आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

कितना बेदर्द और तन्हा

कितना बेदर्द और तन्हा है मुहब्बत का सफ़रजिससे पूछो वही एक दर्द लिए बैठा हैएक इज़हार-ए-मुहब्बत ही न कर पाने कोकिसी कोने में वो अफ़सोस किए बैठा हैमेरा महबूब, किसी रोज़ पलट कर आएदिल को मासूम दिलासा सा दिए बैठा हैउसको आती हो मेरी याद कभी फ़ुर्सत मेंऐसी हसरत से दिल के घाव सिए बैठा हैकैसा बेज़ार है, तन्हा है, बेख़बर भी हैइसकी पहचान बनाने को पिए बैठा है