कविता
अब मुस्कुरा दे
आँखें बंद कर लेकि मैं तुझसेखोलने के लिए कहूँगाज़रा चुप भी हो जाकि मैं तुझसेबोलने के लिए कहूँगारूठती क्यों नहींजल्दी रूठकि तुझे मनाना हैअब मुस्कुरा देतुझको रुलाना हैसो क्यों रही हैजल्दी उठभूखा ही मरूँगा क्याखाना नहीं बनाना हैचल कपड़े तैयार कर देमुझे नहाना हैजा दूऽऽऽर चली जाकि तुझे आवाज़ देकर बुलाना हैअरे इतनी भी दूर नहींक्या सचमुच मुझे छोड़कर जाना हैअब ज़रा पास आतुझे कुछ बताना हैकि ये जो घर है ना अपनाइसे तुझी को तो मंदिर बनाना है