न हो तो कंठ मधुर हो सुरीला हो, मतलब ये कि अपनी बात को भाषण से न कहकर गाकर सुना दें। गाना सुनकर जनता ख़ुश हो जाती है। आजकल फ़ॅशन में भी है। गाना नहीं आता तो नाचना आता हो कि लोगों को नाच दिखाकर, ठुमका लगाकर आकर्षित कर लें। नाच-नाचकर भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं।  राजनीति में नाचना बड़े काम की चीज़ है।&lt;br /&gt;
या फिर&lt;br /&gt;
आप किसी रजवाड़े से सम्बन्धित हों, किसी महाराजाधिराज के साले-जीजा हों तो वैसे ही आपकी जय-जयकार होगी, आराम से नेता बन जायेंगे। राजा नहीं तो बहुत बड़े रिटायर्ड अधिकारी हों। &lt;br /&gt;
या फिर &lt;br /&gt;
किसी नेता के दूर के या पास के रिश्तेदार हों, फिर तो जनता यूं ही आपको नेता मान लेगी। अगर कोई नेता रिश्तेदार नहीं भी हुआ तो किसी साधु-सन्न्यासी के चेले बनने की कला आती हो। साधु-सन्न्यासी ऐसा हो जिसके हज़ारों चेले हों। आजकल इस लाइन में बड़ा स्कोप है।&lt;br /&gt;
या फिर &lt;br /&gt;
आप घरेलू कामों में एक्सपर्ट हों। जैसे - खाना बनाना, बर्तन मांजना, बच्चे खिलाना, कपड़े धोना, मालिश करना, जिससे कि आपको किसी बड़े नेता के घर पर रखवा दिया जाए और वह नेता आपसे खुश हो जाये। कुछ नेता ऐसे भी हैं, जो इसी रास्ते को अपना कर नेता बने हैं।&lt;br /&gt;
या फिर&lt;br /&gt;
कुछ नहीं तो कम से कम चौराहे पर आपका ऊँचा सा मकान हो, जिस पर कोई पार्टी अपना एक झंडा लगा सके। मकान न हो तो आप झंडा लेकर भागने की क्षमता रखते हों कि मीलों भागते चले जाएं। जिससे नेता और जनता का ध्यान आकर्षित करें।&amp;lt;/poem&amp;gt;{{दाँयाबक्सा|पाठ=क्यूबा (कुबा) के पूर्व शासक फ़िदेल कास्रो का संयुक्त राष्ट्र संघ में 4 घंटे 29 मिनट लगातार भाषण देने का कीर्तिमान है, जो गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अगर इतनी लम्बी लिस्ट में से, कुछ भी ऐसा नहीं है, जो कि आप कर सकते हों तो आप नेता नहीं बन सकते।&amp;quot;&lt;br /&gt;
उन्होंने एक लम्बी सांस ली और फिर बोलने लगे &amp;quot;बोलो क्‍या कहते हो, बनना है नेता ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;वो तो ठीक है लेकिन नेता बनने के बाद करना क्या होगा... मेरा मतलब है कि मान लीजिए मंत्री बन गए तो फिर पॉलिसी क्या अपनाएँगे हम ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;इसे समझने के लिए पहले कॉफ़ी और कोल्ड ड्रिंक को छूकर देखो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
जो कॉफ़ी और ठंडा पेय नेताजी ने मेज़ पर ऐसे ही रख छोड़ा था, उन्हें छूकर छोटे ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;दोनों का टॅम्परेचर एक ही हो गया है, ना तो कॉफ़ी गर्म रही और ना ही कोल्ड-ड्रिंक ठंडी...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;बस, यही समझने वाली बात है। नेता बनने के बाद तुमको समस्याओं को ऐसे ही सुलझाना है। गर्म कॉफ़ी नई समस्या, ठंडी सॉफ़्ट ड्रिंक पुरानी समस्या... दोनों को ऐसे ही छोड़ दो... कुछ बोलो ही मत... सब कुछ अपने आप ही नॉर्मल हो जाएगा... बहुत समय से बड़े-बड़े मंत्री भी इसी तरीक़े को अपना रहे हैं।... सुपर हिट पॉलिसी है ये... पार्लियामेन्ट में यही पॉलिसी अच्छी रहती है। हमारे बहुत से नेता हर एक समस्या का समाधान इसी तरह करते हैं।&amp;quot; &lt;br /&gt;
        इनकी बात-चीत को छोड़कर चलिए कॉफ़ी हाउस से वापस चलें-&lt;br /&gt;
दुनिया में भाषण देने के और विभिन्न सदनों में बोलने के तमाम कीर्तिमान हैं। क्यूबा (कुबा) के पूर्व शासक फ़िदेल कास्रो का संयुक्त राष्ट्र संघ में 4 घंटे 29 मिनट लगातार भाषण देने का कीर्तिमान है, जो गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है। कास्त्रो का एक कीर्तिमान क्यूबा की राजधानी हवाना में 7 घंटे 10 मिनट का भी है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन कॅनेडी ने दिसम्बर1961 में जो भाषण दिया था उसमें 300 शब्द प्रति मिनट से भी तेज़ गति थी। 300 शब्द प्रति मिनट की गति से भाषण दे पाना बहुत ही कम लोगों के वश में है, कॅनेडी ने इस वक्तव्य में कभी-कभी 350 शब्द तक की गति भी छू ली थी।&lt;br /&gt;
        कैसे बोल लेते हैं लोग इतने देर तक, इतनी तेज़ गति से और इतना प्रभावशाली ? सीधी सी बात है अगर आपके पास कुछ 'कहने' को है तो आप बोल सकते हैं। यदि कुछ कहने को नहीं है तो बोलना तो क्या मंच पर खड़ा होना भी मुश्किल है। दुनिया में तमाम तरह के फ़ोबिया (डर) हैं जिनमें से सबसे बड़ा फ़ोबिया भाषण देना है, इसे ग्लोसोफ़ोबिया (Glossophobia) कहते हैं। यूनानी (ग्रीक) भाषा में जीभ को 'ग्लोसा' कहते हैं इसलिए इसका नाम भी ग्लोसोफ़ोबिया है। &lt;br /&gt;
        भारतीय संसद में अनेक प्रभावशाली संबोधन होते रहे हैं। एक समय में संसद में प्रकाशवीर शास्त्री धारा-प्रवाह बोला करते थे। संसद से बाहर (संसद बनी भी नहीं थी तब तक) लोकमान्य तिलक, सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद जैसे कितने ही नाम हैं जो महान वक्ताओं की श्रेणी में आते हैं। आजकल प्रभावी वक्ताओं की संख्या में कमी आ गई है। क्या लगता है कि उनके पास बोलने को कुछ नहीं है या फिर सुनने वाले उकता गए हैं ? अटल बिहारी वाजपेयी और सोमनाथ चटर्जी के बाद कौन सा ऐसा नाम है जिसे हम संसद के प्रभावशाली सदस्य के रूप में याद रखेंगे ?&amp;lt;/poem&amp;gt; {{दाँयाबक्सा|पाठ=अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन कॅनेडी ने दिसम्बर1961 में जो भाषण दिया था उसमें 300 शब्द प्रति मिनट से भी तेज़ गति थी।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        स्वामी विवेकानंद का एक संस्मरण देखिए-&lt;br /&gt;
स्वामी विवेकानंद एक सभा में 'शब्द' की महिमा बता रहे थे, तभी एक व्यक्ति ने खड़े होकर कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;शब्द का कोई मूल्य नहीं कोई महत्व नहीं है और आप शब्द को सबसे महत्त्वपूर्ण बता रहे हैं... जबकि ध्यान की तुलना में शब्द कुछ भी नहीं है&amp;quot;&lt;br /&gt;
विवेकानंद ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;बैठ जा मूर्ख, खड़ा क्यों हो गया।&amp;quot;&lt;br /&gt;
उस व्यक्ति ने नाराज़ होकर कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप मुझे मूर्ख कह रहे हैं। यह भी कोई सभ्यता है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्यों बुरा लगा ? मूर्ख भी तो शब्द ही है। इस एक शब्द से आपका पूरा संतुलन डगमगा गया। अब आपकी समझ में आ गया होगा कि शब्द का कितना महत्व है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शब्द की महिमा अपार है लेकिन हमारे नेता इस महिमा को भूलते जा रहे हैं।...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1572</id>
		<title>दोस्ती-दुश्मनी और मान-अपमान -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1572"/>
				<updated>2017-05-21T13:55:37Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;दोस्ती-दुश्मनी और मान-अपमान&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Court-of-nand.jpg|राजा नन्द का दरबार|border|right|400px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        न जाने कितनी पुरानी बात है कि न जाने किस राज्य में वीर नाम का एक युवक रहता था। एक बार वीर को दूसरे राज्य में किसी काम से जाना पड़ा और दुर्भाग्य से वीर वहाँ एक झूठे अपराध में फँस गया। गवाहों की ग़ैर मौजूदगी के कारण राजा ने उसे फाँसी का हुक़्म सुना दिया और मुनादी करवा दी गई-&lt;br /&gt;
&amp;quot;हर ख़ास-ओ-आम को सूचित किया जाता है कि अपराधी वीर को ठीक एक महीने बाद...याने पूर्णमासी के दिन... हमारे राज्य की प्रथा के अनुसार... प्रजा के सामने... सार्वजनिक रूप से फाँसी पर लटकाया जाएगाऽऽऽ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        जेल में बंद वीर बहुत परेशान था। उसे परेशान देखकर पहरेदार ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;फाँसी की सज़ा से तुम परेशान हो गए हो। अब मरना तो है ही... आराम से खाओ-पीओ और मस्त रहो&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुझे अपने मरने की चिन्ता नहीं है। मेरी परेशानी कुछ और है... क्या मुझे जेल से कुछ दिन की छुट्टी मिल सकती है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जेल से छुट्टी ? ये कोई नौकरी है क्या, जो छुट्टी मिल जाएगी?... लेकिन बात क्या है, कहाँ जाना है तुम्हें छुट्टी लेकर ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरी माँ अन्धी है और घर पर अकेली है। मुझे उसके शेष जीवन का पूरा प्रबंध करने के लिए जाना है जिससे मेरे मरने के बाद उसे कोई कष्ट न हो। उसका सारा प्रबंध करके मैं एक महीने के भीतर ही लौट आऊँगा।... क्या कोई तरीक़ा... क्या कोई क़ानून ऐसा नहीं है कि मुझे कुछ दिनों की छुट्टी मिल जाय ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;देखो भाई ! तुम पढ़े-लिखे और सज्जन आदमी मालूम होते हो... तुम्हारी समस्या को मैं राज्य के मंत्री तक पहुँचवा दूँगा... बस इतना ही मैं तुम्हारे लिए कर सकता हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        अगले दिन पहरेदार ने बताया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;सिर्फ़ एक तरीक़ा है कि तुम छुट्टी जा सको...?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;वो क्या ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अगर तुम्हारी जगह कोई और यहाँ जेल में बन्द हो जाय... जिससे कि अगर तुम नहीं लौटे तो तुम्हारी जगह उसे फाँसी दे दी जाय...सिर्फ़ यही तरीक़ा है... लेकिन कभी ऐसा हुआ नहीं है क्योंकि कोई भी किसी की फाँसी की ज़मानत थोड़े ही देता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप मेरे गाँव से मेरे दोस्त धीर को बुलवा दीजिए... मेहरबानी करके जल्दी उसे बुलवा दें&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;पागल हो क्या ! कोई दोस्त-वोस्त नहीं होता ऐसे मौक़े के लिए...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप उसे ख़बर तो करवाइए...&amp;quot;&lt;br /&gt;
        वीर और धीर की दोस्ती सारे इलाक़े में मशहूर थी। लोग उनकी दोस्ती की क़समें खाया करते थे। जैसे ही धीर को ख़बर मिली वो भागा-भागा आया और वीर को जेल से छुट्टी मिल गई। &lt;br /&gt;
        धीरे-धीरे दिन गुज़रने लगे, वीर नहीं लौटा और न ही उसकी कोई ख़बर आई। धीर के चेहरे पर कोई चिन्ता के भाव नहीं थे बल्कि वह तो रोज़ाना ख़ूब कसरत करता और जमकर खाना खाता। पहरेदार उससे कहते कि वीर अब वापस नहीं आएगा तो धीर हँसकर टाल जाता। इस तरह फाँसी में केवल एक दिन शेष रह गया, तब सभी ने धीर को समझाया कि उसे मूर्ख बनाया गया है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप लोग नहीं जानते वीर को... यदि वह जीवित है तो निश्चित लौटेगा... चाहे सूर्य पूरब के बजाय पच्छिम से उगे... लेकिन वीर अवश्य लौटेगा। एक बात और है, जिसका पता आप लोगों को नहीं है। मैंने उसे यह कहकर भेजा है कि वह कभी वापस न लौटे और मुझे ही फाँसी लगने दे... मगर मैं जानता हूँ उसे, वो नालायक़ ज़रूर लौटेगा, मेरी बात मानेगा ही नहीं !&amp;quot;&lt;br /&gt;
        जब सबने यह सुना कि ख़ुद धीर ने ही वीर से लौटने के लिए मना कर दिया है तो राजा को सूचना दे दी गई।&lt;br /&gt;
पूर्णमासी आ गई और फाँसी का दिन भी...। अपार भीड़ एकत्र हो गई, इस विचित्र फाँसी को देखने के लिए। जिसमें किसी के बदले में कोई और फाँसी पर चढ़ रहा था। स्वयं राजा भी वहाँ उपस्थित था। फाँसी लगने ही वाली थी कि वहाँ वीर पहुँच गया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;रोकिए फाँसी ! फाँसी तो मुझको दी जानी है... मैं आ गया हूँ अब... मुझे दीजिए फाँसी&amp;quot; - वीर बोला,&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं ये समय पर नहीं लौट पाया है, इसलिए फाँसी तो अब मुझे लगेगी... मुझे !&amp;quot; धीर चिल्लाया,&lt;br /&gt;
        इस तरह दोनों झगड़ने लगे। जनता के साथ-साथ राजा को भी बहुत आश्चर्य हो रहा था कि ये दोनों दोस्त फाँसी पर चढ़ने के लिए लड़-झगड़ रहे हैं ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन तुम इतनी देर से क्यों लौटे ?&amp;quot; राजा ने पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज ! मैंने तो अपनी माँ के लिए सारा इन्तज़ाम एक सप्ताह में ही कर दिया था और उसे समझा भी दिया था कि अब उसका ध्यान धीर ही रखेगा। जब मैं वापस लौट रहा था तो लुटेरों से मेरी मुठभेड़ हो गई। मैं 15 दिन घायल और बेसुध पड़ा रहा। जैसे ही मुझे होश आया, मैं भागा-भागा यहाँ आया हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राजा ने कहा &amp;quot;अब तो तुम दोनों को ही सज़ा दी जाएगी... लेकिन वो फाँसी नहीं बल्कि हमारे राजदरबार में नौकरी करने की सज़ा होगी... तुम दोनों बेमिसाल दोस्त हो और ईमानदार भी... आज से तुम दोनों हमारे राजदरबार की शोभा बढ़ाओगे&amp;quot;&lt;br /&gt;
        ये तो थी मित्रता की एक पुरानी कहानी, मित्रता और शत्रुता का आपसी रिश्ता बहुत गहरा है। मित्रता, बराबर वालों में होती है और इस 'बराबर' का संबंध पैसे की बराबरी से नहीं है, यह बराबरी किसी और ही धरातल पर होती है। इसी कारण हमारे 'स्तर' की पहचान हमारे दोस्तों से होती है। यही बात शत्रुता पर भी लागू होती है। हमारे शत्रु जिस स्तर के हैं, हमारा भी स्तर वही होता है।&lt;br /&gt;
        यूनान के सम्राट सिकंदर से किसी ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आपके बारे में सुना है कि आप बहुत तेज़ दौड़ सकते हैं। किसी दौड़ में आप हिस्सा क्यों नहीं लेते ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जब सम्राटों की दौड़ होगी तो सिकंदर भी दौड़ेगा।&amp;quot; सिकंदर का उत्तर था।&lt;br /&gt;
        इसी तरह 'नेपोलियन बोनापार्ट' से एक पहलवान ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आपकी बहादुरी मशहूर है, मुझसे कुश्ती लड़कर मुझे हरा कर दिखाइए !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुमसे मेरा अंगरक्षक लड़ेगा... जो तुमसे दोगुना ताक़तवर है। उसके सामने तुम एक मिनिट भी नहीं टिक पाओगे। मुझे अपनी बहादुरी के लिए 'तुम्हारे' प्रमाणपत्र की नहीं बल्कि यूरोप की जनता के विश्वास की ज़रूरत है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        मित्रता का कोई 'प्रकार' नहीं होता कि इस प्रकार की मित्रता या उस प्रकार की, जबकि शत्रुता के बहुत सारे 'प्रकार' हैं। जैसे- राजनीतिक शत्रुता, व्यापारिक शत्रुता, ईर्ष्या-जन्य शत्रुता आदि कई तरह की शत्रुता हो सकती हैं। शत्रुता के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि शत्रुता कम हो गई या बढ़ गई। मित्रता कम या अधिक नहीं होती, या तो होती है या नहीं होती। जब हम यह कहते हैं &amp;quot;उससे हमारी उतनी दोस्ती अब नहीं रही...&amp;quot; तो हम सही नहीं कह रहे होते। वास्तव में दोस्ती समाप्त हो चुकी होती है। इसी तरह 'गहरी मित्रता' जैसी कोई स्थिति नहीं होती। दोस्ती और दुश्मनी में एक फ़र्क़ यह भी होता कि दोस्ती 'हो' जाती है और दुश्मनी 'की' जाती है।&lt;br /&gt;
        मित्रता और शत्रुता के संबंध में गीता क्या कहती है ?&lt;br /&gt;
गीता में दो श्लोक है-&lt;br /&gt;
सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।&lt;br /&gt;
शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: संग्ङविवर्जित: ।। (गीता अध्याय-12 श्लोक-18)&lt;br /&gt;
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: ।&lt;br /&gt;
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते ।। (गीता अध्याय-14 श्लोक-25)&lt;br /&gt;
        सामान्य भावार्थ को ही समझें तो इन श्लोकों का मतलब है कि बुद्धिमान के लिए न कोई मित्र है और न कोई शत्रु है। न कोई मान है, न कोई अपमान है।&lt;br /&gt;
ऐसा कैसे हो सकता है कि न कोई मित्र है और न कोई शत्रु है ? न कोई मान है, न कोई अपमान है ! मित्र तो मित्र होता है, शत्रु तो शत्रु होता है। जो मित्र है, वह शत्रु कैसे हो सकता है और जो शत्रु है, वह मित्र कैसे हो सकता है ? इसी तरह यदि कोई हमें अपमानित करता है तो बुरा लगता है। कोई सम्मान देता है तो अच्छा लगता है। ये कैसे सम्भव है कि न कोई अपमान है और न कोई मान है। गीता में इस श्लोक का अर्थ क्या है ?&lt;br /&gt;
एक उदाहरण देखें-&lt;br /&gt;
        चाणक्य और राक्षस की शत्रुता विश्वविख्यात है। चंद्रगुप्त के सम्राट बनने के बाद चाणक्य ने महामात्य के पद से सेवा निवृत्त होकर वापस तक्षशिला जाकर अध्यापन कार्य करना चाहा तो चंद्रगुप्त ने पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;अमात्य ! आपकी अनुपस्थिति में आपका कार्य कौन संभालेगा ? मगध का राज्य, चाणक्य जैसे महामात्य के बिना कैसे चल पाएगा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;राक्षस बनेगा महामात्य ! उससे अधिक योग्य और निष्ठावान कोई दूसरा नहीं है।&amp;quot; चाणक्य ने उत्तर दिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;राक्षस ? किन्तु वह तो आपका शत्रु है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;वह मेरा शत्रु नहीं है वरन्‌ वह तो धनानंद का स्वामीभक्त था, जो कि उसका सम्राट था। राक्षस की योग्यता में कोई कमी नहीं थी, सारी कमियाँ नंद में थीं। जब राक्षस तुम्हारा मंत्री बनेगा तो उसकी निष्ठा तुम्हारे प्रति रहेगी&amp;quot;&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त को चाणक्य ने समझा दिया लेकिन समस्या यह थी कि राक्षस लापता था। उसको खोजने के लिए चाणक्य ने उसके एक मित्र को सार्वजनिक फाँसी देने की मुनादी करवा दी। राक्षस स्वयं को रोक न सका और अपने मित्र को बचाने के लिए छद्म वेश से प्रत्यक्ष में आ गया। चाणक्य ने राक्षस के मित्र को इस शर्त पर जीवन दान दे दिया कि राक्षस को चंद्रगुप्त का महामंत्री बनना होगा। इसके बाद चाणक्य तक्षशिला चला गया।&lt;br /&gt;
        यदि दो मित्र एक ही कार्य क्षेत्र में प्रयास करते हैं। एक को सफलता मिलती है, एक को नहीं मिलती। निश्चित रूप से उनमें ईर्ष्या हो जायेगी और उनमें एक शत्रुता की भावना पनप जायेगी, जिसे अंग्रेज़ी में आजकल नये टर्मिनोलॉजी में 'फ़्रेनिमी' भी कहा जाता है। फ़्रेनिमी यानी कि फ़्रेंड भी एनिमी भी (दोस्त भी और दुश्मन भी)।&lt;br /&gt;
एक और उदाहरण-&lt;br /&gt;
        उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब और उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब दोनों ही शास्त्रीय गायन में पारंगत थे। दोनों में प्रतिस्पर्द्धा थी। एक प्रकार की अदावत थी। बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब अधिक प्रसिद्ध थे। उनकी आवाज़ में मधुरता अधिक थी। मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म में दिलीप कुमार और मधुबाला पर फ़िल्माये गए यादगार प्रेम-दृश्य में, बड़े ग़ुलाम अली की 'राग सोहनी' में गाई ठुमरी 'प्रेम जोगन बनके' ने उनकी प्रसिद्धि घर-घर में कर दी थी। अमीर ख़ाँ उतने ज़्यादा लोकप्रिय नहीं थे। अमीर ख़ाँ, बड़े ग़ुलाम अली के गायन में अक्सर कमियाँ निकालते रहते थे। &lt;br /&gt;
        ख़ुदा-न-ख़ास्ता हुआ ये कि बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, अमीर ख़ाँ से पहले इंतकाल फ़र्मा गये। कमाल की बात ये देखिए कि अमीर अली ख़ाँ साहब ने गाना ही बन्द कर दिया। लोगों ने उनसे कहा कि अब आप गाते नहीं हैं। आप अब संगीत सभाओं में नहीं जाते। उन्होंने कहा कि 'उसी' को सुनाने के लिए गाता था। अब वही नहीं रहा तो सुनाऊँ किसको। अब आप क्या कहेंगे इसे ? दो लोगों की दोस्ती या दो लोगों की दुश्मनी ?&lt;br /&gt;
        जो व्यक्ति दोस्त बनने के क़ाबिल नहीं है तो वह दुश्मन बनाने के क़ाबिल भी नहीं होता और जो दुश्मन बनाने के क़ाबिल नहीं है, वह दोस्त बनने के काबिल भी नहीं होता। जिस तरह दोस्तों का स्तर होता है, उसी तरह से दुश्मनों का भी स्तर होता है।&lt;br /&gt;
एक और उदाहरण-&lt;br /&gt;
        नेपोलियन बोनापार्ट का एक दुश्मन युद्ध में मारा गया। नेपोलियन ने कहा कि अब मैं वह नेपोलियन नहीं रहा, जो उस दुश्मन के जीवित रहते हुए था। उस दुश्मन के जीवित रहते हुए जिस नेपोलियन को आप जानते थे, वह इस नेपोलियन से बिल्कुल अलग था। हो सकता है कि उसके जीवित रहते हुए मुझे बिल्कुल भिन्न तरीक़े से जीवन जीना होता। अब जब वो इस दुनिया में नहीं है तो मैं बिल्कुल भिन्न तरीक़े से अपना जीवन जीऊँगा। मेरी राजनीतिक महत्वाकांक्षा, मेरे सफल होने की नीतियाँ, सब बदल गईं, भिन्न हो गईं।&lt;br /&gt;
अब ज़रा मान-अपमान की बात करें तो अपमान की घटनाओं से इतिहास बदले-बने हैं और प्राचीन कथाओं के प्रसिद्ध प्रसंग भी।&lt;br /&gt;
कुछ उदाहरण-&lt;br /&gt;
