आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

फ़र्क़ क्या होगा

हुस्न औ इश्क़ के क़िस्से तो हज़ारों हैं मगरउनको कहने या न कहने से फ़र्क़ क्या होगाकोई तफ़सील से समझाए मुहब्बत का सबबइसके होने या ना होने से फ़र्क़ क्या होगातराश संग को बनते हैं, बुत तो रोज़ मगरइसके यूँ ही पड़ा रहने से फ़र्क़ क्या होगाकभी जो फ़ुरसतें होंगी तो इश्क़ कर लेंगेइसके करने या करने से फ़र्क़ क्या होगातुम ही समझाओ मुझे तुम ही इश्क़ करते होसमझ भी लूँ तो समझने से फ़र्क़ क्या होगा