आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

छूट भागे रास्ते

मंज़िलों की क़ैद से अब छूट भागे रास्तेहै बक़ाया ज़िन्दगी आवारगी के वास्तेछोड़ कर रस्मो-रिवाजों की गली को आ गएअब हुआ हर शख़्स हाज़िर दोस्ती के वास्तेउसकी महफ़िल और उसके रंग से क्या साबिका [1]अब हज़ारों मस्तियाँ हर बज़्म दिल के वास्ते [2]ये सफ़र ताबीर है उन हसरतों के ख़ाब की [3]जो कभी होती थीं तेरी सुह्‌बतों के वास्ते [4]अब कोई आक़ा नियम क़ानून क्या बतलाएगाआँधियाँ भी रुक गईं हैं इस सबा के वास्ते [5]माजरा ये देखकर अब दश्त भी हैरान हैमरहले चलने लगे हैं क़ाफ़िलों के वास्ते [6]मौत के आने से पहले एक लम्हा जी लियाकौन रगड़े एड़ियाँ अब ज़िन्दगी के वास्ते

शब्दार्थ

  1. ↑ साबिका या साबका = संबंध, वास्ता
  2. ↑ बज़्म = महफ़िल
  3. ↑ ताबीर = नतीजा
  4. ↑ सुह्‌बत या सोहबत = संगत, साथ
  5. ↑ सबा = पुरवा हवा, मंद शीतल हवा
  6. ↑ मरहले= मंज़िलें