        कौरवों की सभा में कृष्ण का अपमान, द्रौपदी का चीर हरण, हस्तिनापुर की रंगशाला में कर्ण का अपमान, द्रुपद की सभा में द्रोणाचार्य का अपमान, जनक की सभा में अष्टावक्र का अपमान, धनानंद की सभा में चाणक्य का अपमान, अंग्रेज़ों द्वारा महात्मा गांधी का अपमान आदि। ये सभी वास्तविक अपमान थे और इनके प्रतिशोध भी लिए गए और अपमान करने वाले को दंडित भी किया गया।&lt;br /&gt;
        यदि हमें कोई सम्मान दे तो अच्छा लगता है लेकिन कोई मूर्ख, धूर्त, विक्षिप्त अथवा लालची व्यक्ति हमें  सम्मानित करता है तो हम इस सम्मान को महत्त्व नहीं देते। क्यों...? क्योंकि उस व्यक्ति को हम इस योग्य नहीं समझते कि हम उसका सम्मान स्वीकार करें। ठीक इसी तरह यदि कोई महत्वहीन व्यक्ति हमारा अपमान करे तब भी हमको यह नहीं समझना चाहिए कि हमारा अपमान हुआ।&lt;br /&gt;
धनानंद की राजसभा में विष्णुगुप्त (चाणक्य) का अपमान इतिहास और कथाओं में सम्भवत: अपमान से संबंधित सबसे अधिक प्रसिद्ध घटना है। आपको क्या लगता है चाणक्य का अपमान कोई पहली बार हुआ था ? ऐसा नहीं है। एक अनाथ और ग़रीब बालक किन-किन अपमानों को झेलकर बड़ा हुआ होगा ? उनका आभास आसानी से नहीं किया जा सकता है। किन्तु चाणक्य ने उन छोटे और महत्त्वहीन अपमानों की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। जब मगध के सम्राट ने भरी सभा में उसका अनादर किया, तब चाणक्य ने इसे अपना अपमान माना और कहते हैं कि प्रतिज्ञा की-&lt;br /&gt;
&amp;quot;धनानंद ! जब तक मैं इस अपमान का दंड तुझे नहीं देता, तब तक मैं अपनी शिखा को खुली ही रखूँगा। मेरी शिखा में गांठ तभी लगेगी, जब मैं, चणक पुत्र विष्णगुप्त, तेरा और तेरे वंश का समूल नाश कर दूँगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        जो हमें सम्मानित करे, उस व्यक्ति का कुछ स्तर अवश्य होना चाहिए। हमें एहसास होना चाहिए कि हम सम्मानित हुए। इसी तरह जो हमें अपमानित कर रहा है, उसका भी कुछ स्तर ऐसा होना चाहिए कि हमें एहसास हो कि वह हमें अपमानित कर रहा है। जो व्यक्ति 'किसी' के भी द्वारा अपमान किए जाने से अपमानित हो जाय उस व्यक्ति का कोई स्तर नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक कहावत-&lt;br /&gt;
&amp;quot;A gentleman never insults anyone unintentionally&amp;quot; [भद्रजन, किसी का भी अपमान अनभिप्रेत (अनजाने) नहीं करते]। -'ऑस्कर वाइल्ड' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1571</id>
		<title>दोस्ती-दुश्मनी और मान-अपमान -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1571"/>
				<updated>2017-05-21T13:52:11Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;दोस्ती-दुश्मनी और मान-अपमान&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Court-of-nand.jpg|राजा नन्द का दरबार|border|right|400px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        न जाने कितनी पुरानी बात है कि न जाने किस राज्य में वीर नाम का एक युवक रहता था। एक बार वीर को दूसरे राज्य में किसी काम से जाना पड़ा और दुर्भाग्य से वीर वहाँ एक झूठे अपराध में फँस गया। गवाहों की ग़ैर मौजूदगी के कारण राजा ने उसे फाँसी का हुक़्म सुना दिया और मुनादी करवा दी गई-&lt;br /&gt;
&amp;quot;हर ख़ास-ओ-आम को सूचित किया जाता है कि अपराधी वीर को ठीक एक महीने बाद...याने पूर्णमासी के दिन... हमारे राज्य की प्रथा के अनुसार... प्रजा के सामने... सार्वजनिक रूप से फाँसी पर लटकाया जाएगाऽऽऽ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        जेल में बंद वीर बहुत परेशान था। उसे परेशान देखकर पहरेदार ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;फाँसी की सज़ा से तुम परेशान हो गए हो। अब मरना तो है ही... आराम से खाओ-पीओ और मस्त रहो&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुझे अपने मरने की चिन्ता नहीं है। मेरी परेशानी कुछ और है... क्या मुझे जेल से कुछ दिन की छुट्टी मिल सकती है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जेल से छुट्टी ? ये कोई नौकरी है क्या, जो छुट्टी मिल जाएगी?... लेकिन बात क्या है, कहाँ जाना है तुम्हें छुट्टी लेकर ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरी माँ अन्धी है और घर पर अकेली है। मुझे उसके शेष जीवन का पूरा प्रबंध करने के लिए जाना है जिससे मेरे मरने के बाद उसे कोई कष्ट न हो। उसका सारा प्रबंध करके मैं एक महीने के भीतर ही लौट आऊँगा।... क्या कोई तरीक़ा... क्या कोई क़ानून ऐसा नहीं है कि मुझे कुछ दिनों की छुट्टी मिल जाय ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;देखो भाई ! तुम पढ़े-लिखे और सज्जन आदमी मालूम होते हो... तुम्हारी समस्या को मैं राज्य के मंत्री तक पहुँचवा दूँगा... बस इतना ही मैं तुम्हारे लिए कर सकता हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        अगले दिन पहरेदार ने बताया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;सिर्फ़ एक तरीक़ा है कि तुम छुट्टी जा सको...?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;वो क्या ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अगर तुम्हारी जगह कोई और यहाँ जेल में बन्द हो जाय... जिससे कि अगर तुम नहीं लौटे तो तुम्हारी जगह उसे फाँसी दे दी जाय...सिर्फ़ यही तरीक़ा है... लेकिन कभी ऐसा हुआ नहीं है क्योंकि कोई भी किसी की फाँसी की ज़मानत थोड़े ही देता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप मेरे गाँव से मेरे दोस्त धीर को बुलवा दीजिए... मेहरबानी करके जल्दी उसे बुलवा दें&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;पागल हो क्या ! कोई दोस्त-वोस्त नहीं होता ऐसे मौक़े के लिए...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप उसे ख़बर तो करवाइए...&amp;quot;&lt;br /&gt;
        वीर और धीर की दोस्ती सारे इलाक़े में मशहूर थी। लोग उनकी दोस्ती की क़समें खाया करते थे। जैसे ही धीर को ख़बर मिली वो भागा-भागा आया और वीर को जेल से छुट्टी मिल गई। &lt;br /&gt;
        धीरे-धीरे दिन गुज़रने लगे, वीर नहीं लौटा और न ही उसकी कोई ख़बर आई। धीर के चेहरे पर कोई चिन्ता के भाव नहीं थे बल्कि वह तो रोज़ाना ख़ूब कसरत करता और जमकर खाना खाता। पहरेदार उससे कहते कि वीर अब वापस नहीं आएगा तो धीर हँसकर टाल जाता। इस तरह फाँसी में केवल एक दिन शेष रह गया, तब सभी ने धीर को समझाया कि उसे मूर्ख बनाया गया है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;आप लोग नहीं जानते वीर को... यदि वह जीवित है तो निश्चित लौटेगा... चाहे सूर्य पूरब के बजाय पच्छिम से उगे... लेकिन वीर अवश्य लौटेगा। एक बात और है, जिसका पता आप लोगों को नहीं है। मैंने उसे यह कहकर भेजा है कि वह कभी वापस न लौटे और मुझे ही फाँसी लगने दे... मगर मैं जानता हूँ उसे, वो नालायक़ ज़रूर लौटेगा, मेरी बात मानेगा ही नहीं !&amp;quot;&lt;br /&gt;
        जब सबने यह सुना कि ख़ुद धीर ने ही वीर से लौटने के लिए मना कर दिया है तो राजा को सूचना दे दी गई।&lt;br /&gt;
पूर्णमासी आ गई और फाँसी का दिन भी...। अपार भीड़ एकत्र हो गई, इस विचित्र फाँसी को देखने के लिए। जिसमें किसी के बदले में कोई और फाँसी पर चढ़ रहा था। स्वयं राजा भी वहाँ उपस्थित था। फाँसी लगने ही वाली थी कि वहाँ वीर पहुँच गया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;रोकिए फाँसी ! फाँसी तो मुझको दी जानी है... मैं आ गया हूँ अब... मुझे दीजिए फाँसी&amp;quot; - वीर बोला,&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं ये समय पर नहीं लौट पाया है, इसलिए फाँसी तो अब मुझे लगेगी... मुझे !&amp;quot; धीर चिल्लाया,&lt;br /&gt;
        इस तरह दोनों झगड़ने लगे। जनता के साथ-साथ राजा को भी बहुत आश्चर्य हो रहा था कि ये दोनों दोस्त फाँसी पर चढ़ने के लिए लड़-झगड़ रहे हैं ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन तुम इतनी देर से क्यों लौटे ?&amp;quot; राजा ने पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज ! मैंने तो अपनी माँ के लिए सारा इन्तज़ाम एक सप्ताह में ही कर दिया था और उसे समझा भी दिया था कि अब उसका ध्यान धीर ही रखेगा। जब मैं वापस लौट रहा था तो लुटेरों से मेरी मुठभेड़ हो गई। मैं 15 दिन घायल और बेसुध पड़ा रहा। जैसे ही मुझे होश आया, मैं भागा-भागा यहाँ आया हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राजा ने कहा &amp;quot;अब तो तुम दोनों को ही सज़ा दी जाएगी... लेकिन वो फाँसी नहीं बल्कि हमारे राजदरबार में नौकरी करने की सज़ा होगी... तुम दोनों बेमिसाल दोस्त हो और ईमानदार भी... आज से तुम दोनों हमारे राजदरबार की शोभा बढ़ाओगे&amp;quot;&lt;br /&gt;
        ये तो थी मित्रता की एक पुरानी कहानी, मित्रता और शत्रुता का आपसी रिश्ता बहुत गहरा है। मित्रता, बराबर वालों में होती है और इस 'बराबर' का संबंध पैसे की बराबरी से नहीं है, यह बराबरी किसी और ही धरातल पर होती है। इसी कारण हमारे 'स्तर' की पहचान हमारे दोस्तों से होती है। यही बात शत्रुता पर भी लागू होती है। हमारे शत्रु जिस स्तर के हैं, हमारा भी स्तर वही होता है।&lt;br /&gt;
        यूनान के सम्राट सिकंदर से किसी ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आपके बारे में सुना है कि आप बहुत तेज़ दौड़ सकते हैं। किसी दौड़ में आप हिस्सा क्यों नहीं लेते ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जब सम्राटों की दौड़ होगी तो सिकंदर भी दौड़ेगा।&amp;quot; सिकंदर का उत्तर था।&lt;br /&gt;
        इसी तरह 'नेपोलियन बोनापार्ट' से एक पहलवान ने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;आपकी बहादुरी मशहूर है, मुझसे कुश्ती लड़कर मुझे हरा कर दिखाइए !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुमसे मेरा अंगरक्षक लड़ेगा... जो तुमसे दोगुना ताक़तवर है। उसके सामने तुम एक मिनिट भी नहीं टिक पाओगे। मुझे अपनी बहादुरी के लिए 'तुम्हारे' प्रमाणपत्र की नहीं बल्कि यूरोप की जनता के विश्वास की ज़रूरत है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        मित्रता का कोई 'प्रकार' नहीं होता कि इस प्रकार की मित्रता या उस प्रकार की, जबकि शत्रुता के बहुत सारे 'प्रकार' हैं। जैसे- राजनीतिक शत्रुता, व्यापारिक शत्रुता, ईर्ष्या-जन्य शत्रुता आदि कई तरह की शत्रुता हो सकती हैं। शत्रुता के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि शत्रुता कम हो गई या बढ़ गई। मित्रता कम या अधिक नहीं होती, या तो होती है या नहीं होती। जब हम यह कहते हैं &amp;quot;उससे हमारी उतनी दोस्ती अब नहीं रही...&amp;quot; तो हम सही नहीं कह रहे होते। वास्तव में दोस्ती समाप्त हो चुकी होती है। इसी तरह 'गहरी मित्रता' जैसी कोई स्थिति नहीं होती। दोस्ती और दुश्मनी में एक फ़र्क़ यह भी होता कि दोस्ती 'हो' जाती है और दुश्मनी 'की' जाती है।&lt;br /&gt;
        मित्रता और शत्रुता के संबंध में [[गीता]] क्या कहती है ?&lt;br /&gt;
गीता में दो श्लोक है-&lt;br /&gt;
सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।&lt;br /&gt;
शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: संग्ङविवर्जित: ।। (गीता अध्याय-12 श्लोक-18]])&lt;br /&gt;
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: ।&lt;br /&gt;
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते ।। (गीता अध्याय-14 श्लोक-25]])&lt;br /&gt;
        सामान्य भावार्थ को ही समझें तो इन श्लोकों का मतलब है कि बुद्धिमान के लिए न कोई मित्र है और न कोई शत्रु है। न कोई मान है, न कोई अपमान है।&lt;br /&gt;
ऐसा कैसे हो सकता है कि न कोई मित्र है और न कोई शत्रु है ? न कोई मान है, न कोई अपमान है ! मित्र तो मित्र होता है, शत्रु तो शत्रु होता है। जो मित्र है, वह शत्रु कैसे हो सकता है और जो शत्रु है, वह मित्र कैसे हो सकता है ? इसी तरह यदि कोई हमें अपमानित करता है तो बुरा लगता है। कोई सम्मान देता है तो अच्छा लगता है। ये कैसे सम्भव है कि न कोई अपमान है और न कोई मान है। गीता में इस श्लोक का अर्थ क्या है ?&lt;br /&gt;
एक उदाहरण देखें-&lt;br /&gt;
        चाणक्य और राक्षस की शत्रुता विश्वविख्यात है। चंद्रगुप्त के सम्राट बनने के बाद चाणक्य ने महामात्य के पद से सेवा निवृत्त होकर वापस तक्षशिला जाकर अध्यापन कार्य करना चाहा तो चंद्रगुप्त ने पूछा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;अमात्य ! आपकी अनुपस्थिति में आपका कार्य कौन संभालेगा ? मगध का राज्य, चाणक्य जैसे महामात्य के बिना कैसे चल पाएगा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;राक्षस बनेगा महामात्य ! उससे अधिक योग्य और निष्ठावान कोई दूसरा नहीं है।&amp;quot; चाणक्य ने उत्तर दिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;राक्षस ? किन्तु वह तो आपका शत्रु है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;वह मेरा शत्रु नहीं है वरन्‌ वह तो धनानंद का स्वामीभक्त था, जो कि उसका सम्राट था। राक्षस की योग्यता में कोई कमी नहीं थी, सारी कमियाँ नंद में थीं। जब राक्षस तुम्हारा मंत्री बनेगा तो उसकी निष्ठा तुम्हारे प्रति रहेगी&amp;quot;&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त को चाणक्य ने समझा दिया लेकिन समस्या यह थी कि राक्षस लापता था। उसको खोजने के लिए चाणक्य ने उसके एक मित्र को सार्वजनिक फाँसी देने की मुनादी करवा दी। राक्षस स्वयं को रोक न सका और अपने मित्र को बचाने के लिए छद्म वेश से प्रत्यक्ष में आ गया। चाणक्य ने राक्षस के मित्र को इस शर्त पर जीवन दान दे दिया कि राक्षस को चंद्रगुप्त का महामंत्री बनना होगा। इसके बाद चाणक्य तक्षशिला चला गया।&lt;br /&gt;
        यदि दो मित्र एक ही कार्य क्षेत्र में प्रयास करते हैं। एक को सफलता मिलती है, एक को नहीं मिलती। निश्चित रूप से उनमें ईर्ष्या हो जायेगी और उनमें एक शत्रुता की भावना पनप जायेगी, जिसे अंग्रेज़ी में आजकल नये टर्मिनोलॉजी में 'फ़्रेनिमी' भी कहा जाता है। फ़्रेनिमी यानी कि फ़्रेंड भी एनिमी भी (दोस्त भी और दुश्मन भी)।&lt;br /&gt;
एक और उदाहरण-&lt;br /&gt;
        उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब और उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब दोनों ही शास्त्रीय गायन में पारंगत थे। दोनों में प्रतिस्पर्द्धा थी। एक प्रकार की अदावत थी। बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब अधिक प्रसिद्ध थे। उनकी आवाज़ में मधुरता अधिक थी। मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म में दिलीप कुमार और मधुबाला पर फ़िल्माये गए यादगार प्रेम-दृश्य में, बड़े ग़ुलाम अली की 'राग सोहनी' में गाई ठुमरी 'प्रेम जोगन बनके' ने उनकी प्रसिद्धि घर-घर में कर दी थी। अमीर ख़ाँ उतने ज़्यादा लोकप्रिय नहीं थे। अमीर ख़ाँ, बड़े ग़ुलाम अली के गायन में अक्सर कमियाँ निकालते रहते थे। &lt;br /&gt;
        ख़ुदा-न-ख़ास्ता हुआ ये कि बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, अमीर ख़ाँ से पहले इंतकाल फ़र्मा गये। कमाल की बात ये देखिए कि अमीर अली ख़ाँ साहब ने गाना ही बन्द कर दिया। लोगों ने उनसे कहा कि अब आप गाते नहीं हैं। आप अब संगीत सभाओं में नहीं जाते। उन्होंने कहा कि 'उसी' को सुनाने के लिए गाता था। अब वही नहीं रहा तो सुनाऊँ किसको। अब आप क्या कहेंगे इसे ? दो लोगों की दोस्ती या दो लोगों की दुश्मनी ?&lt;br /&gt;
        जो व्यक्ति दोस्त बनने के क़ाबिल नहीं है तो वह दुश्मन बनाने के क़ाबिल भी नहीं होता और जो दुश्मन बनाने के क़ाबिल नहीं है, वह दोस्त बनने के काबिल भी नहीं होता। जिस तरह दोस्तों का स्तर होता है, उसी तरह से दुश्मनों का भी स्तर होता है।&lt;br /&gt;
एक और उदाहरण-&lt;br /&gt;
        नेपोलियन बोनापार्ट का एक दुश्मन युद्ध में मारा गया। नेपोलियन ने कहा कि अब मैं वह नेपोलियन नहीं रहा, जो उस दुश्मन के जीवित रहते हुए था। उस दुश्मन के जीवित रहते हुए जिस नेपोलियन को आप जानते थे, वह इस नेपोलियन से बिल्कुल अलग था। हो सकता है कि उसके जीवित रहते हुए मुझे बिल्कुल भिन्न तरीक़े से जीवन जीना होता। अब जब वो इस दुनिया में नहीं है तो मैं बिल्कुल भिन्न तरीक़े से अपना जीवन जीऊँगा। मेरी राजनीतिक महत्वाकांक्षा, मेरे सफल होने की नीतियाँ, सब बदल गईं, भिन्न हो गईं।&lt;br /&gt;
अब ज़रा मान-अपमान की बात करें तो अपमान की घटनाओं से इतिहास बदले-बने हैं और प्राचीन कथाओं के प्रसिद्ध प्रसंग भी।&lt;br /&gt;
कुछ उदाहरण-&lt;br /&gt;
        कौरवों की सभा में कृष्ण का अपमान, द्रौपदी का चीर हरण, हस्तिनापुर की रंगशाला में कर्ण का अपमान, द्रुपद की सभा में द्रोणाचार्य का अपमान, जनक की सभा में अष्टावक्र का अपमान, धनानंद की सभा में चाणक्य का अपमान, अंग्रेज़ों द्वारा महात्मा गांधी का अपमान आदि। ये सभी वास्तविक अपमान थे और इनके प्रतिशोध भी लिए गए और अपमान करने वाले को दंडित भी किया गया।&lt;br /&gt;
        यदि हमें कोई सम्मान दे तो अच्छा लगता है लेकिन कोई मूर्ख, धूर्त, विक्षिप्त अथवा लालची व्यक्ति हमें  सम्मानित करता है तो हम इस सम्मान को महत्त्व नहीं देते। क्यों...? क्योंकि उस व्यक्ति को हम इस योग्य नहीं समझते कि हम उसका सम्मान स्वीकार करें। ठीक इसी तरह यदि कोई महत्वहीन व्यक्ति हमारा अपमान करे तब भी हमको यह नहीं समझना चाहिए कि हमारा अपमान हुआ।&lt;br /&gt;
धनानंद की राजसभा में विष्णुगुप्त (चाणक्य) का अपमान इतिहास और कथाओं में सम्भवत: अपमान से संबंधित सबसे अधिक प्रसिद्ध घटना है। आपको क्या लगता है चाणक्य का अपमान कोई पहली बार हुआ था ? ऐसा नहीं है। एक अनाथ और ग़रीब बालक किन-किन अपमानों को झेलकर बड़ा हुआ होगा ? उनका आभास आसानी से नहीं किया जा सकता है। किन्तु चाणक्य ने उन छोटे और महत्त्वहीन अपमानों की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। जब मगध के सम्राट ने भरी सभा में उसका अनादर किया, तब चाणक्य ने इसे अपना अपमान माना और कहते हैं कि प्रतिज्ञा की-&lt;br /&gt;
&amp;quot;धनानंद ! जब तक मैं इस अपमान का दंड तुझे नहीं देता, तब तक मैं अपनी शिखा को खुली ही रखूँगा। मेरी शिखा में गांठ तभी लगेगी, जब मैं, चणक पुत्र विष्णगुप्त, तेरा और तेरे वंश का समूल नाश कर दूँगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        जो हमें सम्मानित करे, उस व्यक्ति का कुछ स्तर अवश्य होना चाहिए। हमें एहसास होना चाहिए कि हम सम्मानित हुए। इसी तरह जो हमें अपमानित कर रहा है, उसका भी कुछ स्तर ऐसा होना चाहिए कि हमें एहसास हो कि वह हमें अपमानित कर रहा है। जो व्यक्ति 'किसी' के भी द्वारा अपमान किए जाने से अपमानित हो जाय उस व्यक्ति का कोई स्तर नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक कहावत-&lt;br /&gt;
&amp;quot;A gentleman never insults anyone unintentionally&amp;quot; [भद्रजन, किसी का भी अपमान अनभिप्रेत (अनजाने) नहीं करते]। -'ऑस्कर वाइल्ड' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1570</id>
		<title>काम की खुन्दक -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1570"/>
				<updated>2017-05-21T13:48:32Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;काम की खुन्दक&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pyaz-01.jpg|right|250px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये प्याज़ कमबख़्त ऐसी चीज़ है जो ज़्यादा नहीं खाई जा सकती... और हम तो भैया प्याज़ का एक टुकड़ा भी नहीं खा सकते !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सही कह रहे हैं पंडिज्जी ! आप तो ब्राह्मण हैं इसलिए नहीं खाते लेकिन हमको भी प्याज़ अच्छी नहीं लगती, पर क्या करें दुकान तो चलानी है। सब चीज़ बेचते हैं तो प्याज़ भी बेचनी पड़ती है।&amp;quot; लाला ने पंडित जी से कहा।&lt;br /&gt;
पास ही बैठा छोटे पहलवान इनकी बातें सुन रहा था। कुछ दिनों से छोटे पहलवान का मन उचाट हो रहा था। उसने बिना सोचे समझे ही कह दिया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;प्याज़ खाने में क्या है कितनी भी खा जाओ। आप लोग तो बिना बात प्याज़ का हौव्वा बना रहे हैं।&amp;quot; छोटे ने खुन्दक में कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छा ! तो तू कितनी खा जाएगा ?&amp;quot; पंडित जी बोले&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं... मेरा क्या है मैं तो सौ भी खा जाऊँगा&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या ? सौ प्याज़ ?... अच्छा तो ठीक है फिर खा ले सौ प्याज़, अगर तूने सौ प्याज़ खा लीं तो तुझे सौ रुपये इनाम।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन अगर नहीं खा पाया तो...?&amp;quot; लाला ने पंडित जी से पूछा लेकिन छोटे ने बीच में ही बात काट कर कहा&lt;br /&gt;
&amp;quot;तो फिर सौ जूते मारना मेरी चाँद में... अगर सौ प्याज़ ना खाऊँ तो...&amp;quot;&lt;br /&gt;
