कविता
मैं गुम हूँ
मैं गुम हूँतो गुम होतुम भीलेकिन मैं तुम मेंऔर शायदतुम और कहींमैं तो हूँ तुम मेंक्या तुम भी?कभी ख़यालकभी सपनातो कभी यूँ हीइन्हीं के साथशामिल होमेरे ज़ेहन मेंतुम हीकिसी औरशायर की ग़ज़लके मक़्ते मेंतलाशते तुम नाम मेराये कौन सी आवाज़की कशिश तुम्हें खींचे हैदूर मुझसे…अरे ब्रूटस!तुम भी…