आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

अपने आप पर

कभी क्षुब्ध होता हूँअपने आप सेतो कभी मुग्ध होता हूँअपने आप परकभी कुंठाग्रस्त मौनही मेरा आवरणतो कभी कहीं इतना मुखरकि जैसे आकश ही मेरा घरकभी तरस जाता हूँएक मुस्कान के लिएया गूँजता है मेरा अट्टहासअनवरतरह रह करकभी धमनियों का रक्त हीजैसे जम जाता हैएक रोटी के लिएसड़क पर बच्चों कीकलाबाज़ी देख करकभी चमक लाता हैआखों में मिरीउसका छीन लेनाअपने हक़ कोनिडर हो करकभी सूरज की रौशनी भीकम पड़ जाती हैतो कभी अच्छा लगता हैकि चाँद भी दिखे तोदूज बन कर