पंडित ने सौ प्याज़ गिनकर छोटे के सामने रख दीं और छोटे ने खाना शुरू कर दिया। लगातार पाँच प्याज़ खाने से छोटे की आँखों से आँसू बहने लगे। पानी पीकर उसने पाँच प्याज़ और खालीं। अब हालत ज़्यादा ख़राब हो गई। पहलवान ने सोचा कि जूते खाना ज़्यादा आसान रहेगा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;पंडिज्जी ! मुझसे प्याज़ नहीं खाई जा रही, आप जूते ही मार लो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
पंडित जी जूतों के मामले में काफ़ी प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण रखते थे। विभिन्न मौसमों का सामना करते-करते जूतों का भार और आकार किसी भी जीव-वैज्ञानिक के लिए वैसी ही चुनौती बन सकता था जैसी कि उसे हज़ारों वर्ष पहले लुप्त हो चुके भारी भरकम आदि मानव 'नीएन्डरटल' के जूते कहीं खुदाई में मिल जाने पर मिलती।&lt;br /&gt;
&amp;quot;पंडिज्जी धीरे...! पंडिज्जी धीरे...!&amp;quot; जूते के प्रत्येक प्रहार पर छोटे की कराह निकल जाती। साथ ही छोटे के सिर पर जूता पड़ते ही पहलवान की आँखों में तरह-तरह के चमकीले रंगों की रोशनी डिस्को लाइट जैसी भी दिख जाती। &lt;br /&gt;
बीस जूते खाकर छोटे बोला &amp;quot;पंडिज्जी रुक जाओ, जूतों से अच्छी तो प्याज़ पड़ रही थी। मैं प्याज़ ही खाऊँगा।&amp;quot; प्याज़ खाने और जूते खाने का सिलसिला काफ़ी देर चलता रहा। कुल-मिलाकर हुआ ये कि छोटे ने अस्सी प्याज़ ख़ाली और जूते पूरे सौ पड़े और एक रुपया भी इनाम मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता था। &lt;br /&gt;
        दरअसल छोटे पहलवान की असमंजस वाली मन: स्थिति हम में से बहुतों के साथ घटती रहती है। अपनी वर्तमान स्थिति, नौकरी, पढ़ाई, स्थान, गृहस्थी, जीवन साथी आदि जैसे कई मुद्दे हैं, जिन पर हम असंतुष्ट रहते हैं और जिनका विश्लेषण और मूल्यांकन भी नहीं करना चाहते। परिवर्तन-शीलता मनुष्य का सहज स्वभाव है, इसलिए किसी भी स्थान, व्यक्ति या कार्य से ऊब हो जाना एक सामान्य प्रक्रिया है और यही प्रक्रिया हमारी असंतुष्टि का कारण बनती है। &lt;br /&gt;
        मनुष्य के इस स्वभाव पर शोध होते रहते हैं, जैसे कि लगातार इक्कीस मिनट तक कोई एक ही चीज़ को सुनते या देखते रहने से हमारा ध्यान उसकी ओर से हटने लगता है। &lt;br /&gt;
इसी बात को ध्यान में रखकर टेलीविज़न धारावाहिक इक्कीस मिनट के ही बनाये जाते हैं। स्कूल, कॉलजों में एक विषय के लिए जो समय सामान्यत: रखा जाता है वो 45 मिनट का होता है। पुराने वक्त में इस 45 मिनट के 'पीरियड' को लगभग 20 मिनट बाद रुककर 5 मिनट का एक अंतराल रखा जाता था। इस तरह 45 मिनट के एक पीरीयड में 3 से 5 मिनट का मंध्यातर भी होता था जिसका चलन अब नहीं है। फीचर फ़िल्मों में भी बीच-बीच में गाने डाले जाने का कारण बीस मिनट से अधिक चलने वाली समरसता को भंग करने के लिए होता था और आज भी इन्हीं आँकड़ों का ध्यान रखकर व्याख्यान, धारावाहिक, फ़िल्म, नाटक आदि तैयार किये जाते हैं। &lt;br /&gt;
        महान दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति से किसी ने सुख से जीवन बिताने का तरीक़ा पूछा तो उन्होंने बताया कि जो भी काम हम करें उसे पूरे मन से करें तो हम पूरे जीवन सुखी और आनंदित रह सकते हैं। कृष्णमूर्ति के कथन में भी एक 'लेकिन' लगाया जा सकता है... लेकिन ये होगा कैसे ?। ऐसा कैसे हो कि जो भी हम कर रहे हैं उसे हम पूरे मन से करें ? एक तरीक़ा है इसका भी, वो ये कि आप काम करते हुए ख़ुद पर 'निगाह' रखें... अपने आप को अपनी ही निगरानी में रखें... यह निगरानी आपके काम का मूल्याँकन भी करती चलेगी। इससे अपने काम से ऊब होने की संभावना कम हो जाती है। अपने कार्य को लगन के साथ करने की बात तो सब कहते हैं लेकिन इसका तरीक़ा क्या है ? कैसे पैदा होती है ये लगन ? &lt;br /&gt;
        दिल्ली में एक लड़का मेरे बाल काटता था। मैं अक्सर उसी से बाल कटवाता था। बाल काटने की प्रक्रिया में वो मुझसे कुछ न कुछ पूछता भी रहता था। एक बार उसने पूछा कि मैं कैसे बड़ा आदमी बन सकता हूँ ? मैंने कहा कि जो भी तुमसे बाल कटवाने आए तुम उसे अमिताभ बच्चन या सचिन तेन्दुलकर समझो और बाल काटो, बस और कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। &lt;br /&gt;
        इसके बाद मैं बहुत समय तक वहाँ नहीं जा पाया। शायद दो-तीन साल गुज़र गए। एक बार जब मैं गया तो वहाँ का नज़ारा बदला हुआ था। वो लड़का मालिक की कुर्सी पर बैठा था। पूछने पर पता चला कि उस सैलून का ठेका अब होटल वालों ने उसी को दे दिया है। लड़का भी ख़ासा मोटा हो गया था और क़ीमती कपड़े पहने हुए था। इस सब का राज़ पूछने पर उसने बताया कि उसने मेरी बात गांठ बाँध ली थी और एक साल के अंदर ही बदलाव सामने आने लगा।&lt;br /&gt;
इसके बाद वो इससे ज़्यादा तरक़्क़ी नहीं कर पाया क्योंकि एक स्तर तक सफल होने के बाद ख़ुद को उसने 'बड़ा आदमी' मान लिया और लापरवाह हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82_%E0%A4%A4%E0%A5%8B_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1569</id>
		<title>मैं तो एक भूत हूँ -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82_%E0%A4%A4%E0%A5%8B_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1569"/>
				<updated>2017-05-21T13:47:06Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;मैं तो एक भूत हूँ&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Ghost.jpg|right|160px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन मैं तो बिल्कुल नया भूत हूँ। कल ही तो मरा हूँ। सारा दिन कहाँ काटूँगा, कहाँ सोऊँगा, क्या खाऊँगा ?&amp;quot; भूत ने भूतिस्तान के मैनेजर से पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अभी-अभी मरे हो...नये-नये भूत बने हो... और एक दम से रहने के लिए फ़्लॅट चाहिए ? रूल तो रूल है... सबके लिए बराबर है तुमको बताया ना ! पहले 10 लोगों को डराओ तो खटिया मिलेगी सोने को... उसके बाद 25 लोगों को डरा लोगे तो एक कमरा मिल जायेगा इसी तरह 100 पर फ़्लॅट और 500 पर बंगला और नौकर-चाकर भी... समझ गये !... और खाने का क्या रोना रो रहे हो ?... भूत लोग, खाना-वाना नहीं खाते हैं... अरे फ़िल्में नहीं देखते थे... क्या कभी देखा था किसी भूत को खाना खाते ?&amp;quot; मैनेजर ने समझाया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन सर जी ! ये तो बताइये कि लोगों को डराते कैसे हैं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कमाल के भूत हो यार तुम भी... अरे ! इंसान को डराने में क्या है, किसी को अकेला देखो और डरा दो बस... तुमने ग़ायब होने की... प्रकट होने की... ट्रांसपेरेन्ट होने की सारी ट्रेनिंग कर ली हैं ना ?... अगर नहीं की तो सामने शीशा लगा है, कर लो&amp;quot;&lt;br /&gt;
भूत ने धरती पर आकर डराने के लिए 'क्लाइन्ट' देखना शुरू कर दिया... सड़क के किनारे एक बुज़ुर्ग महिला दिखी‌-&lt;br /&gt;
&amp;quot;वाह ! अकेली आंटी, सुनसान सड़क, रात का वक़्त, मज़ा आ जाएगा डराने में...&amp;quot; भूत ने सोचा... और अचानक उस औरत के सामने वैसे ही प्रकट हो गया जैसे कि धार्मिक सीरियलों में देवता और राक्षस प्रकट हो जाते हैं...&lt;br /&gt;
लेकिन ये क्या ?... उस औरत पर तो कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा...&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए ! हॅलो आंटी जी ! डर नहीं लगता क्या ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लगता है बेटा ! बहुत लगता है कि कहीं कोई कार टक्कर न मार दे। इसीलिए तो इन्तज़ार कर रही थी कि बूढ़ी अन्धी को कोई रास्ता पार करा दे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओहो ! तो आपको दिखता नहीं है... नो प्रोब्लम ! मैं आपको रास्ता पार करा देता हूँ&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जीते रहो बेटा ! जुग-जुग जिओ...!&amp;quot; &lt;br /&gt;
किसी को डराने की पहली कोशिश बेकार गई। बुज़ुर्ग महिला को रास्ता पार कराने के बाद भूत पास ही एक कोठी में घुस गया। कोठी पर जो नाम लिखा था उससे अंदाज़ा लगा कि कोई सीनियर एडवोकेट है। अंदर देखा तो अपने ऑफ़िस में वकील साहब काम कर रहे थे।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे ! ये तो पूरी कोठी में अकेला है। इसे तो डरा-डरा के मार लूँगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
वकील के सामने भूत अचानक प्रकट हो कर कुर्सी पर सामने बैठ गया। वकील साहब एक फ़ाइल में खोए हुए थे उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। भूत ने खिसिया कर हल्के से मेज़ थपथपाई।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर... ! सर... !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हाँ बोलो ! क्या बात है क्या केस है तुम्हारा?&amp;quot; वकील साहब ने सिर उठा कर पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर ! आपकी कोठी चारों तरफ़ से बंद है, फिर भी मैं अंदर आ गया, बताइये कैसे ?&amp;quot; भूत ने सोचा कि पहले ख़ुद को 'असली' भूत साबित करना ज़रूरी है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सिर्फ़ यही पूछने के लिए तुम मेरे पास आए हो ? डोन्ट वेस्ट माइ टाइम। अपना केस बताओ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन मैं भूत हूँ असली वाला भूत। मरने के बाद आदमी भूत बनता है ना वो वाला भूत...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मरने के बाद ? यानी तुम्हारा 'मर्डर केस' है। ओ.के.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं-नहीं मैं तो एक्सीडेन्ट में मरा था...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छा... तो कम्पनसेशन का मामला है, मुआवज़ा चाहिए तुम्हें...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर मेरी बात तो सुनिए ! मुझे कोई केस नहीं लड़ना है, मैं तो आपको बताना चाहता हूँ कि मैं एक भूत हूँ और....&amp;quot;&lt;br /&gt;
वकील ने बात काटी...&lt;br /&gt;
&amp;quot;शटअप ! रात को दस बजे तुम मुझे ये बकवास सुनाने आए हो कि तुम भूत हो...तुमको कोई केस तो करना नहीं है फ़ालतू मेरा वक़्त क्यों बरबाद कर रहे हो&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर मैं ग़ायब हो सकता हूँ... आप विश्वास तो कीजिए...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम यहाँ ग़ायब होने आये हो ?... जब ग़ायब ही होना था तो आये ही क्यों ? तुम्हें मेरा ही घर मिला था इस जादूगरी को दिखाने के लिए... और वो भी रात के दस बजे ? अपना, ये ग़ायब होने का तमाशा मुझे ही क्यों दिखाना चाहते हो जाकर बच्चों को एन्टरटेन करो... अब जाओ भी...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर मैं साबित करना चाहता हूँ कि मैं भूत हूँ&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुमको जो भी साबित करना है अदालत में करना... यहाँ मेरे घर में साबित करके क्या होगा... अब जाओ और मुझे काम करने दो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दूसरा अनुभव पहले से भी ज़्यादा बेकार निकला। भूत रुँआसा होकर वकील के घर से चला आया और सड़क पर चलती एक कार में घुस गया। कार एक अधेड़ महिला चला रही थी।&lt;br /&gt;
&amp;quot;हा हा हा हा! मैं आप की कार में कैसे आया ? &amp;quot; भूत ने पिछली सीट पर बैठ कर बनावटी हँसी के साथ कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्योंकि मैं, आज पार्किंग में अपनी कार लॉक करना भूल गई और इसमें आप छुप के बैठ गये... ख़ैर छोड़िए... आप ही बताइए... ये तो आपको ही पता होगा... क्योंकि कार में घुसे तो आप हैं ना !&amp;quot; महिला शांत भाव से बोली&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं एक भूत हूँ, सचमुच का जीता-जागता डरावना भूत हा हा हा हा&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छाऽऽऽ तो आप भूत हैं ? तो भूत जी ! थोड़ा इत्मीनान से शांत बैठिए, मैं ज़रा ड्राइव कर रही हूँ ओ.के, वैसे आपका नाम क्या है ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरा कोई नाम नहीं है। मैं भूत हूँ और आपको डराना चाहता हूँ। आपको डरना ही होगा&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ठीक है मैं प्रॉमिस करती हूँ कि मैं आपसे डरूँगी लेकिन पहले हम वहाँ पहुँच जायें जहाँ जा रहे हैं&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हम कहाँ जा रहे हैं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हम मेन्टल हॉस्पीटल जा रहे हैं। आज मेरी नाइट शिफ़्ट है, मैं डॉक्टर हूँ... साइकायट्रिस्ट हूँ। हॉस्पीटल पहुँच कर सबसे पहले आपसे ख़ूऽऽऽब डरूँगी जिससे आपको ऐसा ना लगे कि आप भूत नहीं हैं, ओ.के.। नाउ काम डाउन, बी रिलेक्स्ड, टेक डीप ब्रेद। लंबी-लंबी सांस लीजिए और आँखें बन्द कर लीजिए। जस्ट रिलेक्स... मैं आपके लिए अच्छा सा म्यूज़िक लगाती हूँ...&amp;quot; &lt;br /&gt;
भूत, दुखी होकर कार से ग़ायब हो गया। अगली रात शुरू होते ही वह एक कॉलोनी के पार्क में पहुँच गया जहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे। यहाँ भी भूत अचानक प्रकट हुआ तो बच्चों में से एक ने पूछा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;आप एकदम से कैसे यहाँ आ गये... ? मॅजिक से... ?&amp;quot; एक बच्चा बोला &lt;br /&gt;
&amp;quot;मॅजिक नहीं है ये, मैं तो भूत हूँ भूत।&amp;quot; भूत बोला&lt;br /&gt;
&amp;quot;वॉव ! मतलब रीयल भूत !&amp;quot; दूसरा बोला&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओ बेट्टे ! मज़ा आ गया&amp;quot; तीसरा बोला&lt;br /&gt;
बस फिर तो सवाल जवाब और भूत के जादू सब कुछ शुरू हो गया और भूत भी भूल गया कि वह यहाँ बच्चों को डराने आया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        अब हमारे पास भूत-वूत से डरने का समय नहीं है। भूत तो क्या भगवान भी सामने आ जाएँ तो वो भी दुखी हो जाएँगे हमारे व्यवहार से क्योंकि हम व्यस्त हैं और ख़ुद ही में मस्त हैं। ये दुनिया बदल गई है... अचानक तो नहीं धीरे-धीरे बदलती जा रही है। लोग व्यस्त हो गए हैं... और इस व्यस्तता के अभ्यस्त हो गए हैं। अक्सर सुनने में आता है कि अरे ! क्या करें ? इतना काम है कि 'मरने' का भी टाइम नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि इतना काम है कि 'जीने' का भी समय नहीं है। मान लीजिए कि ये भूत अगर मेरे पास आता तो हो सकता है कि मैं, इससे भी भारतकोश पर काम करने के लिए कहता और ये ख़याल मेरे मन में नहीं आता कि अरे ! ये तो भूत है। मेरी हालत भी कुछ अलग नहीं है।&lt;br /&gt;
        इस व्यस्तता का एक कारण, हमारा बहुत आसानी से हर एक के लिए उपलब्ध होना भी है। यदि आप किसी से सम्पर्क करना चाहें तो मोबाइल फ़ोन, ई-मेल, एस.एम.एस आदि से तुरंत सम्पर्क कर सकते हैं। प्रत्येक गतिविधि की जानकारी ले सकते हैं और दे सकते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि आप हर समय अपने परिचितों के लिए उपलब्ध हैं। वे जब भी चाहें आपसे सम्पर्क कर सकते हैं। इसलिए कोई ना कोई परिचित दिन में और कभी-कभी रात में भी हमसे सम्पर्क करता रहता है। &lt;br /&gt;
        इस निरंतर उपलब्धता के कारण अब कलाकार, साहित्यकार और रचनात्मक कार्य करने वाले अन्य लोग अपनी कृतित्व में वह उत्कृष्टता नहीं ला पाते जो कुछ वर्षों पहले हुआ करती थी। पुराने समय में विद्यार्थी कला का अध्ययन करने गुरु के पास जाते थे तो वर्षों तक अपने परिवार और परिचितों से कटे रहते थे। उनका विद्याध्यन का स्थान भी एकांत और शांत वातावरण में हुआ करता था। जहाँ उनकी साधना में कोई अनावश्यक गतिरोध उत्पन्न होना लगभग असम्भव ही होता था।&lt;br /&gt;
        आज की स्थिति इतनी भिन्न है कि लगातार किसी एक कार्य पर यदि एक दिन के लिए भी ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया जाये तो ये सरलता से सम्भव नहीं है। मोबाइल की घंटी या कोई एस.एम.एस या कोई ई-मेल आपका ध्यान भंग करता रहेगा। &lt;br /&gt;
मियाँ तानसेन के पास शास्त्रीय संगीत सीखने की गरज़ से एक व्यक्ति आया और उसने पूछा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं कितने समय में शास्त्रीय संगीत सीख जाऊँगा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कम-से-कम बारह वर्ष में।&amp;quot; मिया तानसेन ने उत्तर दिया &lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन मैं पहले से ही शास्त्रीय संगीत का पर्याप्त अभ्यास कर चुका हूँ&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;फिर तो चौबीस वर्ष लगेंगे&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ऐसा क्यों ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
उस व्यक्ति ने आश्चर्य व्यक्त किया तो मियाँ तानसेन ने उसे मुस्कुराकर जवाब दिया &lt;br /&gt;
&amp;quot;बारह वर्ष तो उस अशुद्ध संगीत को ही भुलाने में लग जायेंगे जिसका आपने अभ्यास किया है और उसके बाद फिर वे बारह वर्ष होंगे जो एक पूर्णत: कोरे काग़ज़ के समान आये विद्यार्थी को लगते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज भी यही माना जाता है कि चार वर्ष शास्त्रीय संगीत सीखने में और चार वर्ष उसका अभ्यास करने में, फिर और चार वर्ष उसमें पारंगत होने में लगते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        इसी तरह साहित्य का उदाहरण अमर शायर 'मीर तक़ी मीर' के जीवन की एक घटना का है।&lt;br /&gt;
मीर साहब को बहुत कष्ट में देखकर लखनऊ के एक नवाब इन्हें बाल-बच्चों के साथ अपने घर ले गये और महल का एक भाग रहने के लिए दे दिया। बैठक में एक तरफ़ की खिड़कियाँ बंद थीं; उनके सामने ही एक सुरम्य उद्यान था। नवाब ने वह हिस्सा इसलिए दिया था कि बाग़ से इनका दिल बहले, मनोरंजन हो पर अर्सा बीत गया; खिड़कियाँ वैसे ही बंद पड़ी रही। मीर साहब ने कभी खोलकर वाटिका की ओर नहीं देखा। एक दिन उनके मित्र उनसे मिलने आये। उन्होंने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इधर बाग़ है, खिड़कियाँ खोलकर क्यों नहीं बैठते ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
मीर साहब आश्चर्य से बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इधर  बाग़ भी है ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
मित्र ने कहा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;इसीलिए नवाब साहब आपको यहाँ लाये हैं कि जी बदलता रहे और मन प्रसन्न हो।&amp;quot; &lt;br /&gt;
मीर साहब के फटे-पुराने मस्विदे ग़जलों के पड़े थे, उनकी ओर संकेत करके कहा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं तो इस बाग़ में ऐसा लगा हूँ कि दूसरे बाग़ की मुझे ख़बर नहीं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
आज के समय में कितना कठिन है कोई बिस्मिल्ला ख़ाँ, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व या फिर कोई मुंशी प्रेमचन्द, मुक्तिबोध, कालिदास या शेक्सपीयर ढूँढना...  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब यह तो आपको ही तय करना है कि इस सहज-उपलब्धता से उपजी निरंतर-व्यस्तता कितनी उपयोगी है और कितनी अनुपयोगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वक़्त बहुत कम है यहाँ, काम बहुत ज़्यादा है।&lt;br /&gt;
हर पल, हर लम्हे का दाम बहुत ज़्यादा है॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82_%E0%A4%A4%E0%A5%8B_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1568</id>
		<title>मैं तो एक भूत हूँ -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82_%E0%A4%A4%E0%A5%8B_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1568"/>
				<updated>2017-05-21T13:46:22Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;मैं तो एक भूत हूँ&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ghost.jpg|right|160px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन मैं तो बिल्कुल नया भूत हूँ। कल ही तो मरा हूँ। सारा दिन कहाँ काटूँगा, कहाँ सोऊँगा, क्या खाऊँगा ?&amp;quot; भूत ने भूतिस्तान के मैनेजर से पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अभी-अभी मरे हो...नये-नये भूत बने हो... और एक दम से रहने के लिए फ़्लॅट चाहिए ? रूल तो रूल है... सबके लिए बराबर है तुमको बताया ना ! पहले 10 लोगों को डराओ तो खटिया मिलेगी सोने को... उसके बाद 25 लोगों को डरा लोगे तो एक कमरा मिल जायेगा इसी तरह 100 पर फ़्लॅट और 500 पर बंगला और नौकर-चाकर भी... समझ गये !... और खाने का क्या रोना रो रहे हो ?... भूत लोग, खाना-वाना नहीं खाते हैं... अरे फ़िल्में नहीं देखते थे... क्या कभी देखा था किसी भूत को खाना खाते ?&amp;quot; मैनेजर ने समझाया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन सर जी ! ये तो बताइये कि लोगों को डराते कैसे हैं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कमाल के भूत हो यार तुम भी... अरे ! इंसान को डराने में क्या है, किसी को अकेला देखो और डरा दो बस... तुमने ग़ायब होने की... प्रकट होने की... ट्रांसपेरेन्ट होने की सारी ट्रेनिंग कर ली हैं ना ?... अगर नहीं की तो सामने शीशा लगा है, कर लो&amp;quot;&lt;br /&gt;
