आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

मिट्टी में मिलाया जाए

मेरी हस्ती को ही अब जड़ से मिटाया जाएमरूँ या न मरूँ, मिट्टी में मिलाया जाएइसी हसरत में कि पूछेगा, आख़री ख़्वाइशबीच चौराहे पे फ़ांसी पे चढ़ाया जाएउनसे कह दो कि बुनियाद में हैं छेद बहुतमेरे मरने से पहले उनको भराया जाएक्या कहूँ किससे कहूँ बहरों की दुनियाँ हैमुल्क की तस्वीर है क्या, किसको बताया जाएमैं तो बदज़ात हूँ, शामिल न किया महफ़िल मेंनाम मुझको भी शरीफ़ों का बताया जाएमसअले और भी हैं मेरी सरकशी के लिएउनको तफ़्सील से ये रोज़ बताया जाएज़माना हो गया जब दफ़्न किया था ख़ुद कोमैं तो हैरान हूँ, क्यों मुझको जलाया जाय