कविता
1857
इसी मैदान में उस शख़्स को फाँसी लगी होगीतमाशा देखने को भीड़ भी काफ़ी लगी होगीजिन्हें आज़ाद करने की ग़रज़ से जान पर खेलाउन्हीं को चंद रोज़ों में ख़बर बासी लगी होगीबड़े सरकार आए हैं, यहाँ पौधा लगाएँगेहटाने धूल को मुद्दत में अब झाड़ू लगी होगीशहर में लोग ज़्यादा हैं जगह रहने की भी कम हैइसी को सोचकर मैदान की बोली लगी होगीयहाँ तो ज़ात और मज़हब का अब बाज़ार लगता हैउसे अपनी शहादत ही बहुत फीकी लगी होगी