भूत ने धरती पर आकर डराने के लिए 'क्लाइन्ट' देखना शुरू कर दिया... सड़क के किनारे एक बुज़ुर्ग महिला दिखी‌-&lt;br /&gt;
&amp;quot;वाह ! अकेली आंटी, सुनसान सड़क, रात का वक़्त, मज़ा आ जाएगा डराने में...&amp;quot; भूत ने सोचा... और अचानक उस औरत के सामने वैसे ही प्रकट हो गया जैसे कि धार्मिक सीरियलों में देवता और राक्षस प्रकट हो जाते हैं...&lt;br /&gt;
लेकिन ये क्या ?... उस औरत पर तो कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा...&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए ! हॅलो आंटी जी ! डर नहीं लगता क्या ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लगता है बेटा ! बहुत लगता है कि कहीं कोई कार टक्कर न मार दे। इसीलिए तो इन्तज़ार कर रही थी कि बूढ़ी अन्धी को कोई रास्ता पार करा दे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओहो ! तो आपको दिखता नहीं है... नो प्रोब्लम ! मैं आपको रास्ता पार करा देता हूँ&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;जीते रहो बेटा ! जुग-जुग जिओ...!&amp;quot; &lt;br /&gt;
किसी को डराने की पहली कोशिश बेकार गई। बुज़ुर्ग महिला को रास्ता पार कराने के बाद भूत पास ही एक कोठी में घुस गया। कोठी पर जो नाम लिखा था उससे अंदाज़ा लगा कि कोई सीनियर एडवोकेट है। अंदर देखा तो अपने ऑफ़िस में वकील साहब काम कर रहे थे।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे ! ये तो पूरी कोठी में अकेला है। इसे तो डरा-डरा के मार लूँगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
वकील के सामने भूत अचानक प्रकट हो कर कुर्सी पर सामने बैठ गया। वकील साहब एक फ़ाइल में खोए हुए थे उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। भूत ने खिसिया कर हल्के से मेज़ थपथपाई।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर... ! सर... !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हाँ बोलो ! क्या बात है क्या केस है तुम्हारा?&amp;quot; वकील साहब ने सिर उठा कर पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर ! आपकी कोठी चारों तरफ़ से बंद है, फिर भी मैं अंदर आ गया, बताइये कैसे ?&amp;quot; भूत ने सोचा कि पहले ख़ुद को 'असली' भूत साबित करना ज़रूरी है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सिर्फ़ यही पूछने के लिए तुम मेरे पास आए हो ? डोन्ट वेस्ट माइ टाइम। अपना केस बताओ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन मैं भूत हूँ असली वाला भूत। मरने के बाद आदमी भूत बनता है ना वो वाला भूत...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मरने के बाद ? यानी तुम्हारा 'मर्डर केस' है। ओ.के.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं-नहीं मैं तो एक्सीडेन्ट में मरा था...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छा... तो कम्पनसेशन का मामला है, मुआवज़ा चाहिए तुम्हें...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर मेरी बात तो सुनिए ! मुझे कोई केस नहीं लड़ना है, मैं तो आपको बताना चाहता हूँ कि मैं एक भूत हूँ और....&amp;quot;&lt;br /&gt;
वकील ने बात काटी...&lt;br /&gt;
&amp;quot;शटअप ! रात को दस बजे तुम मुझे ये बकवास सुनाने आए हो कि तुम भूत हो...तुमको कोई केस तो करना नहीं है फ़ालतू मेरा वक़्त क्यों बरबाद कर रहे हो&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर मैं ग़ायब हो सकता हूँ... आप विश्वास तो कीजिए...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम यहाँ ग़ायब होने आये हो ?... जब ग़ायब ही होना था तो आये ही क्यों ? तुम्हें मेरा ही घर मिला था इस जादूगरी को दिखाने के लिए... और वो भी रात के दस बजे ? अपना, ये ग़ायब होने का तमाशा मुझे ही क्यों दिखाना चाहते हो जाकर बच्चों को एन्टरटेन करो... अब जाओ भी...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सर मैं साबित करना चाहता हूँ कि मैं भूत हूँ&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुमको जो भी साबित करना है अदालत में करना... यहाँ मेरे घर में साबित करके क्या होगा... अब जाओ और मुझे काम करने दो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दूसरा अनुभव पहले से भी ज़्यादा बेकार निकला। भूत रुँआसा होकर वकील के घर से चला आया और सड़क पर चलती एक कार में घुस गया। कार एक अधेड़ महिला चला रही थी।&lt;br /&gt;
&amp;quot;हा हा हा हा! मैं आप की कार में कैसे आया ? &amp;quot; भूत ने पिछली सीट पर बैठ कर बनावटी हँसी के साथ कहा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्योंकि मैं, आज पार्किंग में अपनी कार लॉक करना भूल गई और इसमें आप छुप के बैठ गये... ख़ैर छोड़िए... आप ही बताइए... ये तो आपको ही पता होगा... क्योंकि कार में घुसे तो आप हैं ना !&amp;quot; महिला शांत भाव से बोली&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं एक भूत हूँ, सचमुच का जीता-जागता डरावना भूत हा हा हा हा&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अच्छाऽऽऽ तो आप भूत हैं ? तो भूत जी ! थोड़ा इत्मीनान से शांत बैठिए, मैं ज़रा ड्राइव कर रही हूँ ओ.के, वैसे आपका नाम क्या है ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरा कोई नाम नहीं है। मैं भूत हूँ और आपको डराना चाहता हूँ। आपको डरना ही होगा&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ठीक है मैं प्रॉमिस करती हूँ कि मैं आपसे डरूँगी लेकिन पहले हम वहाँ पहुँच जायें जहाँ जा रहे हैं&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हम कहाँ जा रहे हैं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हम मेन्टल हॉस्पीटल जा रहे हैं। आज मेरी नाइट शिफ़्ट है, मैं डॉक्टर हूँ... साइकायट्रिस्ट हूँ। हॉस्पीटल पहुँच कर सबसे पहले आपसे ख़ूऽऽऽब डरूँगी जिससे आपको ऐसा ना लगे कि आप भूत नहीं हैं, ओ.के.। नाउ काम डाउन, बी रिलेक्स्ड, टेक डीप ब्रेद। लंबी-लंबी सांस लीजिए और आँखें बन्द कर लीजिए। जस्ट रिलेक्स... मैं आपके लिए अच्छा सा म्यूज़िक लगाती हूँ...&amp;quot; &lt;br /&gt;
भूत, दुखी होकर कार से ग़ायब हो गया। अगली रात शुरू होते ही वह एक कॉलोनी के पार्क में पहुँच गया जहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे। यहाँ भी भूत अचानक प्रकट हुआ तो बच्चों में से एक ने पूछा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;आप एकदम से कैसे यहाँ आ गये... ? मॅजिक से... ?&amp;quot; एक बच्चा बोला &lt;br /&gt;
&amp;quot;मॅजिक नहीं है ये, मैं तो भूत हूँ भूत।&amp;quot; भूत बोला&lt;br /&gt;
&amp;quot;वॉव ! मतलब रीयल भूत !&amp;quot; दूसरा बोला&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओ बेट्टे ! मज़ा आ गया&amp;quot; तीसरा बोला&lt;br /&gt;
बस फिर तो सवाल जवाब और भूत के जादू सब कुछ शुरू हो गया और भूत भी भूल गया कि वह यहाँ बच्चों को डराने आया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        अब हमारे पास भूत-वूत से डरने का समय नहीं है। भूत तो क्या भगवान भी सामने आ जाएँ तो वो भी दुखी हो जाएँगे हमारे व्यवहार से क्योंकि हम व्यस्त हैं और ख़ुद ही में मस्त हैं। ये दुनिया बदल गई है... अचानक तो नहीं धीरे-धीरे बदलती जा रही है। लोग व्यस्त हो गए हैं... और इस व्यस्तता के अभ्यस्त हो गए हैं। अक्सर सुनने में आता है कि अरे ! क्या करें ? इतना काम है कि 'मरने' का भी टाइम नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि इतना काम है कि 'जीने' का भी समय नहीं है। मान लीजिए कि ये भूत अगर मेरे पास आता तो हो सकता है कि मैं, इससे भी भारतकोश पर काम करने के लिए कहता और ये ख़याल मेरे मन में नहीं आता कि अरे ! ये तो भूत है। मेरी हालत भी कुछ अलग नहीं है।&lt;br /&gt;
        इस व्यस्तता का एक कारण, हमारा बहुत आसानी से हर एक के लिए उपलब्ध होना भी है। यदि आप किसी से सम्पर्क करना चाहें तो मोबाइल फ़ोन, ई-मेल, एस.एम.एस आदि से तुरंत सम्पर्क कर सकते हैं। प्रत्येक गतिविधि की जानकारी ले सकते हैं और दे सकते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि आप हर समय अपने परिचितों के लिए उपलब्ध हैं। वे जब भी चाहें आपसे सम्पर्क कर सकते हैं। इसलिए कोई ना कोई परिचित दिन में और कभी-कभी रात में भी हमसे सम्पर्क करता रहता है। &lt;br /&gt;
        इस निरंतर उपलब्धता के कारण अब कलाकार, साहित्यकार और रचनात्मक कार्य करने वाले अन्य लोग अपनी कृतित्व में वह उत्कृष्टता नहीं ला पाते जो कुछ वर्षों पहले हुआ करती थी। पुराने समय में विद्यार्थी कला का अध्ययन करने गुरु के पास जाते थे तो वर्षों तक अपने परिवार और परिचितों से कटे रहते थे। उनका विद्याध्यन का स्थान भी एकांत और शांत वातावरण में हुआ करता था। जहाँ उनकी साधना में कोई अनावश्यक गतिरोध उत्पन्न होना लगभग असम्भव ही होता था।&lt;br /&gt;
        आज की स्थिति इतनी भिन्न है कि लगातार किसी एक कार्य पर यदि एक दिन के लिए भी ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया जाये तो ये सरलता से सम्भव नहीं है। मोबाइल की घंटी या कोई एस.एम.एस या कोई ई-मेल आपका ध्यान भंग करता रहेगा। &lt;br /&gt;
मियाँ तानसेन के पास शास्त्रीय संगीत सीखने की गरज़ से एक व्यक्ति आया और उसने पूछा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं कितने समय में शास्त्रीय संगीत सीख जाऊँगा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;कम-से-कम बारह वर्ष में।&amp;quot; मिया तानसेन ने उत्तर दिया &lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन मैं पहले से ही शास्त्रीय संगीत का पर्याप्त अभ्यास कर चुका हूँ&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;फिर तो चौबीस वर्ष लगेंगे&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ऐसा क्यों ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
उस व्यक्ति ने आश्चर्य व्यक्त किया तो मियाँ तानसेन ने उसे मुस्कुराकर जवाब दिया &lt;br /&gt;
&amp;quot;बारह वर्ष तो उस अशुद्ध संगीत को ही भुलाने में लग जायेंगे जिसका आपने अभ्यास किया है और उसके बाद फिर वे बारह वर्ष होंगे जो एक पूर्णत: कोरे काग़ज़ के समान आये विद्यार्थी को लगते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज भी यही माना जाता है कि चार वर्ष शास्त्रीय संगीत सीखने में और चार वर्ष उसका अभ्यास करने में, फिर और चार वर्ष उसमें पारंगत होने में लगते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        इसी तरह साहित्य का उदाहरण अमर शायर '[[मीर तक़ी मीर]]' के जीवन की एक घटना का है।&lt;br /&gt;
मीर साहब को बहुत कष्ट में देखकर लखनऊ के एक नवाब इन्हें बाल-बच्चों के साथ अपने घर ले गये और महल का एक भाग रहने के लिए दे दिया। बैठक में एक तरफ़ की खिड़कियाँ बंद थीं; उनके सामने ही एक सुरम्य उद्यान था। नवाब ने वह हिस्सा इसलिए दिया था कि बाग़ से इनका दिल बहले, मनोरंजन हो पर अर्सा बीत गया; खिड़कियाँ वैसे ही बंद पड़ी रही। मीर साहब ने कभी खोलकर वाटिका की ओर नहीं देखा। एक दिन उनके मित्र उनसे मिलने आये। उन्होंने कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इधर बाग़ है, खिड़कियाँ खोलकर क्यों नहीं बैठते ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
मीर साहब आश्चर्य से बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;इधर  बाग़ भी है ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
मित्र ने कहा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;इसीलिए नवाब साहब आपको यहाँ लाये हैं कि जी बदलता रहे और मन प्रसन्न हो।&amp;quot; &lt;br /&gt;
मीर साहब के फटे-पुराने मस्विदे ग़जलों के पड़े थे, उनकी ओर संकेत करके कहा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं तो इस बाग़ में ऐसा लगा हूँ कि दूसरे बाग़ की मुझे ख़बर नहीं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
आज के समय में कितना कठिन है कोई बिस्मिल्ला ख़ाँ, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व या फिर कोई मुंशी प्रेमचन्द, मुक्तिबोध, कालिदास या शेक्सपीयर ढूँढना...  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब यह तो आपको ही तय करना है कि इस सहज-उपलब्धता से उपजी निरंतर-व्यस्तता कितनी उपयोगी है और कितनी अनुपयोगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वक़्त बहुत कम है यहाँ, काम बहुत ज़्यादा है।&lt;br /&gt;
हर पल, हर लम्हे का दाम बहुत ज़्यादा है॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%82_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1567</id>
		<title>एक महान डाकू की शोक सभा -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%82_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1567"/>
				<updated>2017-05-21T13:43:23Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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| &lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;एक महान डाकू की शोक सभा&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sea-pirate.jpg|300px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
एक 'महान' नेता, एक 'महान' डाकू की शोक सभा संबोधित कर रहे थे।-&lt;br /&gt;
        &amp;quot;वो एक महान डाकू थे। ऐसे ख़ानदानी और लगनशील डाकू अब देखने में नहीं आते। आज भी मुझे अच्छी तरह याद है... जब उन्होंने पहली डक़ैती डाली तो वो नवम्बर-दिसम्बर का महीना रहा होगा; दिवाली के आसपास की बात है। डक़ैती डाल कर वो सीधे मेरे पास आए और डक़ैती का पूरा क़िस्सा मुझे एक ही साँस में सुना डाला। हम दोनों की आँखों में खुशी के आँसू थे। बाद में हम दोनों गले मिलकर ख़ूब रोए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
आगे कुछ बोलने से पहले उन्होंने वही किया जो नेता अक्सर भाषण देते हुए करते हैं-&lt;br /&gt;
        उन्होंने माइक को देखा और भावुक होकर दाएँ हाथ से उसे पकड़ लिया। बाएँ हाथ की चार उंगलियों को मोड़कर एक लाइन में लगाया और ग़ौर से नाखूनों को देखा। इसके बाद कुछ सोचने का अभिनय किया और साँस छोड़कर (जो कि खिंची हुई थी) दोनों हाथ पीछे बाँध लिए। एक बार एड़ियों पर उचक कर फिर से कहना शुरू किया-&lt;br /&gt;
        &amp;quot;वो ज़माना ही ऐसा था... उस ज़माने में डक़ैती डालने में एक लगन होती थी... एक रचनात्मक दृष्टिकोण होता था। जो आज बहुत ही कम देखने में आता है। मुझे भी कई बार मूलाजी के साथ डक़ैतियों पर जाने का अवसर मिला। आ हा हा! क्या डक़ैती डालते थे मूलाजी। कम से कम ख़र्च में एक सुंदर डक़ैती डालना उनके बाएँ हाथ का खेल था। बाद में वक़्त की माँग के अनुसार उन्होंने अपनी डक़ैतियों में बलात्कार को भी एक समुचित स्थान दिया किन्तु दुर्भाग्य ! कि उन्होंने जो डक़ैतियाँ डालीं... हत्याएँ कीं और बलात्कार किए... उसका पूरा श्रेय और बाद में लाभ ख़ुद उन्हीं को नहीं मिल पाया।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;...उनकी आदत हमेशा दूसरों को बढ़ावा देने की रही। वो तो मानो एक विश्वविद्यालय ही थे। नये लड़कों को जब वो अपने साथ डक़ैतियों में ले जाते थे तो उन्हीं को हमेशा हत्याएँ और बलात्कार करने का मौक़ा भी देते थे। जहाँ तक मुझे याद आता है, जब भी वो मुझे मिले, उनके साथ चार-पाँच नई उम्र के लड़के होते थे। आ हा हा! क्या दृश्य होता था... सभी लड़के नशे में धुत्त, मुँह में पान और अपनी-अपनी अन्टी में तरह-तरह के हथियार लगाए हुए। उन लड़कों में से... जो आज जीवित बचे हैं, उनके नाम और फ़ोटो अख़बारों में देखकर बेहद प्रसन्नता होती है। मूलाजी के 'सधाए' हुए लड़के आज कई पार्टियों में सम्मानित पदों पर हैं। उस त्यागमूर्ति का ध्यान आने से ही मैं भावुक हो जाता हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
-तालियाँ बजीं...&lt;br /&gt;
        &amp;quot;शुरुआत में छः-सात डक़ैतियाँ डालने के बाद ही वो काफ़ी प्रसिद्धी पा गए थे लेकिन आप तो जानते ही हैं कि पुलिस ने हमेशा उनके साथ सौतेला व्यवहार ही किया। कई डक़ैतियाँ ऐसी थीं जो उन्होंने अपने बल-बूते पर ही डाली थीं, लेकिन पुलिस रिकार्ड से उनका नाम ग़ायब ही रहा और उन डक़ैतियों का श्रेय उन्हें नहीं मिल पाया। असल में उस समय जो पुलिस कप्तान था वो अपनी जाति के एक साधारण से डाकू को प्रमोट करने के चक्कर में रहता था। जिसमें कि बाद में वो सफल भी रहा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        ...&lt;br /&gt;
        &amp;quot;स्वर्गीय श्री मूलशंकर जी; जिन्हें हम &amp;quot;मूला डाकू&amp;quot; के नाम से जानते हैं, एक ज़बर्दस्त पक्षपात पूर्ण रवैए का शिकार हुए। पाँच अच्छी डक़ैतियाँ डालने के बाद मुश्किल से एक डक़ैती में मूला जी का नाम आ पाता था। इससे उनका प्रमोशन रुक गया। वो अपने डाकू कैरियर की अगली सीढ़ी को पाने में असफल रहे याने नेता नहीं बन पाए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
-वे भावुक हुए-&lt;br /&gt;
        &amp;quot;दोस्तों आप तो जानते हैं कि कौन अपनी पसंद से डाकू बनता है ?... कोई नहीं ! ये तो मजबूरी है दोस्तों... मजबूरी ! अगर मूलशंकर जी ने नेता बनने का सपना नहीं देखा होता तो बेचारे क्यों डाकू बनते। वो भी किसी सरकारी दफ़्तर में नौकरी करके डाकुओं से ज़्यादा नहीं कमा रहे होते ?&lt;br /&gt;
-वे और भावुक हुए-&lt;br /&gt;
        &amp;quot;... आप को पता ही है कि किसी पार्टी ने उन्हें चुनाव में टिकिट नहीं दिया और वो साधारण सा डाकू जो वास्तव में डाकू था ही नहीं, पिछली बार के चुनाव में लगातार तीसरी बार पार्टी की टिकिट पर जीता है। एस. पी. ने पक्षपात करके उसे डाकू बनाया। उसके सिर पर दो लाख का बिल्कुल झूठा इनाम रखवाया।&amp;quot; वे दहाड़े- &amp;quot;वो भोला-भाला डाकू चुनाव में टिकिट पा जाता है और मूला जी जैसे ख़तरनाक़ डाकू समाज सेवा से वंचित रह जाते हैं...? क्या यही लोकतंत्र है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
यह कहकर उन्होंने सिर झुका लिया। यह मुद्रा तालियों की अपेक्षा में बनाई गयी थी लेकिन तालियों की बजाय सन्नाटा भांपकर वो फ़ौरन गला साफ़ करके बोले-&lt;br /&gt;
        &amp;quot;मैं किसी का भी नाम नहीं लेना चाहता क्योंकि आप स्वयं ही ऐसे साधारण डाकुओं के नामों से परिचित हैं। इस तरह अचानक इनाम बढ़ा कर किसी को भी रातों-रात डाकू बनाया जा सकता है... इससे तो हर ऐरा-ग़ैरा डाकू टिकिट का दावेदार बन जाएगा। वो दिन दूर नहीं जब लोग पुलिस को रिश्वत देकर बिना डक़ैती डाले ही अपना नाम डक़ैतियों में लिखवा लेंगे और डक़ैती-संस्कृति का सत्यानाश हो जाएगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;हमारे देश के डक़ैतों में अब जातीय भावना उत्पन्न होने लगी है। जो धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही है। डक़ैतियाँ अब जाति के आधार पर डाली जा रही हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी जाति के डाकू को बढ़ावा देने में लगा है। पार्टियों में भी जाति के आधार पर डाकुओं को वरीयता दी जाती है। अभी पिछले दिनों एक सज्जन के यहाँ एक 'शानदार डक़ैती' पड़ी। वो जानते थे... कि डक़ैती किसने डाली है... लेकिन उन्होंने डक़ैती में नाम लिखवाना अपनी ही जाति के एक ऐसे डाकू का... जो उस समय इलाक़े में था ही नहीं... इस जातिवादी डाकू-तन्त्र को रोकना होगा... अन्यथा इसके परिणाम बहुत बुरे होंगे। इससे योग्य डाकू पिछड़ जायेंगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;मैंने अनेक बार देखा है कि टिकिट प्राप्त करने की लालसा में बहुत से डाकुओं ने डक़ैती डालना कम करके दूसरे तरीक़ों से जल्दी प्रगति करनी चाही है। जैसे कुछ डक़ैतों ने शराब के ठेके लिए, कुछ ने जुए-सट्टे का कारोबार खोल लिया और कुछ ने अपहरण का धन्धा अपना लिया। ये तो ठीक है कि इस बदलाव से टिकिट पाने में आसानी हो जाती है, लेकिन डक़ैती की परम्परा को बेहद नुक़सान होता है।&lt;br /&gt;
        वे क्रोधित होकर दहाड़े, &amp;quot;क्या सिर्फ़ टिकिट पाने के लिए ही हम भू-माफ़िया बन जाएँ, शराब के ठेके लें, अपहरण करवाएँ और जुए-सट्टे का कारोबार करें... क्या सिर्फ़ डक़ैती डालने से ही टिकिट के लिए हमारी योग्यता सिद्ध नहीं हो जाती?&amp;quot; &lt;br /&gt;
        तभी एक नौजवान डाकू बीच में बोला, &amp;quot;आजकल तो भू-माफियाओं का ज़माना है। पूछता कौन है डाकुओं को...डाकुओं से ज़्यादा इज़्ज़त तो राजनीति में अब दलालों को मिलती है !... अब गया ज़माना डाकुओं का !...&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;भू-माफ़िया ! क्या है भू-माफ़िया हमारे सामने ?... कुछ भी नहीं... ज़्यादा से ज़्यादा चार-छ: मर्डर... बस !... और उसके बाद राजनीति में ट्रांसफ़र... उसके बाद क्या ? बताइए ?... राजनीति में स्थापित होने के बाद तो हमारी ही ज़रूरत पड़ती है &lt;br /&gt;
