आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

ऐसे ही उमर गई

वो कहाँ गई किधर गईक्यूँ एक गुमनाम मौत मर गईकितनी चुलबुली थीकुछ भी कर लेती थीभाई ने कहा तो...समाज से डर गईपढ़ने की चाह थीखुली राह थीपिता ने भेजा तोपति के घर गईकुछ कर दिखाना थाबदला ज़माना थापति ने चाहा तोआग से गुज़र गईउम्र ढलने लगीबाहर निकलने लगीबेटे ने टोका तोबंधन में घिर गईअब क्या बताना हैक़िस्सा पुराना हैमाँ बहन बेटियों की तोऐसे ही उमर गई