कविता
फ़साने भर को
दिल को समझाया, बहाने भर कोआज ज़िंदा हैं, फ़साने भर कोवो जो इक शाम जिससे यारी थी,आज हासिल है, ज़माने भर कोबाद मुद्दत के हसरतों ने कहातुमसे मिलते हैं, सताने भर कोतेरी ख़ुशी से हम हैं आज ख़ुश कितनेतुझसे मिलना है, बताने भर कोकौन कहता है बेवफ़ा तुझकोतूने चाहा था दिखाने भर को