ना ? अरे ! ख़ुद कहाँ करते हैं ये क़त्ल ? ये तो हमसे करवाते हैं ना ? इसमें सारी ग़लती किसकी है... आपकी। आपने ही यह छूट दी है। मैं पूछता हूँ कि जान जाने का ख़तरा सबसे ज़्यादा किसमें है... सिर्फ़ डक़ैती में! इसलिए सबसे ज़्यादा बहादुरी का काम डाकू बनना ही है, बाक़ी सारी चीज़ें कम बहादुरी की हैं, फिर भी डक़ैतों की मान्यता कम होती जा रही है। मान्यता ही कम नहीं हो रही है, बल्कि उनका मूल्यांकन भी ग़लत तरीक़े से होता है। इसका कारण है एकता की कमी। मेरे प्यारे डाकुओं एक हो जाओ और फिर से छा जाओ राजनीति पर...&amp;quot;&lt;br /&gt;
वक्तव्य ख़त्म करने के इशारे को समझ कर भी अनजान बनकर वे घड़ी देखकर बोले-&lt;br /&gt;
        &amp;quot;काफ़ी समय हो गया... मुझे एक डाकू-शाला के उद्घाटन में भी जाना है इसलिए मैं यह कह कर अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ कि हम सब एक मिलकर रहें तो हर एक पार्टी हमारे महत्व को और ज़्यादा समझेंगी और फिर से मूला जी का दर्द भरा इतिहास नहीं दोहराया जाएगा। मेरे साथ नारा लगाइए...डाकू नेता भाई-भाई, और क़ौम कहाँ से आई&amp;quot;&lt;br /&gt;
सभी मिल कर डाकू-गान गाते हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जितने डाकू उतने पद&lt;br /&gt;
गिन ले जनता ध्यान से&lt;br /&gt;
हारेगी वो हर बाज़ी&lt;br /&gt;
सब डाकू हों मैदान में&lt;br /&gt;
आओ&lt;br /&gt;
आ जाऽऽऽओ&lt;br /&gt;
हर पद पे&lt;br /&gt;
छा जाऽऽऽ ओ&lt;br /&gt;
जी जान से&lt;br /&gt;
हेऽऽऽ&lt;br /&gt;
जी जान से &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइए इस शोक सभा से अब वापस चलें&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        जिस तरह हर चीज़ का ज़माना होता है वैसे ही 'चम्बल-ब्रांड' डाकुओं का भी एक 'ज़माना' था। जनता का हाल ये रहता था कि लोग, डाकुओं के घोड़ों की टापों से उड़ती धूल को टल्कम पाउडर से कम नहीं समझते थे। फ़िल्मों के लिए भी 'डाकू' एक हिट विषय रहा है। डाकू को नायक बनाया जाय या खलनायक, डाकू अक्सर हिट ही होता है। जैसे- &lt;br /&gt;
जिस देश में गंगा बहती है का 'राका' (प्राण- खलनायक)&lt;br /&gt;
गंगा जमना का 'गंगा' (दिलीप कुमार- नायक)&lt;br /&gt;
मुझे जीने दो का 'जरनैल सिंह' (सुनील दत्त- नायक)&lt;br /&gt;
मेरा गाँव मेरा देश का 'जब्बर' (विनोद खन्ना- खलनायक)&lt;br /&gt;
शोले का 'गब्बर' (अमजद ख़ान- खलनायक)&lt;br /&gt;
बिंदिया और बंदूक़ का 'रंगा' (जोगिन्दर- खलनायक)&lt;br /&gt;
बैंडिट क्वीन की 'फूलन' (सीमा बिस्वास- नायिका)&lt;br /&gt;
पान सिंह तौमर का 'पान सिंह' (इरफ़ान ख़ान- नायक)&lt;br /&gt;
आदि कई ऐसे चरित्र हैं जो फ़िल्मों में लोकप्रिय हुए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        इस सूची में एक 'पान सिंह तौमर' फ़िल्म ही ऐसी है जो मैंने अभी तक देखी नहीं है। वजह ये है कि थिएटर में फ़िल्म देखने में मेरा दम घुटता है और 'पाइरेटेड डीवीडी' देखने में मोज़रबेयर और टी सीरीज़ वालों का डर लगता है। वैसे भी 'भारतकोश' से समय बचता ही कहाँ है जो फ़िल्म देखूँ! सुना है कि अच्छी चली है, ख़ास तौर से वो संवाद कि &amp;quot;बीहड़ में बाग़ी होते हैं डक़ैत मिलते हैं पार्लियामेन्ट में&amp;quot;, ख़ासा लोकप्रिय हुआ है।  &lt;br /&gt;
        असल ज़िन्दगी में भी डाकुओं के नाम बहुत प्रसिद्ध हुए। सुल्ताना डाकू, डाकू मान सिंह, पुतली बाई, पाना डाकू (पान सिंह), मोहर सिंह, माधो सिंह, मलखान सिंह, फूलन देवी आदि। बात क्या है डाकू हमें क्यों आकर्षित करते रहे हैं ? &lt;br /&gt;
        हर एक जीव स्वभाव से कायर ही होता है चाहे वह जानवर हो या इंसान। बहादुर तो हमें समाज और संस्कृति बनाते है। जिसे हम बहादुरी या निडरता कहते हैं उसके मुख्य कारण दो ही होते हैं एक तो उस भय के प्रति पूरी अज्ञानता जैसे बच्चा सांप से नहीं डरता और दूसरा कारण है, अपने भय को छुपा जाना अर्थात यह ज़ाहिर न होने देना कि हम भयभीत हैं। जिन्हें हम साहसी और बहादुर मानते हैं। उन्होंने अपने भय को कभी किसी के सामने ज़ाहिर नहीं होने दिया, बस यही है बहादुरी। &lt;br /&gt;
        जिस तरह हर एक साहस वीरता नहीं होता उसी तरह हर एक पलायन कायरता नहीं होता। इसीलिए बहादुरी और मूर्खता के बीच बहुत महीन सीमा रेखा होती है और यही महीन रेखा कायरता और बुद्धिमानी के बीच भी होती है। ग़लत निर्णय से आपकी बहादुरी मूर्खता में गिनी जा सकती है और समझदारी से किया गया पलायन भी बुद्धिमानी में शामिल हो जाता है। हमारा यही स्वभाव और इच्छाएँ हमें डाकू-फ़ॅन बना देती हैं। हमारे मित्र जानवरों में कुत्ता, घोड़ा, गाय आदि गिने जाते हैं लेकिन हर-कोई बनना 'शेर' ही चाहता है। घोड़ा या गाय बनने की कोई नहीं सोचता और कुत्ता बनने का तो सवाल ही नहीं है। हम ख़ुद को बहादुर और साहसी देखना और दिखाना चाहते हैं और इस और बहादुरी का जो जो ग्लॅमर शेर के पास है, वह दूसरों के पास कहाँ ? इसलिए डाकुओं को भी चम्बल का शेर कहा जाता है।&lt;br /&gt;
        यदि हम जल-दस्युओं के बारे में जानकरी करने के लिए गहरे में उतरें तो एक ज़बर्दस्त इतिहास और किंवदंतियों से भरी दुनिया हमें मिलती है। इनकी लोकप्रियता का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि कॅप्टेन जॅक स्पॅरो के किरदार में 'जॉनी डेप' अभिनीत 'पाइराइट्स ऑफ़ कॅरेबियन' करोड़ों डॉलर का व्यापार कर रही है और इसके सीक्वल, ट्रायोलॉजी और क्वाड्रियोलॉजी बनते जा रहे हैं। इन समुद्री डाकुओं ने तो एक बहुत प्रभावी संस्कृति का प्रतिनिधित्व भी किया है। &lt;br /&gt;
        डाकुओं, दस्युओं या लुटेरों से प्रभावित होने का कारण है हमारा उनकी दुनिया से अनभिज्ञ होना। इनका जीवन, जिससे कि लोग चमत्कृत हो जाते हैं, वास्तव में नारकीय जीवन होता है। समाज से कटे होने का दर्द इनके हृदय को हर समय कचोटता रहता है। आत्म समर्पण के बाद कुछ दिन ये लोग शो-पीस बने इधर-उधर घूमते रहते हैं फिर कोई घास नहीं डालता। सब की क़िस्मत फूलन जैसी नहीं होती कि सांसद बन जाय।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1566</id>
		<title>ज़माना -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T13:40:56Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;table table-bordered table-striped&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;'ज़माना'&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Zamana.jpg|right|300px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;आप मोबाइल पर ही बात करते रहेंगे या मेरी भी बात सुनेंगे ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;सॉरी मॅम! आप बताइये कैसा 'पति' चाहिए आपको ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;देखिए नया बजट आने वाला है हर चीज़ की क़ीमत बढ़ेगी। बजट से पहले ही मुझे पति लेना है। आपके पास कौन-कौन से प्लान और पॅकेज हैं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;मॅम! अगर आप अपना बजट बता दें तो मुझे थोड़ी आसानी हो जाएगी, आपका बजट क्या है ? मैं उसी तरह के पति आपको बताऊँगा&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;बजट तो ज़्यादा नहीं है... देखिए पहले मेरी प्रॉब्लम समझ लीजिए... मेरा जॉब कुछ ऐसा है कि मुझे बार-बार एक से दूसरी जगह शिफ़्ट होना पड़ता है। इधर से उधर भारी-भारी सामान ले जाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। कई बार शहर भी बदलना पड़ता है। जब ट्रक में सामान जाता है तो साथ में मैं नहीं जा सकती। अब और भी बहुत से काम हैं जैसे- बल्ब बदलना, सीलिंग फ़ॅन साफ़ करना, बिजली का बिल... बहुत से काम होते हैं यू नो? एक पति रहेगा तो ये सारे काम भी आसान हो जाएंगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;यस आइ नो मॅम! इसके अलावा भी बहुत काम हैं जैसे- कपड़े धोना-बर्तन धोना, बाज़ार से सामान लाना&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;तो क्या झाड़ू-पोछा भी करेगा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;बिल्कुल करेगा क्यों नहीं करेगा। आप पैसा ख़र्च कर रही हैं! बस उसे प्यार से रखिए, ढंग से फ़ीड कीजिए एक ट्रेनर लगा दीजिए फिर देखिए एक पति क्या-क्या कर सकता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;तो फिर कम बजट में कोई अच्छा-सा पति बताइये।&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;मॅम! 'इकॉनमी पॅकेज' के पति भी बहुत अच्छे होते हैं लेकिन इकॉनमी पति को अपग्रेड करने के लिए हमारे पास कोई अपडेट प्लान नहीं है और ना ही आफ़्टर सेल सर्विस है। इकॉनोमी पति अपग्रेड नहीं हो सकता। आप थोड़ा-सा बजट बढ़ा के डीलक्स प्लान ले सकती हैं और डीलक्स प्लान में तो तमाम कॅटेगरी हैं जैसे दबंग, बॉडीगार्ड, मास्टर ब्लास्टर, माही वग़ैरा-वग़ैरा... सब एक से एक सॉलिड और ड्यूरेबल&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;डॉन भी है क्या ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;सॉरी मॅम 'डॉन कॅटेगरी' तो गवर्नमेन्ट ने बॅन की हुई है&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;नहीं-नहीं मैं तो वैसे ही पूछ रही थी... अच्छा ये बताइए कि वो जो उधर... उस हॉल में कई आदमी बैठे हैं वो कौन हैं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
--&amp;quot;ओ नो मॅम! उनमें से कोई आदमी नहीं है सब के सब पति हैं... उनको छोड़िए... सब एक्सचेंज ऑफ़र में आए हैं और ऑक्शन में जाएँगे। बाइ द वे आपको तो एक्सचेंज ऑफ़र में इनट्रेस्ट नहीं है ? पुराने को भी एडजस्ट किया जा सकता है&amp;quot; &lt;br /&gt;
--&amp;quot;एक्सचेन्ज में मेरा कोई इन्टरॅस्ट नहीं है और 'डीलक्स पति' थोड़े महंगे लग रहे हैं 'इकॉनमी' में क्या वॅराइटी है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
--इकॉनमी में तो देवदास, लाल बादशाह, साजन, बालम, सैंया, मेरे महबूब ...&amp;quot; &lt;br /&gt;
--&amp;quot;नहीं-नहीं ये तो नाम से ही बोर लग रहे हैं... मुझे तो डीलक्स पति ही दे दीजिए&amp;quot; &lt;br /&gt;
दहेज़ की कुप्रथा ख़त्म नहीं हुई तो यही हाल होना है दूल्हे राजाओं का... ख़ैर ये 'मॅम' तो बजट आने से पहले ही अ‍पना 'डीलक्स पति' ले कर चली गईं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        अब तो बजट आ गया है, चारों तरफ़ एक ही चर्चा चलेगी, 'महंगाई बहुत बढ़ रही है'। मैंने जब भी कोई पुरानी फ़िल्म देखी चाहे वो 25 साल पुरानी हो या 50 से 70 साल पुरानी भी हो हरेक घरेलू-सामाजिक फ़िल्म के कुछ संवाद बंधे-बंधाए होते थे।&lt;br /&gt;
&amp;quot;महंगाई बहुत बढ़ गई है&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ज़माना बहुत ख़राब आ गया है&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आजकल के लड़के-लड़कियों में शर्म-लिहाज़ नहीं है&amp;quot;&lt;br /&gt;
        ऊपर लिखे संवाद हमारी फ़िल्मों में ही सदाबहार रहे हों ऐसा नहीं है। हमारे समाज में चारों ओर यही बातें रोज़ाना चलती रहती हैं। ये तीन महावाक्य वे हैं जो हमारे समाज में किसी को भी ज़िम्मेदार या परिपक्व होने का प्रमाणपत्र देते हैं। जब तक  लड़के- लड़की बड़े हो कर इन तीनों मंत्रों को अक्सर दोहराना शुरू नहीं करते तब तक उन्हें 'बच्चा' और 'ग़ैरज़िम्मेदार' माना जाता है। &lt;br /&gt;
        दो हज़ार पाँच सौ साल पहले प्लॅटो ने एथेंस की अव्यवस्था और प्रजातंत्र पर कटाक्ष किया है- &amp;quot;सभी ओर प्रजातंत्र का ज़ोर है, बेटा पिता का कहना नहीं मानता; पत्नी पति का कहना नहीं मानती सड़कों पर गधों के झुंड घूमते रहते हैं जैसे कि ऊपर ही चढ़े चले आयेंगे। ज़माना कितना ख़राब आ गया है।&amp;quot; कमाल है ढाई हज़ार साल पहले भी यही समस्या ?&lt;br /&gt;
       'देविकारानी' भारतीय हिन्दी सिनेमा में अपने ज़माने की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री ही नहीं थी बल्कि बेहद प्रभावशाली भी थीं। अनेक बड़े बड़े अभिनेताओं को हिंदी सिनेमा में लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है जिनमें से एक नाम हमारे दादा मुनि यानि अशोक कुमार भी हैं। 'अछूत कन्या' हिंदी सिनेमा की शरूआती फ़िल्मों में एक उत्कृष्ट कृति मानी गयी है। इस फ़िल्म में अशोक कुमार और देविका रानी नायक नायिका थे। देविका रानी ने 1933 में बनी फ़िल्म 'कर्म' में पूरे 4 मिनट लम्बा चुंबन दृश्य दिया। इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि दृश्य में उनके साथ उनके पति हिमांशु राय थे। इसकी आलोचना होना स्वाभाविक ही था, किंतु भारत सरकार ने उन्हें पद्म सम्मान, पद्मश्री और सिने जगत के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहेब फाल्के सम्मान' से राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
       1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में मंच पर जूते फेंके गये जिसमें फ़िरोज़शाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बैनर्जी जैसे वरिष्ठ नेता घायल हुए और यह घटना बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक, मोतीलाल नेहरू और सम्भवत: लाला लाजपत राय की उपस्थिति में हुई।&lt;br /&gt;
       महाभारत काल में युधिष्ठिर अपने भाईयों समेत अपनी पत्नी द्रौपदी को भी जुए में हार गया और द्रौपदी को भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने ही द्रौपदी को निवस्त्र करने का घटनाक्रम चला।&lt;br /&gt;
       1632 में भारत का सम्राट शाहजहाँ ताजमहल बनवाने के लिए चीन, तिब्बत, श्रीलंका, अरब देशों को पैसा भेजता रहा क्योंकि वहाँ पाये जाने वाले ख़ूबसूरत पत्थरों से ताजमहल को सजाया जाना ज़रूरी समझा गया। जिस समय ताजमहल का निर्माण हो रहा था उस समय बंगाल में भीषण दुर्भिक्ष (अकाल) लाखों भारतीयों की बलि ले रहा था। एक रुपया भी अकालग्रस्त क्षेत्र को भेजे जाने का प्रमाण शाहजहाँ के काल में नहीं मिलता।&lt;br /&gt;
इसी तरह के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे निश्चित ही यह नहीं लगता है पुराना ज़माना किसी भी संदर्भ में आज से श्रेष्ठ रहा होगा।  &lt;br /&gt;
        ज़रा सोचिए कि जिस पल हम कहते हैं कि अब तो ज़माना ख़राब आ गया तो सहसा हम इस ज़माने के कटे होने की बात ही कह रहे होते हैं और ख़ुद को इस मौजूदा वक़्त से तालमेल न बैठा पाने वाला व्यक्ति घोषित कर रहे होते हैं। यह पूरी तरह नकारात्मक सोच है। निश्चित रूप से यह सोच नई पीढ़ी को हतोत्साहित करने वाली सोच है। हमको नई पीढ़ी को यह कहकर डराना नहीं चाहिए कि जिस 'समय' में वे जी रहे हैं वह पिछले गुज़रे हुए समय से बेकार है बल्कि उनको तो यह बताया जाना चाहिए कि यह समय अब तक के सभी समयों में सबसे अच्छा समय है क्योंकि ये वास्तव में ही सर्वश्रेष्ठ समय है।&lt;br /&gt;
        असल में हमारा समाज आदिकाल से ही निरंतर विकासक्रम में है और यह निश्चित ही पूर्ण रूप से सकारात्मक सोच का नतीजा है न कि विध्वंसक सोच का। विकसित समाज में अनेक 'संस्थाओं' ने निरंतर विकास किया है जैसे कि 'विवाह संस्था'। विवाह संस्था आज जितने परिपक्व रूप में है उतनी पहले कभी नहीं थी। गुज़रे समय में अनेक बंधनों के चलते स्त्री ने विवाह को अपने लिए हर हाल में एक घाटे का सौदा ही माना, यहाँ तक कि पति के लिए चिता में सती भी होना पड़ा, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। पढ़े-लिखे और काम-काजी पति-पत्नी गृहस्थ जीवन में लगभग प्रत्येक कोण पर पति-पत्नी समान अधिकारों का आनंद उठाने लगे हैं।&lt;br /&gt;
        हम अक्सर अच्छे-बुरे ज़माने को प्रमाण-पत्र देने वाले मठाधीश बनकर अनेक हास्यास्पद उपक्रम और पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यवहार करने लगते हैं। जिससे नई पीढ़ी हमें 'आउट डेटेड' घोषित कर देती है और हम एक ऐसी दवाई बन जाते हैं जिसकी 'एक्सपाइरी डेट' भी निकल चुकी हो। &lt;br /&gt;
        ये तीन हानिकारक वाक्य- &amp;quot;महंगाई बहुत बढ़ गई है&amp;quot;, &amp;quot;ज़माना बहुत ख़राब आ गया है&amp;quot;, &amp;quot;आजकल के लड़के-लड़कियों में शर्म-लिहाज़ नहीं है&amp;quot; असल में पूरी तरह से नकारात्मक दृष्टिकोण वाले हैं और 'विकासवादी' सोच के विपरीत हैं। मैंने 'प्रगतिवादी' के स्थान पर 'विकासवादी' शब्द का प्रयोग किया है, जिसका कारण मेरा 'प्रगति' की अपेक्षा 'विकास' में अधिक विश्वास करना है। 'प्रगति' किसी भी दिशा में हो सकती है लेकिन क्रमिक-विकास सामाजिक-व्यवस्था के सुव्यवस्थित सम्पोषण के लिए ही होता है। प्रगति एक इकाई है तो विकास एक संस्था और वैसे भी विकास, प्रगति की तरह अचानक नहीं होता और क्रमिक-विकास निश्चित रूप से 'प्रगति' से अधिक प्रभावकारी और सुव्यवस्थित प्रजातांत्रिक व्यवस्था का सबसे सहज अंग है।&lt;br /&gt;
       &lt;br /&gt;
     इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
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{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%97_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=1565</id>
		<title>सत्ता का रंग -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2017-05-21T13:37:42Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;सत्ता का रंग&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Shershah-suri.jpg|400px|right|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        गिरगिट और ख़रबूज़े में क्या फ़र्क़ है ? &lt;br /&gt;
        गिरगिट माहौल देखकर रंग बदलता है और ख़रबूज़ा, ख़रबूज़े को देखकर रंग बदलता है। &lt;br /&gt;
हमारे नेताओं के भी दो ही प्रकार होते हैं और इनमें फ़र्क़ भी वही होता है जो गिरगिट और ख़रबूज़े में...&lt;br /&gt;
        &lt;br /&gt;
        न जाने कितने साल पुरानी बात है कि न जाने किस देश के एक सुल्तान ने अपनी पसंद का महल बनवाने का हुक़्म दिया। बीस साल में महल बनकर तैयार हो गया। अब इतना ही काम बाक़ी रह गया था कि महल के बाहरी दरवाज़े पर सुल्तान का नाम लिख दिया जाये। अगले दिन सुल्तान महल देखने आने वाला था। &lt;br /&gt;
        लेकिन ये क्या ? सुबह को देखा तो पता चला कि महल के बाहरी दरवाज़े पर तो सुल्तान की बजाय 'इन्ना' का नाम लिखा हुआ है, और फिर रोज़ाना यही होने लगा कि नाम लिखा जाता था सुल्तान का लेकिन वह बदल जाता था इन्ना के नाम से...। &lt;br /&gt;
        कौन था 'इन्ना' ? इन्ना एक फटे-हाल ग़ुलाम था और इसने भी महल बनाने में मज़दूरी की थी। इन्ना, ईमानदार और रहमदिल होने के साथ-साथ एक ऐसा गायक भी था, जिसके गीत पूरी सल्तनत में मशहूर थे। उसके दिल में चिड़ियों और जानवरों के लिए बेपनाह मुहब्बत थी। चिड़ियों का पिंजरे में रहना और घोड़ों को दौड़ाने के लिए कोड़ों से पीटा जाना पसंद नहीं करता था इन्ना। सचमुच बहुत रहमदिल था इन्ना। &lt;br /&gt;
        ये बात सुल्तान तक पहुँची कि सारी सल्तनत में इसी का चर्चा होने लगा है। सुल्तान ने अपनी मलिका और वज़ीर से सलाह की। पूरी योजना के साथ मलिका इस ग़रीब 'इन्ना' के घर जा धमकी। हज़ार इन्कार-इसरार के बाद इन्ना को महल में ले जाया गया और ज़बर्दस्ती सल्तनत का वज़ीर बनाया गया। &lt;br /&gt;
        इन्ना ने वज़ीर बनते ही तमाम फ़रमान जारी कर दिए- जैसे कि कोई ग़रीब बासी खाना नहीं खाएगा, किसी जानवर को कोड़े नहीं लगाए जाएँगे, चिड़ियाँ पिंजरों में नहीं रहेंगी। ग़रीब फटे-चिथड़े नहीं पहनेंगे आदि-आदि। &lt;br /&gt;
        इस आदेश का पालन, मलिका और पुराने वज़ीर की 'चाल' के अनुसार किया गया। कुछ ऐसे हुआ कि ग़रीब जनता से खाना छीना जाने लगा। ताज़ा खाना उनको मिल नहीं पाता था और बासी खाना इस नये आदेश ने बंद करा दिया, साथ ही दंड भी दिया जाने लगा। जो भी फटे कपड़ों में दिखता उसे पीटा जाता और उसके कपड़े उतार दिए जाते। घोड़ों को कोड़ों के बजाय अन्य साधनों से पीटा जाने लगा। कुल मिला कर यह हुआ कि हाहाकार मच गया। &lt;br /&gt;
        इस बात की ख़बर इन्ना को दी गई कि पड़ोसी देश हमला कर सकते हैं और घोड़ों के बिना युद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि घोड़े बिना कोड़ा लगाये चलेंगे ही नहीं तो युद्ध कैसे लड़ा जाएगा ? &lt;br /&gt;
        इन्ना अब वो इन्ना नहीं रहा था। महल की आराम और अय्याशी की ज़िंदगी, जिसमें लज़ीज़ खाना, उम्दा शराब और मनोरंजन के लिए नर्तकियाँ शामिल थीं, ने इन्ना को पूरी तरह बदल दिया था। आये दिन इन्ना को अपने फ़रमानों को बदलना पड़ता था। जंग के लिए तैयार करने के लिए घोड़ों को फिर से कोड़े लगा कर दौड़ाने का आदेश इन्ना ने जारी किया और इन्ना का पूरा व्यक्तित्व अब ठीक वैसा ही हो गया था जैसा कि किसी ज़ालिम शासक का हो सकता है।&lt;br /&gt;
