आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

सब चलता है

इस दुनिया में बहुत कुछ बदलता हैबस एक ज़माना ही हैजो कभी नहीं बदलता हैऔर बदले भी कैसे ?जब इंसान कानज़रिया ही नहीं बदलता हैचलो कोई बात नहींसब चलता हैबंदर से आदमी बनने की बात तोझूठी लगती हैवो तो गिरगिट हैजो माहौल के साथ रंग बदलता हैवैसे तो आग का काम ही जलाना हैवो बात अलग है किकोई मरने से पहलेतो कोई मरने के बाद जलता हैऔर दम निकलने से मरने की बात भी झूठी हैकुछ लोग,मर तो कब के जाते हैंदम है कि बहुत बाद में निकलता हैवस्त्रों की तरहआत्मा का शरीर बदलना भीग़लत लगता है मुझकोहाँ कपड़ों की तरह इंसानचेहरे ज़रूर बदलता हैचलो कोई बात नहींसब चलता हैसब चलता है