कविता
हर शाख़ पे बैठे उल्लू से
हर शाख़ पे बैठे उल्लू से,कोई प्यार से जाके ये पूछेहै क्या अपराध गुलिस्तां का ?जो शाख़ पे आके तुम बैठे !कितने सपने कितने अरमांलेकर हम इनसे मिलते हैंबेदर्द ये पंजों से अपनेसबकी किस्मत पे चलते हैंउल्लू तो चुप ही रहते हैंहम दर्द से हरदम पिसते हैंवो बोलेंगे, इस कोशिश मेंहम चप्पल जूते घिसते हैंना शाख़ कभी ये सूखेंगीना पेड़ कभी ये कटना हैजब भी कोई शाख़ नई होगीउल्लू ही उसमें बसना हैइस जंगल में अब आग लगेऔर सारे उल्लू भस्म करेफिर एक नया सावन आएऔर नया सवेरा पहल करेतब नई कोंपलें फूटेंगीऔर नई शाख़ उग आएगीफिर नये गीत ही गूँजेंगेऔर नई ज़िन्दगी गाएगी