        दो साल गुज़र गये थे, अब सुल्तान ने इन्ना को बुलवाकर उससे तमाम सवाल किए और उसे कोई सुरीला गाना सुनाने के लिए कहा। दो साल शराब पीने और आराम की ज़िंदगी बिताने वाला इन्ना अब सिर्फ़ फटी आवाज़ में ही गा पाया। यह लिखने की ज़रूरत नहीं है कि महल के दरवाज़े से इन्ना का नाम मिटाकर जब सुल्तान का नाम दोबारा लिखा गया तो वह बदल कर इन्ना नहीं हुआ। &lt;br /&gt;
इन्ना का क़िस्सा असल में असग़र वजाहत के नाटक 'इन्ना की आवाज़' का सारांश है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बात सिर्फ़ इतनी सी है कि 'सत्ता' की एक 'अपनी भाषा' और 'अपनी संस्कृति' होती है और सत्ता में बने रहने के कुछ नियम होते हैं। इन भाषा, संस्कृति और नियमों का प्रयोग किये बिना सत्ता चल नहीं सकती। जबकि सत्ता प्राप्त करने के लिए कोई नियम नहीं है। सत्ता प्राप्त करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाये जा सकते हैं और अपनाये जाते भी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ उदाहरणों पर एक दृष्टि डाली जाय:&lt;br /&gt;
        - मुग़ल बादशाह को हराने के बाद शेरशाह सूरी जब दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो कहते हैं कि सबसे पहले वह शाही बाग़ के तालाब में अपना चेहरा देखकर यह परखने गया कि उसका माथा बादशाहों जैसा चौड़ा है या नहीं ! &lt;br /&gt;
जब शेरशाह से पूछा गया &amp;quot;आपके बादशाह बनने पर क्या-क्या किया जाय ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
तब शेरशाह ने कहा &amp;quot;वही किया जाय जो बादशाह बनने पर किया जाता है!&amp;quot; &lt;br /&gt;
एक साधारण से ज़मीदार परिवार में जन्मा ये 'फ़रीद' जब हुमायूँ को हराकर 'बादशाह शेरशाह सूरी' बना तो उसने सबसे पहले यही सोचा कि उसका आचरण बिल्कुल बादशाहों जैसा ही हो। शेरशाह ने सड़कें, सराय, प्याऊ आदि विकास कार्य तो किए, लेकिन हिंदुओं पर लगने वाले कर 'जज़िया' को नहीं हटाया, क्योंकि अफ़ग़ानी सहयोगियों को ख़ुश रखना ज़्यादा ज़रूरी था।     &lt;br /&gt;
        - अब समकालीन परिस्थितियाँ देखें तो पता चलता है कि जो नेता गाँधी जी के आश्रम में बैठे उनके नये वक्तव्य को सुनने के लिए उनका मुँह ताका करते थे, वे ही नेता भारत के स्वतंत्र होते ही राजकाज में इतने व्यस्त हो गये कि अपनी उपेक्षा से अघाए गाँधी जी को कहना पड़ा कि मुझे दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया गया है।&lt;br /&gt;
        - आपातकाल के ख़िलाफ़ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जन्मी जनता पार्टी सरकार ने मात्र ढाई साल में ही दम तोड़ दिया। भारत की जनता ने बड़े आश्चर्य से अपने नेताओं को सत्ता के लिए नये नये झगड़ों में लिप्त देखा और जनता पार्टी की सरकार से जनता की यह उम्मीद कि देश में कोई ऐसा क्रांतिकारी परिवर्तन होगा, जिससे भारत की जनता की समृद्धि और विकास होगा, धरा का धरा रह गया। सत्ता प्राप्त करने से पहले जो उसूल और आदर्श निभाए जाते हैं, वे सत्ता प्राप्ति के बाद भी निभा पाना बहुत कठिन हो जाता है।&lt;br /&gt;
        - कहते हैं कि औरंगज़ेब ने मरने से पहले कुछ नसीहतें दी थीं। जिनमें से एक यह भी थी कि बादशाह को वादे करने तो चाहिए, लेकिन उन वादों को निबाहने की फ़िक्र करने की ज़रूरत बादशाह को नहीं है। सीधी सी बात है राजनीति का उद्देश्य होता है 'सत्ता' और सत्ता के रास्ते में अगर कोई जनता से किया हुआ वादा आता है तो वह वादा तो तोड़ा ही जायेगा न। भारत विभाजन के दौर में महात्मा गांधी ने कहा था कि मेरे शरीर के दो टुकड़े हो सकते हैं, लेकिन भारत के नहीं। भारत के दो नहीं बल्कि तीन टुकड़े हुए और गांधी जी देखते रहे।    &lt;br /&gt;
        - जब हम सड़क पर पैदल चल रहे होते हैं तो हम स्वत: ही पैदल चलने वालों के समूह के सदस्य होते हैं। हमारी सहज सहानुभूति पैदल चलने वालों की ओर रहती है और कार वालों का समूह हमें अपना नहीं लगता। हमें पैदल चलते समय सड़क पर चलती कारों और उनके मालिकों का अपने विरुद्ध प्रतीत होना स्वाभाविक ही है। जब हम कार में बैठे हों तो ऐसी इच्छा होती है कि काश ये पैदल, साइकिल, रिक्शा, तांगे न होते तो फर्राटे से हमारी कार जा सकती ! इस संबंध में एक क़िस्सा बहुत सही बैठता है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        एक गाँव में भयंकर बाढ़ आ गई। चारों तरफ़ तबाही हो गई, तमाम मकान टूट गए। बढ़ते हुए पानी से बचने के लिए एक पुराने मज़बूत मकान की छत पर सैकड़ों गाँव वाले जा चढ़े। छत पर पहुँचने के सभी रास्ते बंद थे, सिर्फ़ एक बांस की सीढ़ी लगी हुई थी। उसी सीढ़ी से चढ़ कर गाँव का सरपंच भी छत पर पहुँच गया। ये सरपंच हमेशा समाज सुधार की बातें किया करता था, लेकिन छत पर आकर जब इसने सीढ़ी ऊपर खींच ली तो सबको आश्चर्य हुआ। उससे पूछा गया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;सरपंच जी आपने ऐसा क्यों किया ? सीढ़ी ऊपर खींच ली तो अब और लोग कैसे चढ़ेंगे ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम लोगों को मालूम नहीं है। यह मकान मेरी जानकारी में बना था और इसकी छत उतनी मज़बूत नहीं है जितना कि तुम समझ रहे हो, और अधिक लोग चढ़े तो बोझ ज़्यादा हो जाएगा और छत टूट जाएगी। इसलिए मैंने सीढ़ी खींच ली... न सीढ़ी दिखेगी और न कोई और चढ़ेगा&amp;quot; सरपंच ने समझाया।&lt;br /&gt;
        आपको ऐसा नहीं लगता कि इस गाँव का क़िस्सा असल में जगह-जगह रोज़ाना ही घटता है। कभी भीड़ भरी रेलगाड़ी में तो कभी बस में और सबसे ज़्यादा तो ज़िन्दगी में सफलता प्राप्त करने की दौड़ में। हर कोई जैसे सीढ़ी को छुपा देना चाहता है...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8_%E0%A4%8F%E0%A4%95_%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%95_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=210</id>
		<title>लेकिन एक टेक और लेते हैं -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2015-01-15T06:38:55Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;headbg37&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
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| &lt;br /&gt;
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        साइलेन्स, लाइट्स, रोल साउन्ड, रोल कॅमरा ऍन्ड ऍक्शन... कट इट... शॉट ओके... लेकिन एक टेक और लेते हैं। &lt;br /&gt;
ये दुनिया है सिनेमा की, जो अब शतायु हो चुका है हमारे देश में...&lt;br /&gt;
क्या-क्या हो लिया इन सौ सालों में…?&lt;br /&gt;
        सिनेमा का सफ़र एक वैज्ञानिक आविष्कार से शुरू हुआ और मनोरंजन का साधन बनने के बाद आज संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गया है। जो लोग ये सोचते थे कि सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन के लिए ही है, वे ग़लत साबित हुए। जिस तरह साहित्य, कला, विज्ञान और संगीत की एक श्रेणी मनोरंजन ‘भी’ है, उसी तरह सिनेमा भी सिर्फ़ मनोरंजन 'ही' नहीं है।&lt;br /&gt;
        ख़ैर... सिनेमा ने वक़्त-वक़्त पर अनेक रूप रखे हैं। सिनेमा को नाम भी तमाम दिए गए, जैसे- कला फ़िल्म, समांतर सिनेमा, सार्थक सिनेमा, मसाला फ़िल्म आदि–आदि। लेकिन एक नाम बिल्कुल सही है, वो है ‘सार्थक सिनेमा’। जो फ़िल्म जिस उद्देश्य से बनी है, यदि वह पूरा हो रहा है तो वह फ़िल्म सार्थक फ़िल्म है। वही सफल सिनेमा है।&lt;br /&gt;
        शुरुआती दौर मूक फ़िल्मों का था। भारत में 1913 में [[दादा साहब फाल्के]] के भागीरथ प्रयासों से 'राजा हरिश्चंद्र' पहली फ़ीचर फ़िल्म रिलीज़ हुई। चार्ली चॅपलिन, जिन्हें विश्व सिनेमा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, ने एक से एक बेहतरीन फ़िल्म इस दौर में बनाईं जैसे- मॉर्डन टाइम्स, सिटी लाइट्स, गोल्ड रश, द किड आदि। इस दौर में रूसी निर्देशक सर्गेई आइसेंसटाइन की फ़िल्म 'बॅटलशिप पोटेम्किन' सन 1926 में आई। इस फ़िल्म का एक मशहूर दृश्य, जिसमें एक औरत अपने बच्चे को बग्घी में सीढ़ियों पर ले जा रही है, बहुत मशहूर हुआ। जिसको ‘डि पामा’ ने अपनी फ़िल्म ‘अनटचेबल’ (1987) में भी फ़िल्म के अंतिम दृश्य में इस्तेमाल करके आइंसटाइन को श्रद्धांजलि दी।&lt;br /&gt;
        1931 में '[[आलम आरा]]' के रिलीज़ होने से 'सवाक' याने बोलती हुई फ़िल्मों का दौर शुरू हो गया था। टॉकीज़ के शुरुआती दौर में, [[अशोक कुमार]] और [[देविका रानी]] अभिनीत 'अछूत कन्या' (1936) ने अपनी अच्छी पहचान बनाई। यह द्वितीय विश्वयुद्ध का समय था। इस समय 'चार्ली चॅपलिन' की फ़िल्म 'द ग्रेट डिक्टेटर' आई। इस फ़िल्म में उन्होंने मानवता पर एक बेहतरीन भाषण दिया है। चार्ली चॅपलिन को जगह-जगह इस भाषण के लिए बुलाया जाता था जिससे कि लोग मानवता का पाठ सीखें। 5-6 मिनट के इस भाषण को बोलने में चॅपलिन को कई बार बीच में ही पानी पीना पड़ा क्योंकि भाषण इतना भावुकता से भरा था कि गला अवरुद्ध हो जाता था। जनता पर इसका बहुत गहरा असर पड़ा। आज भी यह भाषण यादगार है। &lt;br /&gt;
        1939 में ‘गॉन विद द विंड’ ने क्लार्क गॅबल को बुलंदियों पर पहुँचा दिया। इस फ़िल्म ने लागत से सौ गुनी कमाई की। अब फ़िल्मों के लिए बजट कोई समस्या नहीं रह गई थी। बाद में ‘बेन-हर’ (1959) ने भी यह साबित कर दिखाया कि बहुत महंगी फ़िल्में यदि गुणवत्ता से बिना समझौता किए बनाई जाएं तो उनकी कमाई सिनेमा उद्योग को पूरी तरह स्थापित और मज़बूत करने में सहायक होती है। इटली और फ़्रांस ने बहुत उम्दा फ़िल्में विश्व को दी हैं। 1948 में इटली के वितोरियो दि सिका की ‘बाइस्किल थीव्स’ एक बेहतरीन फ़िल्म साबित हुई। सारी दुनिया में इसकी सराहना हुई और फ़िल्मों को केवल मनोरंजन का साधन न मानते हुए संस्कृति और समाज के दर्पण के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। &lt;br /&gt;
        प्यार-मुहब्बत के विषय पर हॉलीवुड में 'कासाब्लान्का' (1942) फ़िल्म को एक अधूरी प्रेम कहानी की बेजोड़ प्रस्तुति माना गया। इस फ़िल्म ने इंग्रिड बर्गमॅन को अभिनेत्री के रूप में सिनेमा-आकाश के शिखर पर पहुँचा दिया। इंग्रिड बर्गमॅन ने ढलती उम्र में इंगार बर्गमॅन की स्वीडिश फ़िल्म 'ऑटम सोनाटा' (1978) में भी उत्कृष्ट अभिनय किया। यह फ़िल्म दो व्यक्तियों के परस्पर संवाद, अंतर्द्वंद, पश्चाताप, आत्मस्वीकृति, आरोप-प्रत्यारोप का सजीवतम चित्रण थी। इसी दौर में [[वहीदा रहमान]] अभिनीत 'ख़ामोशी' (1969) आई, जिसने वहीदा रहमान को भारत की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बना दिया। वहीदा रहमान के अभिनय की ऊँचाई हम 'प्यासा' में देख चुके थे। &lt;br /&gt;
        'प्यासा' (1957) [[गुरुदत्त]] ने बनाई थी। गुरुदत्त सिनेमा जगत में लाइटिंग इफ़ॅक्ट के लिए विश्वविख्यात हैं। साथ ही उनके द्वारा किए गए 'सॉंग पिक्चराइज़ेशन' भी कमाल के हैं। सॉंग पिक्चराइज़ेशन के लिए विजय आनंद बॉलीवुड सिनेमा में सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। उन्होंने फ़िल्म निर्देशन में जो प्रयोग किए हैं, वो ग़ज़ब हैं। 'गाइड' का गाना 'आज फिर जीने की तमन्ना है' मुखड़े की बजाय अंतरे से शुरू है और 'ज्यूल थीफ़' (1967) का गाना 'होठों पे ऐसी बात मैं दबा के चली आई' में विजय आनंद का निर्देशन और [[वैजयंती माला]] का नृत्य अभी तक बेजोड़ माना जाता है।&lt;br /&gt;
        यश चौपड़ा ने प्रेम त्रिकोण को अपना प्रिय विषय बना लिया तो ऋषिकेश मुखर्जी ने स्वस्थ कॉमेडी को। ऋषिकेश मुखर्जी ने फ़िल्म सम्पादन से अपनी शुरुआत की थी। दोनों ने ही विदेशी फ़िल्मों की नक़ल करने के बजाय अधिकतर भारतीय मौलिक कहानियों को चुना।  &lt;br /&gt;
        1954 में जापानी फ़िल्म 'द सेवन समुराई' बनी, जो 'अकीरा कुरोसावा' ने बनाई। जापान के अकीरा कुरोसावा 'विश्व सिनेमा जगत के पितामह' कहे जाते हैं। विश्व की श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिनी जाने वाली इस फ़िल्म को आधार बना कर अनेक फ़िल्में बनी जिनमें एक रमेश सिप्पी की '[[शोले (फ़िल्म)|शोले]]' भी है। अल्पायु में ही स्वर्ग सिधारे जापान के महान कहानीकार 'रुनोसुके अकूतगावा' की दो कहानियों पर आधारित अद्भुत फ़िल्म, 'राशोमोन' बना कर कुरोसावा पहले ही ख्याति प्राप्त कर चुके थे। इस समय भारत में भी कई अच्छी फ़िल्में बनीं। [[सत्यजित राय]], 'पाथेर पांचाली' (1955) बना रहे थे, जिसकी शूटिंग के लिए बार-बार पैसा ख़त्म हो जाता था लेकिन अपने पसंदीदा 40 एम.एम. लेन्स के साथ उन्होंने इस फ़िल्म से भारत में ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया में शोहरत पाई। हम भारतीयों को गर्व होना चाहिए कि कुरोसावा ने सत्यजित राय के लिए कहा-&lt;br /&gt;
&amp;quot;सत्यजित राय के बिना सिनेमा जगत वैसा ही है जैसे सूरज-चाँद के बिना आसमान।&amp;quot; &lt;br /&gt;
        सत्यजित राय ने [[राजकपूर]] की 'मेरा नाम जोकर' के प्रथम भाग (बचपन वाला) को 10 महान फ़िल्मों में से बताया। राजकपूर अभिनीत 'जागते रहो' (1956) और [[महबूब ख़ान]] की '[[मदर इंडिया]]' (1957) जैसी अच्छी फ़िल्में आईं। 1957 में ही एक और अच्छी फ़िल्म ‘[[दो आंखें बारह हाथ]]’ [[वी. शांताराम]] ने बनाई। ये सिनेमा 1980-90 तक आते-आते [[श्याम बेनेगल]] की 'अंकुर' और गोविन्द निहलानी की 'आक्रोश' भी हमें दिखा गया और 'रिचर्ड एटनबरो' की [[महात्मा गाँधी]] पर बनी उत्कृष्ट फ़िल्म 'गांधी' भी।   &lt;br /&gt;
        रहस्य-रोमांच और डर का विषय भी सिनेमा में ख़ूब चला। 'अल्फ़्रेड हिचकॉक' इसके विशेषज्ञ थे। उन्होंने तमाम फ़िल्में इसी विषय पर बनाईं जैसे- द 39 स्टेप्स, डायल एम फ़ॉर मर्डर, वर्टीगो आदि, लेकिन 'साइको' उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति थी। दुनिया भर में हिचकॉक की फ़िल्मों की और दृश्यों की नक़ल हुई।&lt;br /&gt;
        हॉलीवुड में 'वॅस्टर्न्स' (काउ बॉय कल्चर वाली फ़िल्में) का ज़ोर भी चल निकला। सरजो लियोने की 'वंस अपॉन ए टाइम इन द वॅस्ट' एक श्रेष्ठ फ़िल्म बनी। सरजो लियोने ने क्लिंट ईस्टवुड के साथ कई फ़िल्में बनाईं। इन फ़िल्मों में 'ऐन्न्यो मोरिकोने' के संगीत दिया और सारी दुनिया में प्रसिद्ध हुआ। 'नीनो रोटा' भी फ़िल्मों में लाजवाब संगीत दे रहे थे जिसका इस्तेमाल इटली के फ़िल्मकारों ने ख़ूब किया। &lt;br /&gt;
        फ़ॅदरिको फ़ॅलिनी ने 1963 में  8&amp;lt;sup&amp;gt;1&amp;lt;/sup&amp;gt;/&amp;lt;sub&amp;gt;2&amp;lt;/sub&amp;gt; फ़िल्म बनाई तो वह विश्व की दस सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में जगह पा गई। इस फ़िल्म में संगीत 'नीनो रोटा' ने ही दिया और फ़िल्म की पकड़ इतनी ज़बर्दस्त बनी कि हम फ़िल्म से ध्यान हटा ही नहीं सकते। फ़ोर्ड कॉपोला ने भी 'मारियो पुज़ो' के उपन्यास पर आधारित फ़िल्म 'द गॉडफ़ादर' के लिए 'नीनो रोटा' को ही चुना। फ़िल्मों में अच्छे संगीत की भूमिका अब प्रमुख हो गई। संगीत के बादशाह 'मोत्ज़ार्ट' पर माइलॉस फ़ोरमॅन ने 'अमादिउस' बनाई। वुल्फ़गॅन्ग अमादिउस मोत्ज़ार्ट और अन्तोनियो सॅलिरी की कहानी पर बनी यह फ़िल्म, फ़ोरमॅन के उस करिश्मे से बड़ा करिश्मा थी, जो वे 1975 में 'वन फ़्ल्यू ओवर द कुक्कूज़ नेस्ट' बना कर कर चुके थे। &lt;br /&gt;
        पचास के दशक में के.आसिफ़ ने मशहूर फ़िल्म '[[मुग़ल-ए-आज़म]]' शुरू की, जो क़रीब नौ साल का समय लेकर 1960 में प्रदर्शित हुई। यूँ तो मुग़ल-ए-आज़म से जुड़े हुए हज़ार अफ़साने हैं, लेकिन [[बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ|उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ]] का [[ठुमरी]] गाने का अंदाज़ सबसे रोचक है। इस फ़िल्म के संगीतकार नौशाद, के. आसिफ़ को लेकर बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ के घर पहुँचे और उनसे फ़िल्म में गाने के लिए कहा। बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने दोनों को टालने के लिए 25 हज़ार रुपये मांगे क्योंकि उस समय फ़िल्मों में गाना शास्त्रीय गायकों के लिए ओछी बात मानी जाती थी। के. आसिफ़ को चुटकी बजाकर बात करने की आदत थी, उन्होंने चॅक बुक निकालकर 10 हज़ार की रक़म लिखी और ख़ाँ साहब को चॅक थमा दिया और चुटकी बजाकर बोले &amp;quot;ये लीजिए एडवांस मैं आपको 25 हज़ार ही दूँगा।&amp;quot; पचास के दशक में फ़िल्मों में गाना गाने के हज़ार, दो हज़ार रुपये मिला करते थे।&lt;br /&gt;
        आख़िरकार बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुँचे। वहाँ उन्होंने औरों की तरह खड़े होकर गाने से मना कर दिया तो ज़मीन पर गद्दा, चांदनी और मसनद की व्यवस्था की गई। इतने पर भी ख़ाँ साहब गाने को राजी न हुए और उन्होंने पहले उस दृश्य को फ़िल्माने के लिए कहा, जिस पर कि उनकी ठुमरी चलनी थी। इसके बाद [[दिलीप कुमार]] और [[मधुबाला]] का वो दृश्य फ़िल्माया गया, जिसमें दिलीप कुमार, मधुबाला के चेहरे पर पंख से हल्के-हल्के से सहला रहे हैं। यह दृश्य स्टूडियो में पर्दे पर प्रोजेक्टर से चलाया गया और इसको देखते हुए ख़ाँ साहब ने अपनी मशहूर ठुमरी गायी। राग सोहणी में ‘प्रेम जोगन बनके’ ठुमरी, जितनी बार भी सुन लें, अच्छी ही लगती है। ठुमरी गा कर ख़ाँ साब बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;वैसे ये लड़का और ये लड़की हैं तो अच्छे...&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=1odcNKyfZJU गाइड का गाना 'आज फिर जीने की तमन्ना है' (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=jtn4am42kW4 ज्यूल थीफ़ का गाना 'होठों पर ऐसी बात' (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=LhHkDb6H5_c राशोमोन (Rashomon) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=27lMS76hGG0 गांधी (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=kvKXt3Surlk द गॉडफ़ादर का मुख्य पार्श्व संगीत (Godfather Theme Song)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=NG-Y1GYoGfE द गुड बैड एंड अग्ली का पार्श्व संगीत (The Good The Bad And The Ugly Theme)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=dUUx7zYGL28 ऑटम सोनाटा (Autumn Sonata)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=DZRjLceDl88 द थर्टी नाइन स्टेप्स (The 39 Steps)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=lGm1HcK00Cs&amp;amp;feature=fvst द सिटी लाइट्स (City Lights) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=WMraad_AuRQ मॉर्डन टाइम्स (Modern Times) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=K4Zo_XizA68 गोल्ड रश (Gold Rush) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=vdOmrcM8jJM&amp;amp;feature=watch-now-button&amp;amp;wide=1 द किड (The Kid) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=Y6FuYf7r46Y राजा हरिश्चंद्र (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=Si0dIOTYWNo बॅटलशिप पोटेम्किन (Battleship Potemkin) (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=mkCx3xQ6XKQ&amp;amp;feature=related द ग्रेट डिक्टेटर (The Great Dictator)(यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=Iw6KokWMj3g&amp;amp;feature=fvst 'द ग्रेट डिक्टेटर' में चार्ली चॅपलिन का भाषण (यू ट्यूब विडियो)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=VteAghaJias&amp;amp;ob=av3e 'ख़ामोशी' (यू ट्यूब विडियो)] &lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=53V1w0Jq8po&amp;amp;feature=watch-now-button&amp;amp;wide=1 प्यासा (यू ट्यूब विडियो)] &lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=Aob1I_Ifee0 ‘प्रेम जोगन बनके’ (यू ट्यूब विडियो)]  &lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%96_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=238</id>
		<title>मानसून का शंख -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2014-07-17T04:50:33Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; class=&amp;quot;headbg37&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; margin-left:5px; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;मानसून का शंख&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Shiv-shanker.jpg|right|300px|border]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;आपको कुछ पता भी है कि दुनिया में क्या हो रहा है, अरे! दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी और एक हमारे ये हैं... भोले भंडारी... अरे महाराज समाधि लगाये ही बैठे रहोगे या कुछ मेरी भी सुनोगे ?&amp;quot; [[कैलास पर्वत]] पर [[पार्वती देवी|पार्वती मैया]] ग़ुस्से से भन्ना रही थीं। [[शिव|शंकर जी]] ने ध्यान भंग करना ही सही समझा और बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;तुम्हारी ही तो सुनता हूँ भागवान... दूसरे देवता तो चार-चार... छह-छह ब्याह करके बैठे हैं और मैं तो सिर्फ़ तुम्हारी ही माला जपता रहता हूँ... अब हुआ क्या जो [[नंदी]] की तरह सींग समेत लड़ रही हो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;मेरे अलावा कोई दूसरी इस कमबख्त नंदी पर बैठ कर घूमने को तैयार भी तो नहीं होगी... बताओ, हद हो गई... भला नंदी भी कोई सवारी हुई... ज़रा किसी दूसरी देवी को बिठा कर तो देखो नंदी पर... [[महालक्ष्मी देवी|लक्ष्मी जी]] होतीं तो दो दिन में भाग जातीं... वो तो मैं ही हूँ जो तुम्हारे भूत-प्रेतों के साथ निभा रही हूँ।&amp;quot; अब तक साड़ी कमर में खोंसी जा चुकी थी। नंदी की आँखों में उदासी छा गई थी, दोनों कान लटक गए और गर्दन झुक गई... भगवान शिव शंकर इस मामले की नज़ाकत को समझ कर पूरी तरह से आत्मसमर्पण करके बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;चलो ठीक, बेचारे नंदी को क्यों घसीट रही हो... अब बता भी दो,  क्या बात है ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;बात... बात तो कुछ नहीं है !  मैं तो बस इतना चाहती हूँ कि जैसे दूसरे भगवानों का सम्मान होता है, ऐसे ही आपका भी होना चाहिए... मुझसे यह नहीं बर्दाश्त होता कि सब आपको भोलेबाबा-भोलेबाबा कहकर बहकाते रहें... बस कह दिया मैंने... हाँ नईं तो...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आख़िर तुम चाहती क्या हो... ये तो बताओ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
