आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

ये तो तय नहीं था कि

ये तो तय नहीं था कितुम यूँ चले जाओगेऔर जाने के बादफिर याद बहुत आओगेमैं उस गोद का अहसासभुला नहीं पातातुम्हारी आवाज़ के सिवाअब याद कुछ नहीं आतातुम्हारी आँखों की चमकऔर उनमें भरीलबालब ज़िन्दगीयाद है मुझकोउन आँखों मेंसुनहरे सपने थेवो तुम्हारे नहींमेरे अपने थेमैं उस उँगली की पकड़छुड़ा नहीं पाताउस छुअन के सिवाअब याद कुछ नहीं आतातुम्हारी बलन्द चालकी ठसकऔर मेरा उस चाल कीनक़ल करनायाद है मुझकोतुम्हारे चौड़े कन्धोंऔर सीने में समाहितसहज स्वाभिमानयाद है मुझकोतुम्हारी चिता का दृश्यमैं अब तक भुला नहीं पातातुम्हारी याद के सिवा कुछ भीमुझे रुला नहीं पाता