आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

फूल जितने भी

फूल जितने भी दिए, उनको सजाने के लिएबेच देते हैं वो, कुछ पैसा बनाने के लिएबड़ी शिद्दत से हमने ख़त लिखे, और भेजे थेवो भी जलवा दिए हैं, ठंड भगाने के लिएहाय नाज़ों से हमने दिल को अपने पाला थातोड़ते रहते हैं वो काम बनाने के लिएएक दिन मर्द बने, घर ही उनके पहुँच गएबच्चा पकड़ा दिया था हमको, खिलाने के लिएकोई जो जान बचाए, मेरी इस आफ़त सेवक़्त मुझको मिले फिर से ज़माने के लिए