कविता
मत करना कोशिश भी
मत करना कोशिश भीतुम ये,फिर से हँसू...बहुत मुश्किल हैतनी भृकुटियाँभी थककर अबसाथ छोड़करपसर गई हैंयही सोचताहरदम तत्परक्यों हूँ ज़िंदा ?मरा नहीं क्यों ?लड़ क्यों नहीं रहाअजगर से ?बार-बार क्योंजाता हार ?इसकी गहरी श्वासमुझे क्यों खींचे लेती ?कर देती अस्तित्वशिथिलमेरा क्योंहर पल ?लाल और नीलीमणियों कोधारण करके,जीभ लपलपातेऔचारण गानसुन रहे,...मतली लाने वाले स्वर केजनता कोउलझाने कीनित कलासीखतेऔर जानतेहाँ-हाँ में ना-नाहो कैसे...कर जाना हैएक सहज मुस्कानफेंक केअपने ऐरावत परहो सवार ये,गिद्ध दृष्टि से युक्तगिद्ध-भोजों को तत्पर,षडयंत्रों में रत हैंसभी 'इयागो' जैसेसुबह सवेरे पूजा गृह मेंस्तुति रत होआँख मूँद लेते हैंसबअनदेखा करके...तम से घिरे निरंतरढेर अबोधों के स्वर,कभी कान इनके सुननेको बने नहीं हैंछिनते बचपन कीबिकती तस्वीरों से येअपने सभागार कोकब का सजा चुके हैंरेलों की पटरी पेसोती तक़्दीरों कोस्वर्ण रथों के पहियोंसे दफ़ना देते हैंबीते हुए जिस्म केबिकते हुए ख़ून सेऔर वहींमासूम ख़ून केउन धब्बों कोकब देखोगे?कुछ तो करो...रोक लो इनकोहे जन गण मन !कहाँ छुपे हो ?कैसे सह लेते होयह सब,कहाँ रुके हो ?क्योंकर झुकाभाल अपना तुमसब सहते हो...?