आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

मौसम है ये गुनाह का

मौसम है ये गुनाह का इक करके देख लोजी लो किसी के इश्क़ में या मर के देख लोक्या ज़िन्दगी मिली तुम्हें डरने के वास्ते?जो भी लगे कमाल उसे करके देख लोजो लोग तुमसे कह रहे जाना नहीं ‘उधर’इतना भी क्या है पूछना, जाकर के देख लोकब-कब हैं ये मंज़र ये नज़ारे हयात केइक बार ही देखो तो नज़र भर के देख लोकुछ लोग रोज़ मर रहे, जीने की फ़िक्र मेंजीना है अगर शान से तो मर के देख लोजमती नहीं है रस्म-ओ-रिवायत की बंदिशेंपरवाज़ नए ले, उड़ान भर के देख लो'आदित्य' को रुसवा जो कर रहे हो शहर मेंतो सारे गिरेबान इस शहर के देख लो