        &amp;quot;देखो जी ! जब तुम शंख बजाते हो, तभी तो ये [[इंद्र|इंद्र देवता]] बारिश करता है... है कि नईं...अरे कभी मना भी कर दिया करो कि भैया ! मैं नहीं बजा रहा शंख... अब आप कान खोल कर सुन लीजिए, बारह साल तक शंख मत बजाना... जब तक मैं नहीं कहूँ, तब तक नहीं... आई समझ में या मुझे भी तांडव करके दिखाना पड़ेगा&amp;quot; पार्वती मैया ने अध्यादेश जारी कर दिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं समझ गया।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या समझ गए ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;यही कि सुबह [[नारद]] आया था...&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;तो ?... नारद से क्या मतलब ?... वो तो सिर्फ़ इतना ही बता रहा था कि जो रुतबा दूसरे भगवानों का होता है... वो आपका क्यों नहीं है&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;चलो ठीक है... जैसे तुम कहो... अब मैं बारह साल तक शंख नहीं बजाऊँगा... या फिर जब तुम कहोगी, तब ही बजाऊँगा... अब तो शांत हो जाओ भगवती।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अब लौटें अपने देश में...&lt;br /&gt;
        &amp;quot;सब लोग ध्यान से सुनो... अब बारह साल तक बारिश नहीं होगी... भोलेबाबा याने शंकर भगवान को किसी ने बहका दिया है तो वो शंख नहीं बजाएँगे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
गाँव की चौपाल पर, छोटे पहलवान ने ये घोषणा सुनी और अपने घर से हल-बैल लेकर सीधे जा पहुँचा खेत में, और हल चलाने लगा। उधर पार्वती जी को चैन नहीं पड़ रहा था कि देखें तो सही कि [[पृथ्वी]] पर हो क्या रहा है ? इसलिए शंकर-पार्वती धरती पर विचरण करने लगे। संयोग से छोटे पहलवान के गाँव पहुँच गए तो देखा कि छोटे तो हल चला रहा है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लगता है बेचारे को पता नहीं है कि 12 साल बरसात नहीं होगी... आइए इसे बता दें...&amp;quot; पार्वती जी ने शंकर जी से कहा&lt;br /&gt;
&amp;quot;रहने दो - रहने दो इसे मत छेड़ो... ये [[भारत]] का किसान है... इससे पंगा लेना ठीक नहीं है... तुम नहीं जानती इनको...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं, मैं तो इससे बात करूँगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
इतना कहकर, सामान्य नर-नारी के वेश में दोनों छोटे के पास पहुँचे।&lt;br /&gt;
&amp;quot;बरसात तो बारह वर्ष तक नहीं होगी और तुम हल चला रहे हो ? ऐसा लगता है कि तुमको ये बात मालूम नहीं है !&amp;quot; पार्वती ने पूछा&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुझे पता है कि बारह वर्ष तक बारिश नहीं होगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तो फिर ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अजी, बात ये है बहन जी कि बारह साल बाद बारिश होगी और इन बारह सालों में अगर मैं हल चलाना भूल गया तो ?... वैसे [[महादेव]] जी भी बारह साल बाद, शंख बजा पाएँगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है... लेकिन कोई बात नहीं है, किसी और देवी-देवता को दे दी जाएगी शंख बजाने की ज़िम्मेदारी... क्यों बहन जी ठीक है ना... ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
शंकर जी भी खड़े-खड़े सुन रहे थे। पार्वती जी उन्हें एक तरफ़ ले जा कर बोली&lt;br /&gt;
&amp;quot;अजी मैं तो कहती हूँ ज़रा शंख बजा कर देखना तो... मुझे तो लगता है ये किसान सही कह रहा है !&amp;quot;&lt;br /&gt;
महादेव मुस्कुराए और शंख बजा दिया... बस फिर क्या था... झमा-झम बरसात होने लगी।&lt;br /&gt;
        भारत का ही नहीं बल्कि विश्व के प्रत्येक देश का किसान, यदि भगवान नहीं है तो भगवान से कम भी नहीं है। भारत के किसान की परिस्थितियाँ बहुत विषम हैं, जिनके बारे में जानकारी हमें अख़बार, पत्रिका और टीवी पर मिलती रहती है। सामान्यत: किसान का एक बेटा खेत में होता है तो दूसरा सीमाओं पर तैनात होता है, देश की रक्षा के लिए।&lt;br /&gt;
        विश्व का परिदृश्य देखें तो [[कृषि]] क्षेत्र में भारत दूसरे स्थान पर है (कुल उत्पाद में)। यदि प्रति हेक्टेयर उत्पादन की बात करें तो हालात बहुत चिंताजनक हैं। किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उत्पादन पर नज़र डालें तो भारत का स्थान लगभग 83-84 वाँ है। इसमें [[अमरीका]] 11 वें स्थान पर और [[जापान]] 15 वें स्थान पर है। इसे सरल भाषा में कहें तो जितनी भूमि में हम जिस मात्रा में अन्न पैदा कर रहे हैं, उतनी ही भूमि में कुछ देश चार गुणे से अधिक उत्पादन कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
        कृषि क्षेत्रफल के लिए भी हमारी जागरूकता नहीं के बराबर है। देश के कुल क्षेत्रफल का 50% से भी कम कृषि उपयोग में आता है, जो कि प्रतिदिन बढ़ने के बजाय कम होता जा रहा है। इज़राइल ने समुद्री दलदल को सुखा-सुखा कर उसे खेती के योग्य बना लिया है और कई किलोमीटर तक [[समुद्र]] में घुस गया है। जबकि हमारे यहाँ उल्टा हो रहा है। हम कृषि योग्य भूमि को [[कंक्रीट]] के जंगल में बदल रहे हैं। उपजाऊ भूमि पर बनती अट्टालिकाएँ और सड़कें कृषि के लिए स्पष्ट ख़तरा है। &lt;br /&gt;
        इस 'तथाकथित विकास' के पीछे कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन पर हमारी निगाह नहीं जा पाती, जैसे कि 'इकॉनमिक हिट-मॅन'। वैसे तो हिट-मॅन उनको कहा जाता है जो किसी की जान लेने के कार्य को व्यवसाय की तरह करते हैं और भाड़े पर उपलब्ध होते हैं। लेकिन 'इकॉनमिक हिट-मॅन' उनसे ज़्यादा ख़तरनाक साबित हुए हैं। इकॉनमिक हिट-मॅन सबसे पहले पिछड़े देशों या प्रदेशों के मुख्य व्यक्ति से संपर्क करके उन्हें एक योजनाबद्ध विकास का लालच देते हैं। यह एक ऐसे विकास का प्रारूप होता है जिसमें ऑयल रिफ़ायनरी, बिजली-घर, जल-संसाधन सयंत्र, ऊँची अट्टालिकाओं के 'कॉरपोरेट कॉम्पलॅक्स', शॉपिंग मॉल, ऍक्सप्रॅस वे, फ़्लाईओवर, मॅट्रो, टनल वे, सबवे, अम्युज़मॅन्ट पार्क आदि-आदि एक सुनहरे सपनों जैसी योजनाएँ होती हैं। शहरों का आधुनिकीकरण और नये शहर बनाना इनका मुख्य मुद्दा होता है। &lt;br /&gt;
        इस चकाचौंध से भरे आकर्षक प्रस्ताव को भला तीसरी दुनिया का कौन से विकासशील देश या प्रदेश का मुखिया स्वीकार नहीं करेगा ? विकासशील और पिछड़े देशों और प्रदेशों के विकास के लिए दुनिया में कुछ संस्थाएँ कार्यरत हैं, जैसे कि विश्व बॅन्क, यू.ऍस-एड (USAID) आदि। इसी तरह की संस्थाओं से इन देशों या प्रदेशों को ऋण के रूप में पैसा दिलवाया जाता है और लगभग सभी ठेकों को पूर्व निर्धारित कम्पनियों को दिया जाता है। साथ ही उस देश या प्रदेश के मुखिया को रिश्वत  के रूप में मोटी रक़म दे दी जाती है। किसान की उपजाऊ ज़मीन का अधिगृहण किया जाता है। मुआवज़े के पैसे को किसान ऐश-आराम में उड़ा देते हैं और बेरोज़गार हो जाते हैं।&lt;br /&gt;
        सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि पूरे विश्व में केवल वही देश शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और विकसित हो पाए हैं, जिस देश के किसान समृद्ध, स्वस्थ और पढ़े-लिखे हैं। जैसे- जापान, इज़राइल, नीदरलैण्ड, फ्रांस, जर्मनी आदि।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
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&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:सम्पादकीय]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=3</id>
		<title>असंसदीय संसद -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2014-03-01T13:08:45Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/bharatdiscovery|फ़ेसबुक पर भारतकोश (नई शुरुआत)]] [http://www.facebook.com/bharatdiscovery भारतकोश] &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Facebook-icon-2.png|20px|link=http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453|फ़ेसबुक पर आदित्य चौधरी]] [http://www.facebook.com/profile.php?id=100000418727453 आदित्य चौधरी] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;असंसदीय संसद&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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एक भव्य इमारत पर लगे साइन बोर्ड ने मुझे चौंका दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेठ ऐरामल गैरादास इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऍम॰पी॰ ऍन्ड ऍम॰ऍल॰ए॰&lt;br /&gt;
&amp;quot;100 परसेन्ट सॅटिसफ़ॅक्शन,100 परसेन्ट प्लेसमेन्ट&amp;quot;&lt;br /&gt;
प्रधानाचार्य: डा॰ सिद्ध प्रसाद सिंह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;जैसे कि ग़ुण्डे-बदमाश, बलात्कारी, उचक्के, तस्कर आदि.... ये सभी समाज के सताए हुए लोग हैं और इनमें से कुछ आतंकवादी भी बन जाते हैं। हम इन्हें आतंकवादी बनने से रोकते हैं और समझाते हैं, पूरी ट्रेनिंग देते हैं। अरे साब! जब ऐसे बच्चे आसानी से सांसद-विधायक बन सकते हैं तो उनको आतंकवादी बनने की क्या ज़रूरत है? भई इनको अपना शौक़ ही तो पूरा करना है वो तो सदन में भी हो सकता है। इसके लिए आतंकवादी बन कर जान का जोखिम क्यों उठाना?&amp;quot;&lt;br /&gt;
          मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी और कॉलेज के प्रधानाचार्य बड़े प्रेम भाव से अपने कॉलेज की उपलब्धियों को गिनाने में लगे थे। उन्होंने आगे बताया- &amp;quot;हम देश के लिए सांसद और विधायक तैयार करते हैं। हमारे देश के हर एक नागरिक में एक सांसद या विधायक छुपा बैठा है बस उस को बाहर निकालना है, जो कि हम करते हैं। हम देश को सुधारने का काम कर रहे हैं, समाज को सुधार रहे हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;किस तरह?&amp;quot; मैंने पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;देखिए साब! हम समाज में रहने वाले उन नौजवानों को यहाँ ऍडमीशन नहीं देते जो पढ़ाई में अच्छे और व्यवहार में सभ्य हैं। हम उन दबे, कुचले और समाज से बेदख़ल किए हुए नौजवानों को लेते हैं जिन्हें समाज पसंद नहीं करता।&amp;quot; इतना कहकर उन्होंने एक फ़ोटो मुझे दिखाया-&lt;br /&gt;
&amp;quot;देखा ? देखा आपने, ये हैं मशहूर स्टार 'मनी लेओ न' उन्होंने भी हमारे यहाँ ऍडमीशन के लिए ऍप्लाई किया है। आपको तो पता ही है कि वे कितनी बड़ी पॉर्न स्टार हैं। गूगल सर्च में उनकी रॅन्किग के बारे में आपको पता ही होगा। आने वाले कल में वो सांसद बनेगी और घर-घर में बहू बेटियों को पॉर्न स्टार बनने की प्रेरणा मिलेगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
वो बोलते-बोलते थोड़ी देर रुका फिर मेरी ओर ग़ौर से देखकर बोला-&lt;br /&gt;
&amp;quot;ओहोऽऽऽ? लगता है आपको हमें अपने कॉलेज की क्लासेज़ दिखानी होंगी तभी आपको विश्वास होगा... आइए चलते हैं...&amp;quot;&lt;br /&gt;
हम दोनों एक कक्षा में जा पहुँचे वहाँ एक अध्यापक छात्रों को पढ़ा रहा था।&lt;br /&gt;
&amp;quot;चुल्लू भर पानी में डूब मरो... ये असंसदीय है... सदन में आप असंसदीय शब्दों और वाक्यों का प्रयोग नहीं कर पाएँगे तो आपको वहाँ बोलना है कि 'कटोरी भर पानी में डुबकी ले कर प्राण त्याग दो' इस तरह आपने अपनी बात भी कह दी और आप असंसदीय भाषा बोलने से भी बच गए। असंसदीय शब्दों में अनेक मुहावरे आते हैं जैसे 'भैंस के आगे बीन बजाना' आप चाहें तो कह सकते हैं कि 'भैंसे की पत्नी के आगे संगीत कार्यक्रम करना'।&amp;quot;&lt;br /&gt;
          प्रधानाचार्य मेरे प्रभावित होने की सीमा को बार-बार कुछ ऐसी दृष्टि से जांच रहे थे जैसे कि डॉक्टर थर्मोमीटर से बुख़ार और रक्तचाप यंत्र से रक्तचाप का निरीक्षण करते हैं। ऐसा लग रहा है जैसे मन ही मन कह रहे थे कि अच्छा अभी पूरी तरह प्रभावित होने में समय है, कुछ और दिखाता हूँ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;आइए आपको सॅल्फ़ डिफ़ेंस डिपार्टमेंट की तरफ़ ले चलूँ।&amp;quot; प्रधानाचार्य आत्मविश्वास से बोले।&lt;br /&gt;
हम वहाँ भी पहुँचे। वहाँ का नज़ारा ब्रूस ली और जॅकी चॅन की फ़िल्मों जैसा था। &lt;br /&gt;
प्रधानाचार्य मुझे उस हॉल में एक तरफ़ बने बॉक्सिंग रिंग के पास ले गए और बोले-&lt;br /&gt;
&amp;quot;अगले दो महीने बाद ही चुनाव हैं, ये हैं श्री प्रचंड पहाड़ी इन्हें सब प्यार से 'गब्बर भैया' कहते है। विधायक का टिकिट मिला है। इंटॅसिव कोर्स करने आए हैं। जूडो-कराटे सीख लिया है, बॉक्सिंग सीख रहे हैं। सही बात तो ये है कि इन्होंने हमारे कॉलेज के स्ट्यूडेन्ट्स को कई नई चीज़ें सिखाई हैं जैसे तेज़ाब का गुब्बारा फेंकना, बॉटल बम वग़ैरहा वग़ैरहा...&lt;br /&gt;
मुझसे न रहा गया मैंने पूछा &amp;quot;तो क्या बॉटल बम आप पहले से नहीं जानते थे?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अरे जानते थे और सिखाते भी थे लेकिन गब्बर भैया की टॅक्नीक ज़्यादा इफ़ेक्टिव है...&amp;quot; प्रधानाचार्य ने गब्बर की तरफ़ हँसते हुए कहा फिर अचानक संजीदा होकर बोले &amp;quot;चलिए अभी तो बहुत कुछ देखना है... आइए चलें&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;लेकिन सदन में बॉटल बम जाएगा कैसे? मेरा मतलब है कि....&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सदन में नहीं जाएगा तो सदन वाले तो बाहर आएँगे... आप ये सब छोड़िए... सदन में क्या जाता है या क्या नहीं ये आप हमारे ऊपर छोड़िए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
हम हॉल के दूसरी ओर पहुँचे। प्रधानाचार्य जी ताजमहल के गाइड की तरह रटी-रटाई कमेंट्री सी देने लगे-&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये देखिए, यहाँ हम अपने भावी सांसद और विधायकों को यह सिखाते हैं कि किसी भी चीज़ को हथियार की तरह कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है। आपने जॅकी चॅन की फ़िल्में देखी ही होंगी। जॅकी चॅन ने अपनी फ़िल्मों में हमें सिखाया कि आपके आस-पास जो कुछ भी है उसे ही हथियार बनाइए और हमला कर दीजिए।&amp;quot; वे थोड़ा रुके और अपने मक्कार चेहरे पर चिंता का भाव लाकर मुझसे उस 'स्टाइल' में बोले जिसका इस्तेमाल पुलिस वाले किसी अपराधी को सरकारी गवाह बनाने में इस्तेमाल करते हैं।- &lt;br /&gt;
&amp;quot;बात ये है भाई साब! कि सदन में तो मुहँ उठाकर हर कोई पहुँच जाता है लेकिन सदन में जाने के बाद कुछ करना भी तो होता है, ये क्या कि हर बात पर माइक उखाड़ लिया...? अब आप बताइए कि कल को सरकार ने माइक ऐसे बना दिए कि जो उखड़ें ही नहीं तो ?... फिर क्या करेंगे... क्या उखाड़ेंगे... बस इसीलिए हम यहाँ उनको ट्रेनिंग देते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ज़रा एक बात और बताइए कि हन्ड्रेड परसेन्ट सॅटिसफ़ॅक्शन तो ठीक है पर हन्ड्रेड परसेन्ट प्लेसमेन्ट का क्या चक्कर है?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;बात ये है सर! कि आजकल पार्टियाँ इतनी हो गई हैं कि हर कोई चुनाव लड़ सकता है, जिसे चाहिए टिकिट ले सकता है और हमारी सिफ़ारिश से तो टिकिट मिल ही जाती है।&amp;quot; प्रधानाचार्य के बताने से ऐसा लग रहा था जैसे सिनेमाघर में आई किसी नई फ़िल्म की टिकिट दिलाने की बात हो रही हो।&lt;br /&gt;
आइए अब अद्भुत शिक्षा संस्था को छोड़ कर भारतकोश पर चलें-&lt;br /&gt;
          ऐसा माना जाता है कि भारत में प्रजातंत्र है। मैंने 'माना जाता है' इसलिए लिखा है क्योंकि मुझे यह मानने में थोड़ी ही नहीं, बहुत अड़चन है। इसका सबसे मुख्य कारण है कि अपना प्रतिनिधि चुनने वाले सभी मतदाताओं को जब तक यह पता न हो कि वे किसे और क्यों चुन रहे हैं, तब तक प्रजातंत्र का कोई अर्थ है भी... यह मेरी समझ से बाहर है। प्रजातंत्र की शुरुआत कहाँ, कब, कैसे हुई, इस बहस में पड़ना मेरा उद्देश्य नहीं है बल्कि प्रजातंत्र का स्वरूप भारत में कैसा है, यह बात चर्चा का विषय है। पहले यह देखें कि प्रजातंत्र के बारे में कौन क्या कहते-&lt;br /&gt;
&amp;quot;नि:सन्देह सशक्त सरकार और राजभक्त जनता से उत्कृष्ट राज्य का निर्माण होता है, परन्तु बहरी सरकार और गूँगे लोगों से लोकतंत्र का निर्माण नहीं होता।&amp;quot; -चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य&lt;br /&gt;
&amp;quot;जनतंत्र सदैव ही संकेत से बुलाने वाली मंज़िल है, कोई सुरक्षित बंदरगाह नहीं। कारण यह है कि स्वतंत्रता एक सतत् प्रयास है, कभी भी अंतिम उपलब्धि नहीं।&amp;quot; -फ़ेलिक्स फ्रॅन्क फ़र्टर&lt;br /&gt;
&amp;quot;जनता के लिए सबसे अधिक शोर मचाने वालों को, उसके कल्याण के लिए सबसे उत्सुक मान लेना, सर्वमान्य प्रचलित त्रुटि है।&amp;quot; -एडमंड बर्क &lt;br /&gt;
          ऊपर दिए गए तीनों कथन, तीन बातें स्पष्ट करते है। पहली तो यह कि मतदाता पढ़ा-लिखा और जागरूक हो, तभी अच्छी लोकतांत्रिक सरकार मिल सकती है। दूसरी यह कि किसी देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में रहकर यदि उसकी जनता को परतंत्रता का अहसास रहता है तो वहाँ जनतंत्र अपनी गुणवत्ता खो चुका है। तीसरी यह कि प्रोपेगॅन्डा की राजनीति से बने प्रतिनिधि देश के लिए हितकारी नहीं हैं। सोचने वाली बात यह है कि ऊपर की तीनों बातें ही हमारे देश की परिस्थितियों पर खरी उतर रही हैं। मतदाता योग्य नहीं है, जनता को आज भी ऐसा लगता है जैसे कि अंग्रेज़ गए नहीं और प्रपंच और वितंडा को आधार बनाकर बने नेता हमारे सामने हैं।&lt;br /&gt;
जिस जनतांत्रिक देश के चुनाव में चुनाव-चिह्न का प्रयोग होता हो वहाँ लोकतंत्र का क्या अर्थ है। लगभग प्रत्येक राज्य में दो से अधिक पार्टियाँ हों, जाति और धर्म के आधार पर उम्मीदवारी सुनिश्चित की जाती हो, सामूहिक के बजाय व्यक्तिगत मुद्दे चुनावी मुद्दे बनते हों, चुनाव से पहले, फ़ौरी तौर पर नए मुद्दे गढ़े जाते हों और सरकार लम्बे अर्से से गठबंधन की मोहताज हो गई हो तो वहाँ जनहितकारी जनतंत्र की उम्मीद करना बहुत कठिन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
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[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%80_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=376</id>
		<title>किसी देश का गणतंत्र दिवस -आदित्य चौधरी</title>
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				<updated>2014-01-28T15:23:38Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
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&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;किसी देश का गणतंत्र दिवस&amp;lt;small&amp;gt; -आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Bhikhari-ka-katora.jpg|right|200px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
          न जाने किस देश में, न जाने किस काल में, गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, देश के प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संदेश टेलीविज़न पर प्रसारित हो रहा है।&lt;br /&gt;
मेरे देशवासियो ! &lt;br /&gt;
आज गणतंत्र दिवस है कुछ दुष्ट प्रवृत्ति के नासमझ लोग इसे भूल से सड़तंत्र दिवस कहने लगे हैं, जो कि बिल्कुल ग़लत है। वे कहते हैं कि आज हमारे देश को एक सड़ा हुआ तंत्र चला रहा है इसलिए यह सड़तंत्र दिवस है। ऐसा सोचना भी पाप है।&lt;br /&gt;
          इस देश का प्रधानमंत्री होने के नाते मैं आज आपको अपनी पार्टी की, सरकार की उपलब्धियाँ गिनाऊँगा। आज इस महान अवसर पर, सबसे पहले भ्रष्टाचार के बारे में आपको यह बताते हुए मुझे गर्व का अनुभव हो रहा है कि हमने देश से भ्रष्टाचार को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। इसमें हमें कुछ समय ज़रूर लगा लेकिन हमने इसे समाप्त करके ही दम लिया। देश के सभी वे लोग जिनके भ्रष्ट होने की संभावना थी अब भ्रष्ट नहीं रहे। इंसान तो इंसान, हमने भैंस, बकरी, ऊँट, बैल और यहाँ तक कि छोटे छोटे मक्खी, मच्छरों को भी भ्रष्ट नहीं रहने दिया है। हाँ, कुछ चूहे हैं जिन्हें हम भ्रष्ट तो नहीं कह सकते लेकिन चोर ज़रूर कह सकते हैं क्योंकि वे चोरी से अनाज खा जाते हैं। उनसे भी कहा जा रहा है कि वे चोरी रोक दें और देश के विकास की मुख्य धारा में शामिल हो जाएँ।&lt;br /&gt;
