कविता
क्यूँ करे
लायक़ नहीं हैं हम तेरे, तू प्यार क्यूँ करेकोई गुल भला, ख़िज़ाओं से दीदार क्यूँ करे[1]किस्मत ही दिल फ़रेब थी, तू बेवफ़ा नहींबंदा ख़ुदा से क्या कहे इसरार क्यूँ करे[2]जब चारागर ही मर्ज़ है तो किससे क्या कहें[3]शब-ए-हिज़्र, अब रह-रह मुझे बीमार क्यूँ करे[4]ख़ामोश आइने को अब इल्ज़ाम कितने देंतू ज़िन्दगी की सुबह यूँ बेज़ार क्यूँ करेपरछाइयाँ भी खो गईं ज़ुलमत के साए में[5]तू आ के, मेरा ज़िक्र ही बेकार क्यूँ करे