कविता
लहू बहता है
लहू बहता है तो कहना कि पसीना होगान जाने कब तलक इस दौर में जीना होगा'छलक ना' जाय सरे शाम कहीं महफ़िल मेंये जाम-ए-सब्र तो हर हाल में पीना होगायूँ तो अहसास भी कम है चुभन का ज़ख़्मों कीतूने जो चाक़ किया तो हमें सीना होगाअब तो उम्मीद भी ठोकर की तरह दिखती हैकरना बदनाम यूँ किस्मत को सही ना होगायही वो शख़्स जो कुर्सी पे जाके बैठेगावक़्त आने पे वो तेरा तो कभी ना होगा