आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

फ़ासले मिटाके

फ़ासले मिटाके, आया क़रीब होताचाहे नसीब वाला या कम नसीब होताउसे ज़िन्दगी में अपनी, मेरी तलाश होतीमैं उसकी सुबह होता, वो मेरी शाम होतामेरी आरज़ू में उसके, ख़ाबों के फूल होतेयूँ साथ उसके रहना, कितना हसीन होताजब शाम कोई तन्हा, खोई हुई सी होतीतब जिस्म से ज़ियादा, वो पास दिल के होतादिल के हज़ार सदमे, ग़म के हज़ार लम्हेइक साथ उसका होना, राहत तमाम होता