आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

कुछ नहीं कहा

बस कुछ नहीं कहाअब कुछ नहीं रहाआँसू जो कम पड़ें तोले ख़ून से नहाअरसे से रुका दरियाइस मोड़ पर बहासपने में घर बनायासपने में ही ढहायारी ग़मों से अपनीचल ये भी इक सहा