आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

हरदम याद आती है

कोई मुस्कान ऐसी है जो हरदम याद आती हैछिड़कती जान ऐसी है वो हरदम याद आती हैअंधेरी ठंड की रातों में बस लस्सी ही पीनी हैफुला के मुंह जो बैठी है वो हरदम याद आती हैकभी हर बात पे हाँ है कभी हर बात पे ना हैपटक कर पैर खिसियाती वो हरदम याद आती हैशरारत आँखों में तैरी है और मैं देख ना पाऊँझुकी नज़रों की शैतानी वो हरदम याद आती हैन जाने कौन से जन्मों में मोती दान कर बैठाकई जन्मों के बंधन से वो हरदम याद आती है