कविता
क्या यही तुम्हारा विशेष है?
क्या यही तुम्हारा विशेष है?कि बस जीते रहना है उस जीवन कोजो कि शेष है...या कुछ देखना है कभीउन पर्दों के पार की ज़िन्दगीजो तुम्हारी उस खिड़की पर लगे हैंजिसके गिर्द बना दी हैचाँदी की दीवार तुमनेऔर उन्हेंकभी न खोलने का निर्देश हैतुम्हारा वो काला चश्मा भीउतरेगा अब नहींजो शौक़ था पहलेऔर अब व्यवसाय की मजबूरीक्या तुम देख पाओगे कभीकि कैसा ये देश हैपरफ़्यूम भी नहीं छोड़ पाओगेपसीने की गंध से तोबहुत दूर हो जाओगेइसी पसीने में ही तोदेश की आज़ादी का संदेश हैख़ून बहाकर मिली थी आज़ादीख़ून तुम भी बहाते हो लेकिनतभी जबकिब्लड टेस्ट करवाते होकभी देखा है ग़ौर से कितुम्हारे ख़ून का रंगकितना सफ़ेद हैकितने बिस्मिल थेभगत सिंह और अशफ़ाक़जिनकी आमद सेसिहर गया होगा यमराज भीक्योंकि यही तो वह मृत्यु हैजो विशेष हैबाक़ी तो सब यूँ ही हैफ़ेक है