          मेरे होनहार देशवासियो! भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का जो रास्ता हमने अपनाया है, वह मैं आपको बताना चाहता हूँ। हमने सबसे पहले उन लोगों से पूछा जो हमारे क़रीब हैं जैसे कि नेता, अधिकारी और पुलिस। जब हमने उनसे पूछा कि कहीं आप लोग भ्रष्ट तो नहीं? तो उनका बहुत सीधा-सादा जवाब था कि नहीं सर! ये तो कोरी अफ़वाह है, हम तो बिल्कुल भ्रष्ट नहीं हैं। क्या आप को लगता है कि हम इतने पर संतुष्ट हो गए होंगे, नहीं हमने फिर भी नहीं माना कि वे भ्रष्ट नहीं हैं क्योंकि हमने उन्हें भगवान जी क़सम नहीं खिलाई थी। हमने हिंदुओं को भगवान की क़सम, मुसलमानों को ख़ुदा की क़सम खिलाई और ईसाइयों से भी जब तक बाई गॉड नहीं कहलवा लिया तब तक हमने नहीं माना कि वे भ्रष्ट नहीं हैं। &lt;br /&gt;
          मेरे महान देश के महान नागरिकों! आप सोच रहे होंगे कि उन लोगों का क्या जो कि भगवान को नहीं मानते तो हमने उनको कार्ल मार्क्स की क़सम खिलवाई। इसके बाद कहीं जाकर हमें विश्वास हुआ कि हमारे देश के नेता, अधिकारी और पुलिस भ्रष्ट नहीं हैं।&lt;br /&gt;
          हमारी नज़र फिर अमरूद आदमी की तरफ़ गई। माफ़ कीजिए आजकल आम आदमी की परिभाषा बदल जाने से हमें अमरूद आदमी ही कहना पड़ता है। सिर्फ़ फल का नाम बदला है लेकिन मायने इसके वही पुराने वाले हैं। मेरे देशवासियो ! इसके बाद हमने गली मुहल्लों में जाकर पुछवाया और जो नतीजा सामने आया वो बहुत उत्साह देने वाला था। हमारी टीम के सदस्यों ने जब मुहल्ले में जाकर एक महिला से पूछा कि क्या हमारे किसी नेता ने आपके साथ भ्रष्टाचार किया है तो उस महिला ने बताया कि उसके साथ हमारी पार्टी के एक बहुत साधारण से नेता से बलात्कार तो किया था लेकिन कोई भ्रष्टाचार नहीं किया। इससे दो बातें साबित हुईं एक तो ये कि हमारी पार्टी के बड़े नेता कभी बलात्कार नहीं करते सिर्फ़ छोटे नेता ही ऐसा करते हैं और दूसरी ये कि भ्रष्टाचार करना हमारी पार्टी के नेताओं का कल्चर नहीं है।&lt;br /&gt;
          इसके बाद हमने बच्चों में भ्रष्टाचार का पता लगवाया। रेल विभाग में बच्चों ने गंभीर भ्रष्टाचार किया हुआ था। आपको याद होगा पुराना ज़माना, जब छोटे-छोटे मासूम बच्चे रेल की पटरियों पर रेल से गिरा कोयला बीना करते थे। इससे दो नुक़सान हो रहे थे। एक तो इन बच्चों की जान को ख़तरा था और दूसरे ये कोयला रेल विभाग की संपत्ति थी। हमने ये भ्रष्टाचार रोक दिया। हमने विकास किया जिससे डीज़ल और बिजली से चलने वाली रेलगाड़ी बनी। जब कोयला पटरियों पर गिरता ही नहीं तो बच्चे बीनेगे क्या? इसलिए आजकल बच्चे रेल की पटरियों पर नज़र नहीं आएँगे। वे बच्चे अब शान से छोटे-बड़े शहरों में कूड़ा इकट्ठा करने के उद्योग में लगे हुए हैं। जब भी हमारी गाड़ियाँ सड़कों पर निकलती हैं और जब कभी उन गाड़ियों से झांक हम कूड़ा बीनते हुए बच्चों को देखते हैं तो मन संतोष से भर जाता है कि चलो इन बच्चों का जीवन रेलगाड़ी से कटने से बच गया और ये शान से सुरक्षित होकर यहाँ कूड़ा बीन रहे हैं।&lt;br /&gt;
           कुछ और बच्चे हैं जो घरेलू नौकर हैं या किसी दुकान या फ़ॅक्ट्री में काम करते हैं। हमने इन बच्चों के मालिकों से पूछा तो पता चला कि ये बच्चे कोई भ्रष्टाचार नहीं कर रहे बल्कि अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं। एक बात जो हमें बुरी लगती है वो ये है कि इन बच्चों के साथ कोई बदसलूकी न हो। इसके बारे में हमने एक अध्यादेश जारी किया है, जिससे इन बच्चों का कोई भी मालिक इनको अब सप्ताह में एक बार से ज़्यादा नहीं पीट सकेगा।&lt;br /&gt;
          हमने घरेलू महिला की शक्ति को भी पहचाना है और उचित सम्मान दिया है। जिन परिवारों में गैस का सिलेंडर कालाबाज़ारी याने ब्लॅक में जाता था वो आज पूरी तरह बंद है। क्योंकि भोजना आयोग को संभालने वाले विद्वान अँगूठाटेक सिंह की सलाह पर सिलेंडर को ब्लॅक के रेट से भी मँहगा कर दिया है। इससे राजस्व भी अधिक हो गया और जनता को ब्लॅक में सिलेंडर भी नहीं लेना पड़ रहा है।   &lt;br /&gt;
          हमने ग़रीबी भी हटाई थी। हमने किसी को ग़रीब नहीं रहने दिया था। कुछ ग़रीब लोग, चोर बन गए, कुछ डाकू बने, कुछ आतंकी बने बाक़ी बचे तो स्वर्गवासी बने जो भी अपनी योग्यता के अनुसार बन सकता था, हमने उसकी सहायता उसी दिशा में की और हमने उसे ग़रीब नहीं रहने दिया। &lt;br /&gt;
          हमारे देश में एक व्यवसाय बहुत बड़े पैमाने पर चल रहा है। यह है भीख मांगने का। पहले भिखारी ग़रीब होते थे लेकिन अभी-अभी अख़बारों में आपने एक भिखारी को लूटे जाने की ख़बर पढ़ी होगी। ज़रा सोचिए हमने भिखारियों का स्तर भी इतने बढ़ा दिया कि वे लुटने लगे। जल्दी ही हम एक टॅक्स लगाने जा रहे हैं। जिसे 'बॅगर टॅक्स' कहा जाएगा। जिस देश के भिखारी भी टॅक्स देने की स्थिति में पहुँच चुके हों उस देश का भविष्य कितना उज्ज्वल है, यह मुझे कहने की ज़रूरत नहीं है।&lt;br /&gt;
          हमने देश को साक्षर बनाया है। आज हमारे देश में कोई भी ऐसा नागरिक नहीं है जो पढ़ा-लिखा न हो। जो निरक्षर थे उनको हमने स्मार्ट फ़ोन, लॅपटॉप और टॅबलेट दिए हैं जिससे वो साक्षर हो गए हैं। हमारे कई मंत्री, सांसद और विधायक पहले पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन अब लॅपटाप मिल जाने से वे साक्षर की श्रेणी में आ गए हैं। हमारे भोजना आयोग के कर्ताधर्ता अँगूठाटेक सिंह अब सिर्फ़ नाम के ही अँगूठाटेक है वो अब अँगूठा नहीं टेकते बल्कि आपको जानकर आश्चर्य होगा कि वे अपने हस्ताक्षर कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
          हमने देश की सुरक्षा पर पूरा ध्यान दिया है। आप तो जानते हैं कि सर्दी के मौसम में विदेशों से पक्षी उड़ कर हमारे देश में आ जाते थे। जिससे देश की सुरक्षा को ख़तरा हो रहा था। हमारे देश के पक्षियों के साथ ये पक्षी अच्छा व्यवहार भी नहीं करते थे। जिन-जिन तालाबों और झीलों में रुकते थे हमने उनको सुखवा दिया है। जिससे ये विदेशी जासूस पक्षी अब हमारे देश में नहीं आते हैं।&lt;br /&gt;
          हमने किसान के बारे में सबसे ज़्यादा काम किया है। हमारे अन्नदाता किसान को दिन-रात, सर्दी-गर्मी में खेतों में काम करना पड़ता था। हमारी सरकार अब खेतों को ख़त्म करके उन खेतों में अब सड़कें, बड़ी-बड़ी मॉल, ऊँची-ऊँची इमारतें और पुल बनवा रही है। किसान को उसके खेतों का मुआवज़ा मिल जाता है। जिसे वो तीन-चार साल तक अपनी ऐश-मौज में ख़र्च करता रहता है जो कि पहले नहीं कर पाता था।&lt;br /&gt;
          हमने नदियों का भी पूरा ख़याल रखा है। लोग कुछ समय पहले तक नदियों का पानी पी पीकर उनको सुखाए दे रहे थे। उसमें नहाते भी थे और उसके पानी को बर्तनों में भरकर भी ले जाते थे। इस ग़लत परम्परा के चलते नदियाँ सूखने लगीं। हमने छोटे-बड़े शहरों के पूरे मलबे-कचरे को इन नदियों में डलवाया जिससे इनका पानी पीने तो क्या नहाने लायक़ भी नहीं रहा। नदियों की रक्षा के लिए हमने करोड़ों-अरबों रुपया ख़र्च करके यह योजना बनाई जो आज सुचारू रूप से चल रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे देशवासियो! मैं तो सिर्फ़ इतना ही कहना चाहता हूँ आप हमारा साथ दीजिए और विकास की इस धारा में शामिल हो जाइए। जय सड़तंत्र दिवस! ओह! माफ़ कीजिए जय गणतंत्र दिवस!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...&lt;br /&gt;
-आदित्य चौधरी &lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक&amp;lt;/small&amp;gt;   &lt;br /&gt;
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==पिछले सम्पादकीय==&lt;br /&gt;
{{भारतकोश सम्पादकीय}}&lt;br /&gt;
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[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

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		<title>भारतकोश सम्पादकीय 8 नवम्बर 2013</title>
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दिल को समझाया, बहाने भर को &lt;br /&gt;
आज ज़िंदा हैं, फ़साने भर को &lt;br /&gt;
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वो जो इक शाम जिससे यारी थी, &lt;br /&gt;
आज हासिल है, ज़माने भर को &lt;br /&gt;
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बाद मुद्दत के हसरतों ने कहा &lt;br /&gt;
तुमसे मिलते हैं, सताने भर को &lt;br /&gt;
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तेरी ख़ुशी से हम हैं आज ख़ुश कितने &lt;br /&gt;
तुझसे मिलना है, बताने भर को &lt;br /&gt;
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कौन कहता है बेवफ़ा तुझको &lt;br /&gt;
तूने चाहा था दिखाने भर को&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

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| style=&amp;quot;border:1px solid #003366; padding:10px;&amp;quot;| [[भारत को स्वयं बनाओ -आदित्य चौधरी|भारत को स्वयं बनाओ]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[जागोगे नहीं तो -आदित्य चौधरी|जागोगे नहीं तो]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[ऐसे ही उमर गई -आदित्य चौधरी|ऐसे ही उमर गई]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[भार्या पुरुषोत्तम -आदित्य चौधरी|भार्या पुरुषोत्तम]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[और जाने क्या हुआ उस दिन -आदित्य चौधरी|और जाने क्या हुआ उस दिन]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[रात नहीं कटती थी रात में -आदित्य चौधरी|रात नहीं कटती थी रात में]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[प्यार की दरकार -आदित्य चौधरी|प्यार की दरकार]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[ये दास्तान कुछ ऐसी है -आदित्य चौधरी|ये दास्तान कुछ ऐसी है]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[वो सुबह कभी तो आएगी -आदित्य चौधरी|वो सुबह कभी तो आएगी]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[छूट भागे रास्ते -आदित्य चौधरी|छूट भागे रास्ते]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[अब मुस्कुरा दे -आदित्य चौधरी|अब मुस्कुरा दे]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[ये मुमकिन नहीं -आदित्य चौधरी|ये मुमकिन नहीं]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[जीवन संगिनी -आदित्य चौधरी|जीवन संगिनी]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[उल्लू की पंचायत -आदित्य चौधरी|उल्लू की पंचायत]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[पत्थर का आसमान -आदित्य चौधरी|पत्थर का आसमान]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[इस शहर में -आदित्य चौधरी|इस शहर में]] &lt;br /&gt;
|}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:सम्पादकीय]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

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		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B7%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=348</id>
		<title>भार्या पुरषोत्तम -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B7%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=348"/>
				<updated>2012-08-11T12:30:13Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: भार्या पुरषोत्तम -आदित्य चौधरी का नाम बदलकर भार्या पुरुषोत्तम -आदित्य चौधरी कर दिया गया है&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[भार्या पुरुषोत्तम -आदित्य चौधरी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

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		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A5%80%E0%A4%AF&amp;diff=56</id>
		<title>साँचा:भारतकोश सम्पादकीय</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; border=1 style=&amp;quot;border-radius:5px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ &amp;lt;span style=&amp;quot;background:#fff; border:1px solid #ccc; border-radius:5px; border-bottom:none; padding:6px; color:#003366; font-size:18px;&amp;quot;&amp;gt;आदित्य चौधरी की रचनाएँ&amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
|- class=&amp;quot;bgmonthhead&amp;quot;&lt;br /&gt;
! style=&amp;quot;color:#003366;&amp;quot;| सम्पादकीय &lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;border:1px solid #003366; padding:10px;&amp;quot;| [[मौसम है ओलम्पिकाना -आदित्य चौधरी|मौसम है ओलम्पिकाना]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[50-50 आधा खट्टा आधा मीठा -आदित्य चौधरी|50-50 आधा खट्टा आधा मीठा]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[शर्मदार की मौत -आदित्य चौधरी|शर्मदार की मौत]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[मानसून का शंख -आदित्य चौधरी|मानसून का शंख]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[कहता है जुगाड़ सारा ज़माना -आदित्य चौधरी|कहता है जुगाड़ सारा ज़माना]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[विज्ञापन लोक -आदित्य चौधरी|विज्ञापन लोक]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[चमचारथी -आदित्य चौधरी|चमचारथी]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[लक्ष्य और साधना -आदित्य चौधरी|लक्ष्य और साधना]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[लेकिन एक रिटेक और लेते हैं -आदित्य चौधरी|लेकिन एक रिटेक और लेते हैं]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[कुछ तो कह जाते -आदित्य चौधरी|कुछ तो कह जाते]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;  [[दोस्ती-दुश्मनी और मान-अपमान -आदित्य चौधरी|दोस्ती-दुश्मनी और मान-अपमान]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[काम की खुन्दक -आदित्य चौधरी|काम की खुन्दक]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[बस एक चान्स -आदित्य चौधरी|बस एक चान्स]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[मैं तो एक भूत हूँ -आदित्य चौधरी|मैं तो एक भूत हूँ]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[सफलता का शॉर्ट-कट -आदित्य चौधरी|सफलता का शॉर्ट-कट]]  &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[एक महान डाकू की शोक सभा -आदित्य चौधरी|एक महान डाकू की शोक सभा]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[सत्ता का रंग -आदित्य चौधरी|सत्ता का रंग]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[उकसाव का इमोशनल अत्याचार -आदित्य चौधरी|उकसाव का इमोशनल अत्याचार]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[गुड़ का सनीचर -आदित्य चौधरी|गुड़ का सनीचर]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[ज़माना -आदित्य चौधरी|ज़माना]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[राज की नीति -आदित्य चौधरी|राज की नीति]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[कौऔं का वायरस -आदित्य चौधरी|कौऔं का वायरस]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[छापाख़ाने का आभार -आदित्य चौधरी|छापाख़ाने का आभार]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[बात का घाव -आदित्य चौधरी|बात का घाव]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[चिल्ला जाड़ा -आदित्य चौधरी|चिल्ला जाड़ा]]&lt;br /&gt;
|- class=&amp;quot;bgmonthhead&amp;quot;&lt;br /&gt;
! style=&amp;quot;color:#003366;&amp;quot;| कविता&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;border:1px solid #003366; padding:10px;&amp;quot;| [[भारत को स्वयं बनाओ -आदित्य चौधरी|भारत को स्वयं बनाओ]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[जागोगे नहीं तो -आदित्य चौधरी|जागोगे नहीं तो]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[ऐसे ही उमर गई -आदित्य चौधरी|ऐसे ही उमर गई]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[भार्या पुरुषोत्तम -आदित्य चौधरी|भार्या पुरषोत्तम]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[और जाने क्या हुआ उस दिन -आदित्य चौधरी|और जाने क्या हुआ उस दिन]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[रात नहीं कटती थी रात में -आदित्य चौधरी|रात नहीं कटती थी रात में]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[प्यार की दरकार -आदित्य चौधरी|प्यार की दरकार]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[ये दास्तान कुछ ऐसी है -आदित्य चौधरी|ये दास्तान कुछ ऐसी है]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[वो सुबह कभी तो आएगी -आदित्य चौधरी|वो सुबह कभी तो आएगी]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[छूट भागे रास्ते -आदित्य चौधरी|छूट भागे रास्ते]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[अब मुस्कुरा दे -आदित्य चौधरी|अब मुस्कुरा दे]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[ये मुमकिन नहीं -आदित्य चौधरी|ये मुमकिन नहीं]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[जीवन संगिनी -आदित्य चौधरी|जीवन संगिनी]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[उल्लू की पंचायत -आदित्य चौधरी|उल्लू की पंचायत]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[पत्थर का आसमान -आदित्य चौधरी|पत्थर का आसमान]] &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;•&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; [[इस शहर में -आदित्य चौधरी|इस शहर में]] &lt;br /&gt;
|}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:सम्पादकीय]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%87%E0%A4%B8_%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=128</id>
		<title>इस शहर में -आदित्य चौधरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://adityachaudhary.org/index.php?title=%E0%A4%87%E0%A4%B8_%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=128"/>
				<updated>2012-03-31T14:33:48Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा चौधरी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;85%&amp;quot; class=&amp;quot;headbg37&amp;quot; style=&amp;quot;border:thin groove #003333; border-radius:5px; padding:10px;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
[[चित्र:Bharatkosh-copyright-2.jpg|50px|right|link=|]] &lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#003333 size=5&amp;gt;इस शहर में -&amp;lt;small&amp;gt;आदित्य चौधरी&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;font color=#003333 size=4&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस शहर में अब कोई मरता नहीं&lt;br /&gt;
    वो मरें भी कैसे जो ज़िन्दा नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो रहे नीलाम चौराहों पे रिश्ते&lt;br /&gt;
    क्या कहें कोई दोस्त शर्मिंदा नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घूमता है हर कोई कपड़े उतारे&lt;br /&gt;
    शहर भर में अब कोई नंगा नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौन किसको भेजता है आज लानत&lt;br /&gt;
    इस तरह का अब यहाँ मसला नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो गया है एक मज़हब 'सिर्फ़ पैसा'&lt;br /&gt;
    अब कहीं पर मज़हबी दंगा नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मर गये, आज़ाद हमको कर गये वो&lt;br /&gt;
    उनका महफ़िल में कहीं चर्चा नहीं &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब यहाँ खादी वही पहने हुए हैं&lt;br /&gt;
    जिनकी यादों में भी अब चरख़ा नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस शहर में अब कोई मरता नहीं&lt;br /&gt;
    वो मरें भी कैसे जो ज़िन्दा नहीं&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/font&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कविता]]&lt;br /&gt;
[[Category:आदित्य चौधरी की रचनाएँ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा चौधरी</name></author>	</entry>

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